अपनों से जान बचाने जेल जाती हैं लड़कियां

जॉर्डन की राजधानी अम्मान के एक गुप्त घर में 52 साल की फातिमा अपने जख्मों को सहलाते उस पल को याद करती हैं जब उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल गई. 30 साल पहले उनके पिता ने "परिवार की इज्जत बचाने" के लिए उन्हें गोली मार दी थी.

फातिमा की छोटी बहन शादी से बाहर गर्भवती हो गई थी और उनके पिता को लगा कि उनकी दोनों बेटियों को इसकी कीमत चुकानी चाहिए. फातिमा कहती हैं, "जब उन्होंने मेरी बहन को गोली मारी तो उसकी मौत हो गई. जब वो मेरी तरफ आए तभी पड़ोसियों ने पुलिस को खबर दे दी... मैं छह सात महीने अस्पताल में रही उसके बाद पुलिस ने मुझे यहां कैद कर दिया." डर के मारे वो अपना असल नाम भी नहीं बतातीं. फातिमा 22 साल तक जेल में रहीं. जॉर्डन का कानून प्रशासन को ये अधिकार देता है कि वो किसी महिला को हमले के खतरे से या फिर परिवार की इज्जत के नाम पर कत्ल होने से बचाने के लिए अनिश्चित काल तक कैद में रख सकता है. 

फातिमा अब एक सामाजिक संस्था के बनाए खुफिया घर में अकेले रहती हैं. फातिमा कहती हैं, "आपकी जिंदगी चली गई, आपकी जवानी चली गई. आपने दुनिया में जो कुछ चाहा था वो सब चला गया."

महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्था सिस्टरहुड इन ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एसआईजीआई) के मुताबिक एक अनुमान है कि जॉर्डन की महिला कैदियो में से 65 फीसदी से ज्यादा 60 साल पुराने इसी कानून के तहत जेलों में बंद हैं. जॉर्डन में इज्जत के नाम पर कितनी हत्या होती है इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि 2016 में कम से कम 42 महिलाओं की हत्या उनके रिश्तेदारों ने कर दी. एसआईजीआई के मुताबिक ये संख्या पिछले साल की तुलना में करीब 60 फीसदी ज्यादा है.

मुस्लिम महिला होने का मतलब

मिस्र में असल आजादी की जरूरत

किताब शुरू होती है नवल ए सादावी के साथ जो डॉक्टर, लेखिका और महिला अधिकारों की जानी मानी पैरोकार हैं. मध्य पूर्व की महिलाएं अपनी लड़ाई में बड़ा मुकाम हासिल करने में अब तक क्यों नाकाम रही हैं, इस पर वो कहती हैं, "जो पितृसत्तात्मक, साम्राज्यवादी और सैन्य तंत्र हमारी जिंदगी को तय करता है उसमें महिलाओं को आजादी नहीं मिल सकती. हम पर ताकत और झूठे लोकतंत्र से शासन होता है, न्याय और असल आजादी से नहीं."

मुस्लिम महिला होने का मतलब

निर्वासन झेलती सीरियाई मनोविश्लेषक

सीरियाई मनोविश्लेषक राफाह नाशेद को भयभीत असद विरोधी प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए बैठक बुलाने के बाद सितंबर 2011 में दमिश्क से गिरफ्तार किया गया. दो महीने बाद उन्हें आजाद तो कर दिया गया लेकिन अब वह पेरिस में निर्वासित जिंदगी जी रही हैं. हुईफेल्ड्ट की किताब में वह कहती हैं, "अरब समाज में बदलाव को इंकार किया जाता है क्योंकि जो भीड़ का हिस्सा नहीं है उसे नास्तिक या असामान्य मान लिया जाता है."

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लोगों की इच्छा है लोकतंत्र

ईरानी वकील शिरीन एबादी ने अपना जीवन महिलाओं, बच्चों और शरणार्थियों के अधिकारों की लड़ाई में लगा दिया है. अपने देश में वो सरकार और पुलिस के लिए खतरा मानी जाती हैं. 2003 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला. वह कहती हैं, "लोकतंत्र पूर्व और पश्चिम को नहीं जानता, लोकतंत्र लोगों की इच्छा है. इसलिए मैं लोकतंत्र के अलग अलग मॉडल को नहीं मानती."

मुस्लिम महिला होने का मतलब

इस्राएल और फलस्तीन के बीच शांति

"निश्चित रूप से कब्जा जो है वो पुरुषों का है खासतौर से सैन्य कब्जा. इस्राएल और फलस्तीन के बीच जो विवाद है वह पुरूषों का बनाया है और हम महिलाओं को इसे खत्म करना है," यह कहना है फलस्तीनी सांसद, कार्यकर्ता और विद्वान हन्नान अशरावी का. यहूदी शरणार्थियों के बारे में कुछ विवादित बयान देने के बावजूद अशरावी ने इस्राएल और फलस्तीन के बीच शांति के लिए अहम योगदान दिया है.

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यमन में महिलाओं से डरते पुरूष

महिला अधिकारों की पैरोकार अमाल बाशा यमन की हैं. उनके देश को 2016 में संयुक्त राष्ट्र के लैंगिक समानता सूचकांक में सबसे नीचे रखा गया था. वह कहती हैं कि महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर शरिया कानून के जरिए रोक लगायी जाती है, लेकिन क्यों? उनका कहना है, "पुरूष डरते हैं क्योंकि महिलाएं शांति की आवाज हैं. उनकी जंग में कोई दिलचस्पी नहीं."

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लीबिया में शांति की उम्मीद

लीबिया की हाजर शरीफ संयुक्त राष्ट्र की सलाहकार समिति और कोफी अन्नान फाउंडेशन की सदस्य हैं. वह कहती हैं कि लीबिया में गृह युद्ध को खत्म करने के लिए महिला पुरूष, दोनों को अपना रवैया बदलना होगा. उनका कहना है, "अगर आप घरों पर नज़र डालेंगे तो मांएं अपने बेटों को जंग में भेजती दिखेंगीं. अगर वे खुद हथियार लेकर नहीं चल रहीं तो भी निश्चित रूप से वे लीबिया में जो हिंसा का चक्र है उसमें योगदान दे रही हैं."

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जॉर्डन में इज्जत के नाम पर हत्या

जॉर्डन की राना हुसैनी एक महिला अधिकारवादी ,मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और एक खोजी पत्रकार भी हैं, जिनकी रिपोर्टों ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर रोशनी डाली है. इज्जत के नाम पर हत्या के बारे में उनका कहना है, "जॉर्डन का समाज हर चीज के लिए महिलाओं को जिम्मेदार बताता है, बलात्कार के लिए, उत्पीड़न के लिए, लड़कियों को जन्म देने के लिए और यहां तक कि पुरूषों के व्यभिचार और धोखेबाजी के लिए भी."

मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि हर साल इस तरह के 15 से 20 अपराध होते हैं. इज्जत के नाम पर हत्या यानी ऑनर किलिंग के सबसे ज्यादा मामलों के कारण जॉर्डन दुनिया भर में कुख्यात है. हालांकि हाल ही में वहां की सरकार ने लिंग के आधार पर होने वाले अपराध को रोकने और महिला अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए कुछ कदम उठाए हैं. संसद ने इसी महिने उस विवादित कानून को खत्म करने के प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया जिसमें बलात्कार करने वाला पीड़ित से शादी कर सजा से बच सकता है. इसके अलावा मार्च में सजा की धाराओं में संशोधन कर जजों को ऑनर किलिंग के मामले में दोषियों की सजा कम करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया.

मानवाधिकार के मामले में सरकार के संयोजक बासेल तारावनेह का कहना है, "जॉर्डन के नियम और परंपराएं अलग हैं लेकिन यहां की आबादी अब खासतौर से ज्यादा जागरूक, खुली और महिलाओं से जुड़े मुद्दे पर समझदार हो गयी है." तारावनेह ने कहा, "हम बदलाव की जरूरत को समझते है और जरूरी कदम उठा रहे हैं. इसके साथ समय के हिसाब से लगातार बदलाव के लिए इनमें बार बार संशोधन किया जाएगा."

हालांकि महिला अधिकार संगठन कड़ी सजाओं की मांग कर रहे हैं और ये भी चाहते हैं कि महिलाओं को हत्या से बचाने के लिए कैद में रखने का कानून खत्म हो. इन महिलाओं की कैद को अकसर विकल्पों की कमी कह कर उचित ठहराया जाता है और ये भी कि पीड़ित महिला के लिए यह जगह सुरक्षित है.

32 साल की रिहाब को अपने पति को तलाक देने के बाद सात महीने तक अम्मान की जवादेह जेल में रहना पड़ा. रिहाब कहती हैं, "मैं नर्क से गुजरी और जवादेह की जेल में मैंने जो देखा वो मैंने कहीं नहीं देखा था, ... लोग खुद को सीढ़ियों से नीचे फेंक देते, सिंक तोड़ कर अपने हाथ काट लेते, एक दूसरे का गला घोंटते और दांत काटते." रिहाब ने भी डर के मारे अपना असली नाम नहीं बताया. इन महिलाओँ की दिक्कत ये है कि उन्हें जहां रखा जाता है वहां हर तरह के कैदी रहते हैं. 22 साल की कैद में फातिमा को भी दूसरी महिला कैदियों से भारी खतरे का सामना करना पड़ा. वो कहती हैं, "जब मैं अंदर गई तो मुजे हत्यारों, नशेड़ियों, चोरों और वेश्याओं की सेल में रख दिया गया. मुझे समझ ही में नहीं आता था कि मैं कौन थी और अब कौन हूं."

जब पति से डर लगे

महिलाओ को यहां से बाहर निकलने के लिए गवर्नर परिवार के किसी पुरुष सदस्य की गारंटी चाहते हैं. पुरुष रिश्तेदार को ये लिख कर देना होता है कि वो उनकी हिफाजत करेंगे. अकसर ये वही रिश्तेदार होते हैं जिनसे महिलाओ को खतरा होता है और ऐसे में गारंटी देने के बावजूद महिलाओं को छूटने के बाद ये उन्हें घायल कर देते हैं या फिर मार देते हैं. कैद में रहने वाली ज्यादातर महिलाओं के लिए शादी ही उनकी आजादी का एकमात्र रास्ता है. कैद में रहते हुए पति ढूंढना लगभग असंभव है ऐसे में उन्हें जो मिल जाए उसी को अपनाना होता है. अपने पिता के डर से भागने के बाद 26 साल की स्वासन ने दो साल कैद में गुजारे. अपना असली नाम नहीं बताने वाली स्वासन कहती हैं, "मुझे जेल में एक आदमी देखने आया कि क्या मैं शादी के लिए ठीक हूं...अगले दिन ही मुझे गवर्नर के दफ्तर भेज दिया गया और गर्वनर ने मेरी शादी के प्रमाण पत्र पर दस्तखत कर दिए. दो बच्चे होने और चार साल बीतने के बाद वो इस स्थिति से बाहर निकिलने के लिए बेचैन हैं. क्योंकि उनका पति शराबी है, मारपीट करता है और उनके छोटे से घर को चलाने के लिए बहुत कम पैसा देता है.

सरकार ने दिसंबर में खतरा झेल रही महिलाओं के लिए एक आवास बनाने का एलान किया लेकिन अब तक ऐसी कोई इमारत नहीं दिखी है. 

एनआर/ओएसजे (रॉयटर्स)

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