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घर में फेल होती भारत की विदेश नीति

१७ दिसम्बर २०१२

भारत एक ताकतवर देश है और उसके पश्चिमी सहयोगी भी इस पर यकीन करते हैं. लेकिन हाल फिलहाल उसके आस पड़ोस में जो कुछ हुआ है, उससे भारत एक कमजोर कूटनीतिक देश दिखाई पड़ता है.

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तस्वीर: dapd

महज 3 लाख की आबादी वाले देश मालदीव के साथ चल रहा हाई प्रोफाइल विवाद भी इसका एक उदाहरण है. इसी महीने की शुरुआत में मालदीव ने भारतीय निर्माण कंपनी जीएमआर के साथ 51.1 करोड़ डॉलर की एयरपोर्ट डील तोड़ दी. जीएमआर को एयरपोर्ट बनाना और उसे चलाना था. भारत ने मालदीव को मदद न करने की चेतावनी भी दी, जिसे माले ने नजरअंदाज कर दिया.

नई दिल्ली में मौजूद थिंक टैक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रमुख विल्सन जॉन कहते हैं, "मालदीव के साथ करार का टूटना एक घटना हो सकती है लेकिन इसने इलाके में भारत के अपने आर्थिक हितों के ख्याल रखने की क्षमता ने भी असर डाला है."

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद वहीद के साथ भारत की दोस्ती में दरार दिख रही है. श्रीलंका के साथ भारत नई दिल्ली के रिश्ते खट्टे होते जा रहे हैं. श्रीलंकाई राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे भी ज्यादा परवाह करते नहीं दिख रहे. तमिलों के साथ राजपक्षे के रवैये और भारतीय मछुआरों की गिरफ्तारी के मसलों ने संबंधों को ठेस पहुंचाई है. भारत ने श्रीलंका में आयात की जाने वाली कारों पर भारी शुल्क लगाए जाने का काफी विरोध किया है. भारतीय उद्योग संगठन सीआईआई का मानना है कि श्रीलंका के शुल्क बढ़ाने से भारतीय कारों का निर्यात 15 फीसदी घट सकता है.

चीन का चक्कर

मालदीव और श्रीलंका, दोनों के मामले में जानकार कुछ हद तक चीन का हाथ देख रहे हैं. बीजिंग ने इन दोनों सरकारों के साथ संबंध बढ़ाए हैं. उन्हें भारत की तुलना में ज्यादा उदार और अमीर निवेशक का विकल्प दिया है खासतौर से निर्माण के लिए. भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी यह बात मानी है. पिछले दिनों उन्होंने कहा कि भारत को यह स्वीकार करना होगा कि "कई इलाकों में चीन एक नई चुनौती बन कर उभरा है जिसे हम पहले सिर्फ भारत की जागीर समझा करते थे."

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तस्वीर: AP

उत्तर पूर्व में म्यांमार के मसले पर भी भारत चीन से पिछड़ता दिख रहा है. सैन्य शासन के चंगुल में दशकों तक बंद रहे देश के खुलने के बाद निवेश और दूसरी तरह के सहयोग के मामले में भारत चीन की तरह तेजी से कदम उठाने में नाकाम रहा है. दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सुजीत दत्ता कहते हैं, "भारत अब भी यह तय नहीं कर पाया है कि उसे म्यांमार से कैसे पेश आना है. एक तरफ भारत म्यांमार के साथ कारोबार करना चाहता है दूसरी तरफ उसे सैनिक शासन से बात करने में दिक्कत भी हो रही है." विपक्षी नेता और म्यांमार में लोकतंत्र की पहचान आंग सान सूची ने पिछले महीने कहा, "मैं सैनिक शासन के साथ भारत की बातचीत से उदास हुई हूं."

राजनीतिक रूप से भारी उठापटक झेल रहे नेपाल के साथ भी भारत की बातचीत करीब करीब बंद ही है. नेपाल आरोप लगाता है कि भारत उसके भीतर मामलों में दखल दे रहा है. नेपाल में चल रही विकास योजनाओं में चीनियों ने भारतीयों से बेहतर और समय पर काम किया है. बीते दो दशक में काठमांडू और चीन की दोस्ती परवान चढ़ी है. ऐसी ही स्थिति भूटान की भी है जिसने चीन के साथ नजदीकियों में ज्यादा फायदा देखना शुरू कर दिया है.

भारत के आस पड़ोस को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कभी "दुनिया का सबसे खतरनाक इलाका कहा" था. भारत के रिश्ते इनमें किसी से बेहतर हुए हैं तो वो एकमात्र बांग्लादेश है. परमाणु हथियारों से लैस और चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ शांति पर बातचीत के कुछ अच्छे संकेत दिखे हैं हालांकि तमाम गर्मजोशी के बावजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के बुलावे का जवाब नहीं दिया है. गृह मंत्री रहमान मलिक का भारत दौरा भी नाकाम ही साबित हुआ है.

एनआर/ओएसजे (एएफपी)

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