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अंटार्कटिक से निकलेगा न्यूट्रिनो का रहस्य

२४ दिसम्बर २०१०

डार्क मैटर के एक तत्व की खोज में विज्ञान काफी आगे पहुंच चुका है. वैज्ञानिकों का कहना है कि सूरज से हर सेकेंड करीब 65 अरब न्यूट्रिनो निकलते हैं और प्रकाश की गति से धरती में प्रवेश करते हैं. लेकिन इन्हें देखा नहीं जा सकता.

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तस्वीर: AP

न्यूट्रिनो, परमाणु विज्ञान से जुड़ा यह शब्द कई वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार दिला चुका है लेकिन इसके कई रहस्य अब भी अनसुलझे हैं. न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के ऐसे अति सूक्ष्म कण है जो हर सेकंड अरबों की तादाद में धरती में प्रवेश करते हैं. अब बर्फीले दक्षिणी ध्रुव की गहराइयों में इनके चरित्र को समझने की कोशिश की जा रही है.

वैज्ञानिक मानते हैं कि न्यूट्रिनो बिग बैंग के समय बने. अब यह लगातार सूरज में हो रहे नाभिकीय विघटन से बन रहे हैं. सूर्य से प्रति सेंकेंड धरती पर करीब 65 अरब न्यूट्रिनो आते हैं. इनकी गति प्रकाश की गति यानी 299,792,458 मीटर प्रति सेंकेंड के बराबर होती हैं, लेकिन बावजूद इसके इन्हें न तो नंगी आंखों से देखा जाता है और न ही महसूस किया जा सकता है. लेकिन जैसे ही यह न्यूट्रिनो किसी कमजोर बंधन वाले अणु या परमाणु से टकराते हैं, तो उन्हें तोड़ कर रख देते है और इनका व्यवहार भी बदल जाता है.

न्यूट्रिनो को पहली बार 1930 में वोल्फगांग पाउली ने खोजा था लेकिन 80 साल बाद भी न्यूट्रिनो के बारे में वैज्ञानिक कम ही जानकारी जुटा पाए हैं. जैसा कि नाम से ही साफ है न्यूट्रिनो में किसी तरह का सकारात्मक या नकारात्मक आवेश नहीं होता है. ये न्यूट्रल होते हैं और तीन प्रकार के होते हैं. इलेक्ट्रान न्यूट्रिनो, मुओन न्यूट्रिनो और ताउ न्यूट्रिनो. इलेक्ट्रॉन के प्रोटॉन या प्रोटोन के इलेक्ट्रान बनने से इलेक्ट्रान न्यूट्रिनो बनते हैं. ऐसे ही अगल अलग परिवर्तनों से मुओन और ताउ न्यूट्रिनो का भी निर्माण होता है. विशेष किस्म के कंप्यूटराइज्ड सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला है कि अक्सर न्यूट्रिनो टक्कर के बाद न्यूट्रान में बदल जाते हैं और अकेले तैरते हुए अपने पीछे एक विकीरण छोड़ते जाते हैं.

इसी विकीकरण और इसके असर को पकड़ने के लिए अब दक्षिणी ध्रुव में समंदर और बर्फ के मैदान पर एक बड़ी प्रयोगशाला बनाई गई है. अंटार्किटक महासागर में 1,400 मीटर की गहराई में एक बड़ा और घनाकार संयंत्र डाला गया है. यह दुनिया की सबसे विशाल न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी है. अमेरिकी नेशनल साइंस फाउंडेशन के मुताबिक 27 करोड़ अमेरिकी डॉलर के इस प्रयोग से न्यूट्रिनो के असर का अध्ययन किया जा सकेगा.

घनाकार संयंत्र यानी क्यूब में 5,160 ऑप्टिकल सेंसर लगाए गए हैं. यह सेंसर गोल हैं और बास्केटबॉल के आकार के बराबर हैं. इनमें बर्फ भरी गई है. सेंसरों में 86 छेद किए गए हैं और इन्हें अंति संवेदनशील तारों पर पिरोया गया है. गहराई से सतह तक खड़े आकार में तैरते यह सेंसर न्यूट्रिनो की टक्कर और उस दौरान होने वाले विकिरण से जगमगा उठेंगे. न्यूट्रिनो सामान्यतया किसी चीज के टकराने के बाद बिना छाप छोड़े आगे बढ़ जाता है लेकिन बर्फ के अणुओं से टकराने पर यह अपना असर दिखाता है. यही वजह है कि बर्फ से भरे सेंसर न्यूट्रिनो के टकराते ही नीले रंग से जगमगाएंगे और टक्कर की जानकारी सतह पर बनी प्रयोगशाला को देंगे.

इस परियोजना में अमेरिका, जर्मनी, बेल्जियम, स्वीडन, कनाडा, जापान, न्यूजीलैंड, स्विटजरलैंड, ब्रिटेन और बारबाडोस के वैज्ञानिक शामिल हैं.

रिपोर्ट: एजेंसियां/ओ सिंह

संपादन: आभा एम

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