"अभूतपूर्व" कदमों से ही सुधरेगी धरती की हालत

ग्लोबल वॉर्मिंग को कम करने के लिए इंसान को अपनी ऊर्जा खपत, यात्रा और निर्माण में "अभूतपूर्व" बदलाव करना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया गर्म हवाएं, बाढ़ लाने वाले तूफान, सूखा और कई जीवों के लुप्त होने के खतरे झेलेगी.

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है. संयुक्त राष्ट्र से जुड़े इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज यानी आईपीसीसी का कहना है कि 2015 में जब पेरिस समझौता हुआ था तब पृथ्वी के तापमान में इजाफे को 2 डिग्री सेल्सियस की बजाय 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रखने पर सहमति बनी होती तो इसका "फायदा साफ तौर पर लोगों और हमारे प्राकृतिक इकोसिस्टम को मिलता."

आईपीसीसी की रिपोर्ट बताती है कि जिस दर से दुनिया का तापमान बढ़ रहा है उससे लगता है कि यह 2030 से 2052 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. रिपोर्ट के मुताबिक उन्नीसवीं सदी के मध्य से पूर्व औद्योगिक स्तर की तुलना में यह एक डिग्री बढ़ चुका है.

कैसी है हमारी धरती की तबीयत

तापमान

धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है. 1880 से इसके आंकड़े जमा किए जा रहे हैं. 21वीं सदी के अब तक के 16 सालों में रिकॉर्ड तापमान दर्ज हुए हैं. विश्व के कुछ बड़े शहरों में सन 2100 तक तापमान आठ डिग्री सेल्सियस तक और बढ़ जाने का अनुमान है.

कैसी है हमारी धरती की तबीयत

बर्फ की चादर

आर्कटिक पर बर्फ की चादर सिमटती जा रही है और 2030 की गर्मियों तक आर्कटिक सागर से बर्फ खत्म होने का अनुमान है. दूसरे छोर पर, अंटार्कटिक में भी समुद्री बर्फ में भारी कमी दर्ज हुई है. लगातार 36 सालों से ग्लेशियरों का इलाका भी घटता जा रहा है.

कैसी है हमारी धरती की तबीयत

ग्रीनहाउस गैसें

2016 में कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी अहम ग्रीनहाउस गैसों की वातावरण में मात्रा उच्चतम रही. पेरिस समझौते में इनको 450 पीपीएम पर सीमित करने का लक्ष्य है. जिससे वैश्विक तापमान को 2 डिग्री की सीमा पर रोका जा सके.

कैसी है हमारी धरती की तबीयत

फॉसिल फ्यूल

इन ईंधनों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है. बीते तीन सालों में अर्थव्यवस्था में विकास के बावजूद इनका स्तर स्थिर बना हुआ है. लेकिन मीथेन का स्तर बढ़ा है, जो कि वातावरण को CO2 से भी ज्यादा गर्म करता है. मीथेन के बढ़ने का कारण पता नहीं चल पाया है.

कैसी है हमारी धरती की तबीयत

समुद्री स्तर

बर्फ का पिघलना और पानी का गर्म होकर फैलना तेज हो गया है. 2005 से 2015 के बीच समुद्रस्तर उसके पहले के दशक के मुकाबले 30 फीसदी तेजी से ऊपर गया. यह दर और तेज होने की संभावना है, जिससे दुनिया के निचले इलाके डूब सकते हैं.

कैसी है हमारी धरती की तबीयत

प्राकृतिक आपदा

इंसानी गतिविधियों से जलवायु में आते बदलावों और प्राकृतिक आपदाओं के बीच संबंध स्थापित हो चुका है. 1990 से आपदाएं दोगुनी हो चुकी है. विश्व बैंक बताता है कि हर साल इन आपदाओं के कारण करीब ढाई करोड़ लोग गरीबी में धकेले जा रहे हैं.

कैसी है हमारी धरती की तबीयत

जैव विविधता

आईयूसीएन की रेड लिस्ट में "खतरे में" दर्ज जानवरों और पौधों की 8,688 प्रजातियों में से करीब 19 फीसदी पर जलवायु परिवर्तन का बुरा असर पड़ा है. जैसे कि ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ, जो कि अब कभी ब्लीचिंग के बुरे असर से उबर नहीं पाएगी. आरपी/एमजे (एएफपी)

तापमान को 1.5 डिग्री के लक्ष्य पर रख कर समुद्र के जलस्तर में बढ़ोत्तरी को साल 2100 तक 2 डिग्री के लक्ष्य की तुलना में 3.9 इंच नीचे रखा जा सकता है. इससे बाढ़ का खतरा कम होगा और समुद्री किनारों, द्वीपों और नदियों के डेल्टा पर रहने वाले लोगों को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से खुद को ढालने के लिए ज्यादा वक्त मिल सकेगा.

तापमान में इजाफे का लक्ष्य 1.5 डिग्री तक रख कर जीवों के मरने और लुप्त होने के साथ ही पृथ्वी, ताजे पानी और समुद्र तटीय इकोसिस्टम पर पड़ने वाले प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा.

दक्षिण कोरिया के इंचियोन में रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के लिए हाल ही में आईपीसीसी की बैठक हुई. 2015 में सरकारों ने आईपीसी से अनुरोध किया था कि वे ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखने के औचित्य और महत्व का आकलन करे. पेरिस समझौते को इस साल पोलैंड में होने जा रहे क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस में कैसे लागू किया जाए? इस लिहाज से इस रिपोर्ट को सरकारों और नीति तय करने वालों के लिए एक वैज्ञानिक मार्गदर्शक के रूप में देखा जा रहा है.

तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए मानवीय गतिविधियों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में 2030 तक 45 फीसदी कटौती करनी होगी. इसके साथ ही 2010 के स्तर से इस सदी के मध्य तक "शून्य" पर पहुंचना होगा.

अभूतपूर्व बदलाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि दोबारा इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा से बिजली की सप्लाई 2050 तक 70-85 फीसदी तक ले जानी होगी जो फिलहाल 25 फीसदी है. गैस से उत्पन्न होने वाली बिजली को घटा कर 8 फीसदी और कोयला जला कर पैदा होने वाली बिजली को 2 फीसदी के नीचे लाना होगा. इस संदर्भ में तेल का जिक्र नहीं किया गया है. अगर औसत वैश्विक तापमान अस्थायी रूप से भी 1.5 डिग्री के पार चला जाता है तो फिर पर्यावरण से कार्बन को निकालने के लिए अतिरिक्त उपाय करने होंगे जिससे साल 2100 तक तापमान को 1.5 डिग्री की वृद्धि से नीचे रखा जाए.

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

चीन, 23.43%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

अमेरिका, 14.69%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

भारत, 5.70%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

रूस, 4.87%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

ब्राजील, 4.17%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

जापान, 3.61%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

इंडोनेशिया, 2.31%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

जर्मनी, 2.23%

Japan Erdbeben Tsunami Flash-Galerie (AP)

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

कोरिया, 1.75%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

कनाडा, 1.57%

कौन सा देश करता है सबसे ज्यादा प्रदूषण

ईरान, 1.57%

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जंगल लगाने, बायो एनर्जी के इस्तेमाल और कार्बन डाइऑक्साइड को रोकने और उसका भंडारण करने जैसे उपायों की बड़े पैमाने पर अभी पुष्टि नहीं हुई है और इसके कुछ जोखिम भी हैं.

मुश्किल यह है कि 1.5 डिग्री के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जाता तो फिर दुनिया में बड़े बदलाव होंगे. तापमान निचले स्तर के लक्ष्य पर रहा तो आर्कटिक सागर 100 साल में सिर्फ एक बार बर्फ से मुक्त होगा, लेकिन तापमान अगर ऊंचे स्तर पर रहा तो ऐसा हर दशक में कम से कम एक बार होगा. कोरल रीफ के लिए अभी ही संकट है और यह कम हो रहे हैं लेकिन तापमान के बढ़ने का मतलब है कि यह पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे.

आईपीसीसी के बोर्ड सदस्य अमजद अब्दुल्ला का कहना है, "रिपोर्ट दिखाती है कि हमारे पास बहुत कम मौके बचे हैं जिनसे हम अपने जीवन देने वाले जलवायु तंत्र को असोचनीय नुकसान से बचा सकें."

एनआर/एके (रॉयटर्स)

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