अफगानिस्तान में जबरन कौमार्य परीक्षण का दर्द

अफगानिस्तान में जिन महिलाओं को अनैतिक बर्ताव के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है उन्हें सरकारी डॉक्टरों के जरिए कौमार्य परीक्षण से गुजरना पड़ता है. इससे गुजरना दर्दनाक ही नहीं शर्मनाक भी है.

गौर करने वाली बात है कि आखिर इसके पीछे क्या मकसद है और इससे गुजरने वाली आरोपी महिलाओं पर इसका क्या असर पड़ता है. अफगान इंडेपेंडेंट ह्यूमन राइट्स कमीशन एआईएचआरसी के मुताबिक युद्ध के साये में घिरे अफगानिस्तान में महिलाएं ना सिर्फ कट्टरपंथी तालिबानियों बल्कि सरकारी संगठनों की तरफ से भी दमन का शिकार हो रही हैं.

इस रिपोर्ट के लिए संस्था ने 13 साल से 45 साल की उम्र वाली 53 बंदी महिलाओं से बात की जो 12 अलग अलग प्रांतों की थीं. इनमें से 48 अनैतिक व्यभिचार के आरोप में बंद की गई थीं. उनका जबरन कौमार्य परीक्षण किया गया. सरकारी डॉक्टरों ने उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी योनि और शरीर के अन्य निजी हिस्सों का परीक्षण किया.

ऐसा भी था अफगानिस्तान!

डॉक्टर बनने की चाह

यह तस्वीर 1962 में काबुल विश्वविद्यालय में ली गई थी. तस्वीर में दो मेडिकल छात्राएं अपनी प्रोफेसर से बात कर रही हैं. उस समय अफ्गान समाज में महिलाओं की भी अहम भूमिका थी. घर के बाहर काम करने और शिक्षा के क्षेत्र में वे मर्दों के कंधे से कंधा मिला कर चला करती थीं.

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काबुल की सड़कों पर स्टाइल

काबुल में रेडियो काबुल की बिल्डिंग के बाहर ली गई इस तस्वीर में इन महिलाओं को उस समय के फैशनेबल स्टाइल में देखा जा सकता है. 1990 के दशक में तालिबान का प्रभाव बढ़ने के बाद महिलाओं को बुर्का पहनने की सख्त ताकीद की गई.

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सबके लिए समान अधिकार

1970 के दशक के मध्य में अफगानिस्तान के तकनीकी संस्थानों में महिलाओं का देखा जाना आम बात थी. यह तस्वीर काबुल के पॉलीटेक्निक विश्वविद्यालय की है.

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कंप्यूटर साइंस के शुरुआती दिन

इस तस्वीर में काबुल के पॉलीटेक्निक विश्वविद्यालय में एक सोवियत प्रशिक्षक को अफगान छात्राओं को तकनीकी शिक्षा देते हुए देखा जा सकता है. 1979 से 1989 तक अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के दौरान कई सोवियत शिक्षक अफगान विश्वविद्यालयों में पढ़ाया करते थे.

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पुरुषों संग महिलाएं

1981 की यह तस्वीर दिखाती है कि महिलाओं और पुरुषों का एक साथ दिखाई देना उस समय संभव था. 10 साल के सोवियत हस्तक्षेप के खत्म होने के बाद देश में गृहयुद्ध छिड़ गया जिसके बाद तालिबान ने यहां अपनी पकड़ मजबूत कर ली.

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सबके लिए स्कूल

सोवियतकाल की यह तस्वीर काबुल के एक सेकेंडरी स्कूल की है. तालिबान के आने के बाद यहां लड़कियों और महिलाओं के शिक्षा हासिल करने पर पाबंदी लग गई. उनके घर के बाहर काम करने पर भी रोक लगा दी गई.

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बेबाक झलक

1981 में ली गई इस तस्वीर में महिला को अपने बच्चों के साथ लड़क पर बिना सिर ढके देखा जा सकता है. लेकिन आधुनिक अफगानिस्तान में ऐसा कुछ दिखाई देना संभव नहीं है.

एआईएचआरसी की रिपोर्ट के मुताबिक, "क्योंकि ये टेस्ट महिलाओं की मर्जी के खिलाफ किए जाते हैं, इन्हें उनके यौन शोषण और मानवाधिकारों के हनन के तौर पर देखा जा सकता है." साथ ही कहा गया है कि ये टेस्ट अफगान संविधान और अंतरराष्ट्रीय मूल्यों के खिलाफ हैं. ज्यादातर मामलों में ये टेस्ट पुरुष सुरक्षा कर्मी की मौजूदगी में अंजाम दिए जाते हैं. ऐसे में पीड़ित पर घटना का मानसिक तौर पर गंभीर प्रभाव हो सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक टेस्ट के दौरान उनके साथ गाली गलौज और धमकियों भरा अपमानजनक व्यवहार किया जाता है, "टेस्ट के दौरान इस तरह का व्यवहार महिलाओं में मानसिक पीड़ा और अपमान की भावना पैदा करता है, इससे उनकी तकलीफ और मानसिक परेशानी और बढ़ती है."

नहीं रुक रहीं कम उम्र में शादियां

शादी की उम्र कम करना

जून 2015 में जारी एक रिपोर्ट में ह्यूमन राइट्स वॉच ने बांग्लादेशी अधिकारियों से गुहार लगाई है कि वे बाल विवाह को रोकने की कोशिशें बढ़ाएं. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह ने बांग्लादेश में प्रस्तावित विधेयक की आलोचना की है जिसमें शादी की कानूनी उम्र 18 से घटाकर 16 साल करने का प्रस्ताव है.

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15वें जन्मदिन से पहले

रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश में 30 फीसदी लड़कियों की शादी उनके 15वें जन्मदिन से पहले कर दी जाती है. बांग्लादेश में बाल विवाह गैर कानूनी है लेकिन अधिकारियों को रिश्वत देकर आसानी से नकली जन्म प्रमाणपत्र बनवाया जा सकता है.

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गरीबी की मार

बार बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं ने बांग्लादेश में गरीबी को और बढ़ावा दिया है. इससे बाल विवाह के मामलों में भी वृद्धि हुई है. पिछले साल प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 2021 तक 15 साल से कम उम्र की शादियों का खात्मा करने की बात कही थी, उनकी सरकार ने इस दिशा में ज्यादा कुछ नहीं किया है.

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घरेलू हिंसा और वैवाहिक बलात्कार

लड़कियों में शिक्षा का अभाव उन्हें ना केवल उन्हें गरीब और आर्थिक रूप से निर्भर बनाता है बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है. कम उम्र की लड़कियों के साथ वैवाहिक संबंधो में घरेलू हिंसा और बलात्कार के ज्यादा मामले सामने आते हैं.

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दक्षिण एशिया की हालत

यह समस्या सिर्फ बांग्लादेश की ही नहीं है. लगभग सभी दक्षिण एशियाई देशों में गरीबी और धार्मिक मान्यताओं के चलते कम उम्र में शादी का चलन है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक अगले दस सालों में करीब 14 करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाएगी. इनमें 50 फीसदी मामले दक्षिण एशिया के हैं.

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सामाजिक मान्यताएं बनाम कानून

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल और श्रीलंका जैसे दक्षिण एशियाई देशों में बाल विवाह पर कानूनी पाबंदी है. लेकिन इससे यहां कम उम्र में शादी के चलन को नहीं रोका जा सका है. यूएनएफपीए के मुताबिक 2000 से 2010 के बीच इन देशों में करीब 20 से 24 साल की 2.44 करोड़ महिलाओं की शादियां 18 साल की उम्र से पहले हो गई थी.

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रवैये में पिरवर्तन

दक्षिण एशिया के लिए यूनीसेफ के उप क्षेत्रीय निदेशक स्टीफेन एडकिसन का कहना है कि स्थानीय समुदायों के लिए जरूरी है कि उनसे बाल विवाह, प्रसव के दौरान होने वाली मौतों, लिंग आधारित भेदभाव जैसे मुद्दों पर बात की जाए जिनकी जड़ें सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक कारणों में है.

पिछले 15 सालों में अफगानिस्तान में तालिबान के प्रभाव के चलते सामाजिक ढांचा और खासकर महिलाओं का विकास किस तरह प्रभावित हुआ है, यह इस रिपोर्ट में उजागर होता है. महिलाओं की दशा सुधारने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए जाने के बावजूद वे बुरी हालत में हैं. भेदभाव और मानवाधिकारों के हनन का लगातार शिकार हैं. देश की कानून व्यवस्था भी उनके हितों की रक्षा करने में विफल रही है.

यहां महिलाएं सबसे असुरक्षित हैं

अफगानिस्तान

इस देश में बचपन से ही महिलाओं के लिए जीवन कठिनाइयों से भरा है. 87 फीसदी महिलाएं अशिक्षित हैं और 70 से 80 फीसदी की जबरन शादी कर दी जाती है. गर्भधारण के दौरान हजार में 4 महिलाएं जान गंवा देती हैं. यहां घरेलू हिंसा के मामले भी बेहद आम हैं.

यहां महिलाएं सबसे असुरक्षित हैं

कांगो गणराज्य

दुनिया भर में सेक्स संबंधित हिंसा में कांगो सबसे आगे है. अमेरिकी जनस्वास्थ्य पत्रिका के मुताबिक कांगो में हर रोज 1,150 महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति भी बहुत खराब है. 57 फीसदी गर्भवती महिलाएं खून की कमी से जूझ रही होती हैं.

यहां महिलाएं सबसे असुरक्षित हैं

पाकिस्तान

पाकिस्तान में कई पारंपरिक रीति रिवाज महिलाओं के लिए काफी सख्त हैं. पाकिस्तान के मानव अधिकार आयोग के मुताबिक हर साल करीब 1000 महिलाओं और बच्चों को ऑनर किलिंग के कारण जान गंवानी पड़ती है. 90 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं.

यहां महिलाएं सबसे असुरक्षित हैं

भारत

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भारत में सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले आम हैं. भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देशों में गिना जाता है. रिसर्चरों के मुताबिक पिछले तीन दशकों में 5 करोड़ भ्रूण हत्या के मामले हुए हैं.

यहां महिलाएं सबसे असुरक्षित हैं

सोमालिया

गर्भावस्था के दौरान होने वाली मौतें, बलात्कार, महिलाओं का खतना और जबरन शादी सोमालिया की महिलाओं के लिए बड़ी समस्या है. देश में कानूनों की कमी है. 4-11 साल की 95 फीसदी लड़कियों का खतना कर दिया जाता है. केवल 9 फीसदी मांए ही सही चिकित्सकीय मदद से बच्चे को जन्म दे पाती है.

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