1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें

जानिए, क्यों हुआ टाटा कंपनी में झगड़ा

२७ दिसम्बर २०१६

रतन टाटा ने बड़ी धूमधाम से साइरस मिस्त्री का राजतिलक किया था. लेकिन उन्हें बड़ा बेआबरू होकर निकलना पड़ा. आखिर हुआ क्या? कंपनी के अंदर के लोग बताते हैं कि झगड़े की जड़ क्या थी.

https://p.dw.com/p/2UtCf
Indien Tata Auto behält den Namen Zica
तस्वीर: Reuters/A. Mukherjee

2012 में जब रतन टाटा रिटायर हुए, तो उन्होंने कुछ नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा था. इन नियमों में बदलाव के जरिए कंपनी के मैनेजमेंट और उसके शेयर होल्डरों के रिश्तों में बदलाव की बात थी. अब तक कंपनी का दो तिहाई हिस्सा टाटा ट्रस्ट के पास था. टाटा ट्रस्ट कंपनी का वह हिस्सा है जो सामाजिक कामकाज करता है. दो तिहाई हिस्सेदारी के चलते कंपनी पर इस ट्रस्ट का ही कब्जा था. दशकों से कंपनी और ट्रस्ट दोनों का चेयरमैन परिवार का सदस्य ही होता था. साइरस मिस्त्री के रूप में पहली बार परिवार के बाहर का कोई शख्स कंपनी का चेयरमैन बना. तब रतन टाटा चाहते थे कि ट्रस्ट का प्रभाव कंपनी पर बना रहे. कंपनी के मुनाफ से ही ट्रस्ट का समाजसेवा का काम भी होता है.

यह जानकारी टाटा में ऊंचे पदों पर काम कर रहे कई लोगों से हुई बातचीत से मिली है. ये सूत्र बताते हैं कि मिस्त्री ने टाटा का नियमों में बदलाव का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और इस तरह अपनी बेदखली का रास्ता भी साफ कर दिया. मिस्त्री को पद से हटाकर दोबारा रतन टाटा को बिठाए जाने से कंपनी में आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा दौर शुरू हुआ है जिसका असर कंपनी के शेयरों की कीमतों पर भी पड़ा. बताया जाता है कि विवाद शुरू होने के बाद से अब तक टाटा की विभिन्न कंपनियों के शेयरों की कुल कीमत 10 अरब डॉलर तक गिर चुकी है.

तस्वीरों में जानिए, क्यों खास है टाटा

26 अक्टूबर को मिस्त्री ने टाटा सन्स के बोर्ड को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने कहा कि नियमों में बदलाव का इस्तेमाल रतन टाटा कंपनी के मामलों में दखल के लिए कर रहे हैं, जिस कारण कंपनी में एक वैकल्पिक सत्ता केंद्र खड़ा हो गया है और उनके लिए काम करना मुश्किल हो रहा है.

वैसे, टाटा सन्स ने मिस्त्री को हटाए जाने का कारण उनके प्रदर्शन को बताया था. टाटा सन्स के प्रवक्ता देबाशीष रे कहते हैं कि रतन टाटा ने मिस्त्री से कहा था कि वह नए नियमों के हिसाब से ही काम करें. लेकिन इस कारण कामकाज में रतन टाटा का दखल जारी रहा. पिछले 30 महीनों में मिस्त्री ने कम से कम दो दर्जन बार रतन टाटा से मुलाकात की. ये मुलाकातें होती थीं नए फैसलों और उनके नतीजों की जानकारी देने के लिए. लेकिन सूत्र बताते हैं कि अक्सर ये मुलाकतें असहमतियों पर खत्म होती थीं.

नियमों जो बदलाव किए गए थे, उन पर लगभग एक साल तक विचार-विमर्श हुआ था. 2014 में आए नए नियमों ने ट्रस्ट द्वारा नियुक्त निदेशकों के प्रति टाटा सन्स यानी कंपनी के चेयरमैन की जवाबदेही बढ़ा दी.

देखिए, दुनियाभर में मशहूर भारतीय ब्रैंड्स

ट्रस्ट कंपनी में एक तिहाई निदेशकों की नियुक्ति कर सकता है. नए नियमों के तहत अब अगर कोई समझौता होता है या कंपनी के कैपिटल स्ट्रक्चर में कोई बदलाव होता है तो ट्रस्ट द्वारा नियुक्त निदेशकों के बहुमत की सहमति लेना अनिवार्य है. अब चेयरमैन को सालाना और पांच साल की अपनी योजनाएं बोर्ड के सामने पेश करनी होती हैं और ट्रस्ट द्वारा नियुक्त निदेशकों से इजाजत लेनी होती है. मिस्त्री को यही बातें नागवार गुजरी होंगी क्योंकि उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि टाटा परिवार अब भी पितृसत्तात्मक रवैये से काम करता है और कामकाज में दखल देता है. उन्होंने तो यहां तक कहा कि ट्रस्ट के निदेशक डाकिये हैं जो टाटा की ओर से बोली लगाते हैं. लेकिन टाटा सन्स के प्रवक्ता रे इन आरोपों को गलत बताते हैं कि रतन टाटा किसी तरह की दखलअंदाजी कर रहे थे. वह कहते हैं कि रतन टाटा ने तो कभी किसी बोर्ड मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया और जब भी मिस्त्री से उनकी मुलाकात हुई, मिस्त्री के अनुरोध पर ही हुई.

अब यह विवाद कानूनी लड़ाई का रूप ले चुका है. लेकिन अब अगर विवाद सुलझ भी जाता है तो कंपनी के सामने प्रबंधन एक समस्या बना रहेगा क्योंकि नियम तो वही रहेंगे जिनकी वजह से झगड़ा हुआ. सलाहकार फर्म इनगवर्न रिसर्च के संस्थापक श्रीराम सुब्रमण्यन कहते हैं, "किसी भी बाहरी आदमी के लिए इस पद पर होना बहुत मुश्किल काम होगा."

वीके/एके (रॉयटर्स)