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सर्द मौत के सामने निढाल गरीब

२५ नवम्बर २०१२

उत्तर भारत में सर्दी तीखी होने का समय है. दिल्ली में ही एक बार फिर हजारों बेघर लोगों के सामने इन सर्दियों में अपनी जान बचाने की चुनौती है. इन बेघरों के नाम पर तनख्वाह लेने वालों की भी इनकी फिक्र कहां है.

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तस्वीर: picture-alliance/dpa

दिसंबर के मध्य से धीरे धीरे उत्तर भारत के अधिकांश शहर नमी भरे कोहरे और कड़ाके ठंड से भर जाएंगें और तब शुरू होगा जिंदा रहने का संघर्ष. दिहाड़ी मजदूर मनीष कंगन ने बीते साल की सर्दियों में अपना जवान भाई खोया. सर्दियों में खुले में सोने से 20 साल के राजेश की तबियत ऐसी बिगड़ी कि मौत ही हो गई. कंगन कहते हैं, "वह निमोनिया से मर गया और मैं कुछ नहीं कर सका."

भारत में सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकारों को आदेश दे चुका है कि वह बेघर लोगों को संतोषजनक ठिकाना मुहैया कराएं. लेकिन कंगन कहते हैं, "हम निगम प्रशासन के बनाए अस्थायी ठिकानों में भी नहीं रह सकते. कमाई बहुत कम है और सड़क ही हमारा एकमात्र घर है."

कंगन अकेले नहीं जिन्होंने अपने प्रियजन को खोया. दिल्ली में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जब सूचना के अधिकार के तहत बेघर लोगों की सूचना मांगी तो हैरान करने वाली जानकारियां सामने आईं. दिल्ली पुलिस के मुताबिक 2007 से 2011 के बीच दिल्ली के पांच जिलों में 6,861 बेघर लोगों की मौत हुई. मृतकों में 277 महिलायें और 105 बच्चे थे.

पुलिस से यह जानकारी मांगने वाले एसए आजाद ने डीडब्ल्यू से कहा, "यह सिर्फ उदाहरण मात्र है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग और दिल्ली महिला आयोग, इनमें से कोई भी बेघरों, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की परवाह नहीं करता."

बेघर लोगों के आवास का इंतजाम करने की मुहिम छेड़ते आजाद कहते हैं कि सड़क पर मरने वाले सभी लोगों का ब्योरा तो पुलिस रिकॉर्डों में भी नहीं है.

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तस्वीर: picture-alliance/dpa

सड़क पर मौतें

दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को आदेश दिया था कि कड़ाके की सर्दी को देखते हुए किसी भी रैनबसेरे को नहीं गिराया जाए. दरअसल दिल्ली नगर निगम ने बेघर लोगों के लिए बनाए गए कुछ अस्थायी ठिकानों को तोड़ दिया. सर्वोच्च अदालत ने प्रशासन को आदेश दिया कि ऐसा करने वाले अधिकारियों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए.

चप्पा चप्पा छानने के बाद नागरिक अधिकार संगठनों ने ऐसे सरकारी विभागों की पहचान की है जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवेहलना कर रहे हैं. इस साल अब तक ज्यादातर जगहों पर बेघर लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया है. बिजनेस एंड कम्यूनिटी फाउंडेशन की अमिता जोसेफ कहती हैं, "सबसे कमजोर सदस्यों का ध्यान कैसे रखा जा रहा है , इसी आधार पर किसी भी समाज या किसी भी देश को परखा जाता है. सरकार को जल्दी से यह पक्का करना चाहिए कि अदालत के आदेश का पालन हो और प्राथमिकता देकर बेघर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की जाए."

उत्तर भारत के कई राज्यों में सर्दियों में तापमान शून्य डिग्री तक चला जाता है. पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी होने के बाद मैदानी इलाकों में हड्डियों पर चुभने वाली शीत लहर चलती है. दिल्ली में ही 1,50,000 लोग बेघर हैं. शहर में सिर्फ 64 अस्थायी और 54 अस्थायी बसेरे हैं. इनमें सिर्फ 14,000 लोग रह सकते हैं. इसका मतलब साफ है कि सवा लाख से ज्यादा बेघरों को सर्द रातों में अंधेरी सर्द मौत से लड़ना होगा.

बेघरों के प्रति सरकार और प्रशासन की उदासीनता इस बात से भी साफ हो जाती है कि भारत में हर साल कितने बेघर मरते हैं, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है. ज्यादातर लोगों का मानना है कि सबसे ज्यादा मौतें गर्मियों में होती हैं, फिर बरसात में बेघर मरते हैं और जो तब भी बच जाए उसका सामना अंतहीन चक्र की तरह सर्दी से होता है.

"हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, सिर्फ सड़क और खुला आसमान है और बीते चार साल से मैं यही जानता हूं. यह एक संघर्ष है जिसमें अब तक मैं बचा हुआ हूं, कब तक इससे लड़ता रहूंगा, मैं नहीं कह सकता." आंखों में दर्द लेकिन होंठों पर मुस्कान के साथ यह कहते हुए रजिया भाई उठते हैं और कूड़ा बीनने चल देते हैं.

रिपोर्ट: मुरलीकृष्णन (नई दिल्ली)/ओएसजे

संपादन: एन रंजन