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असम में हाथियों ने किया सेना का 15 लाख का नुकसान

प्रभाकर मणि तिवारी
९ नवम्बर २०२०

असम में सेना ने सरकार से कहा है कि वह या तो गुवाहाटी स्थित उसके पूर्वी बेस से सटे वन्यजीव अभयारण्य से हाथियों को दूसरी जगह हटाए या फिर हाथियों की वजह से उसे होने वाले नुकसान का मुआवजा दे.

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Pakistan Islamabad Zoo 2016 | Elefant Kaavan
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/A. Naveed

78.64 वर्ग किलोमीटर में फैले आमचांग वन्यजीव अभयारण्य में करीब 50 हाथी हैं, जो अकसर सेना के इलाके में घुस कर तोड़-फोड़ मचाते हैं. सेना का दावा है कि बीते छह महीने में हाथियों के उपद्रव की वजह से 15 लाख का नुकसान हो चुका है. लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों ने सेना के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि वर्ष 2010 से अब तक राज्य में विभिन्न वजहों से लगभग 800 हाथी मारे जा चुके हैं.

खासकर पूर्वोत्तर इलाके में घने जंगलों की वजह से सैन्य शिविरों में हाथियों के घुसने और तोड़-फोड़ करने की समस्या बहुत पुरानी है. सेना हालांकि अपने स्तर पर कंटीली तारों की बाड़ और वॉचटावर की स्थापना जैसे उपाय करती रही है लेकिन वह नाकाफी हैं. जंगली हाथी अकसर बाड़ तोड़ कर सेना के शिविरों और छावनी इलाकों में घुसते रहे हैं. सेना की ओर से अब तक न तो किसी पर्यावरण अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान है और न ही दूसरा कोई उपाय. हाथियों के घुसने की स्थिति में सेना के जवान आग और शोरगुल जैसे तरीकों से उनको भगाते हैं. गंभीर मामलों में वन विभाग को भी सूचना दी जाती है.

15 लाख का भुगतान करे सरकार

असम की राजधानी गुवाहाटी के पास सेना का सबसे बड़ा नारंगी सैन्य स्टेशन है. उसकी करीब छह किलोमीटर लंबी सीमा आमचांग वन्यजीव अभयारण्य से लगी है. अभयारण्य से हाथी अकसर सैन्य इलाके में पहुंच कर तोड़-फोड़ मचाते हैं. इसी मुद्दे पर नारंगी कैंटोनमेंट के 52 सब एरिया के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) मेजर जनरल जारकेन गामलिन ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र भेज कर कहा है कि या तो उक्त अभयारण्य में रहने वाले हाथियों को कहीं और भेजा जाए या फिर सरकार तोड़-फोड़ से हुए नुकसान के मुआवजे के तौर पर 15 लाख की रकम का भुगतान करे. यह पत्र बीती तीन जुलाई को ही लिखा गया था लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ता रोहित चौधरी की ओर से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई एक जानकारी से अब यह बात सामने आई है.

उक्त अभायरण्य में लगभग 50 हाथी हैं. सेना का दावा है कि बीते छह महीनों के दौरान उनमें से तीन हाथियों के हमले से भारी नुकसान पहुंचा है. पत्र में कहा गया है कि नारंगी केंद्र पूर्वोत्तर में सेना का लॉजिस्टिक हब है. 2002 में हाथियों के हमलों पर अंकुश लगाने के लिए सेना ने लोहे की बाड़ लगाने की एक योजना शुरू की थी. लेकिन वन विभाग ने बीते साल यह कहते हुए इस पर आपत्ति जताई थी कि लोहे की नुकीली छड़ों से हाथियों को नुकसान पहुंच रहा है. उसके बाद वह बाड़ हटा ली गई थी.

वन विभाग का कहना है कि नुकीली छड़ों की वजह से वर्ष 2018-19 के दौरान कम से कम दो हाथियों की मौत हो चुकी है और कई अन्य घायल हो चुके हैं. उधर, सेना की दलील है कि बाड़ हटाने के बाद हाथियों के हमले लगातार बढ़ रहे हैं. इससे छावनी में रहने वाले लोगों और आधारभूत ढांचे को नुकसान का खतरा बढ़ गया है. सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "तीन हाथियों का एक झुंड सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है. पहले हाथी बड़े झुंड में आते थे. लेकिन बिना कोई नुकसान पहुंचाए लौट जाते थे. लेकिन अब बीते कुछ सप्ताह से उनके हमले बढ़ गए हैं.”

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वन्यजीव विशेषज्ञ सहमत नहीं

असम सरकार ने हालांकि सेना के इस पत्र पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई है. लेकिन राज्य के वन्यजीव विशेषज्ञ आमचांग अभयारण्य से हाथियों को दूसरी जगह भेजने के सेना के प्रस्ताव के खिलाफ हैं. वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) के सुंक्त निदेशक डॉ. रथीन बर्मन कहते हैं, "सेना का प्रस्ताव अव्यवहारिक और बेहद जटिल है. हाथी जैसे विशालकाय जीव को इतनी आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाना संभव नहीं है. इसके लिए बड़े पैमाने पर संसाधनों के अलावा जरूरी तंत्र और मोटी रकम की जरूरत होगी.” वे कहते हैं कि सरकार को उक्त अभयारण्य में रहने वाले हाथियों के लिए एक दीर्घाकालीन योजना बनानी होगी ताकि वह भोजन की तलाश में सेना की छावनी की ओर नहीं जाएं. जंगल और पर्यावरण के हित में काम करने वाले संगठन आराण्यक के महासचिव डॉ. विभव तालुकदार कहते हैं, "हाथियों को एक से दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं है. इससे सामयिक तौर पर मौजूदा समस्या भले हल हो जाए. लेकिन हाथियों को जिस नई जगह पर छोड़ा जाएगा वहां गंभीर समस्या पैदा हो सकती है. इसकी बजाय इन जानवरों के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था करने जैसे वैकल्पिक उपाय पर जोर दिया जाना चाहिए.”

वन्यजीव विशेषज्ञ और असम वन विभाग के मानद वाइल्डलाइफ वॉर्डन कौशिक बरुआ कहते हैं, "सेना को भी अपने स्तर पर हाथियों को दूर रखने के लिए कुछ ठोस कदम उठाना चाहिए. उसे इन जानवरों को भोजन देना बंद करना चाहिए और साथ ही अपने कचरे के समुचित प्रबंधन का इंतजाम करना चाहिए.” बरुआ बताते हैं कि पहले वह पूरा इलाका आमचांग जंगल के तहत था. सेना की छावनी तो वहां बाद में बनी, वह इलाका हमेशा हाथियों का घर रहा है.

बढ़ रही है हाथियों की तादाद

असम में हाथियों की तादाद लगातार बढ़ रही है. इसके साथ ही इंसानों के साथ उनका संघर्ष और हादसों में होने वाली मौतों की तादाद भी हाल के वर्षों में बढ़ी है. वन मंत्री परिमल शुक्लवैद्य बताते हैं, "वर्ष 2010 से 2018 के बीच मोटे अनुमान के मुताबिक राज्य में इस संघर्ष में 750 हाथियों की मौत हो चुकी है. अकेले वर्ष 2019 में 60 हाथियों की अप्राकृतिक मौत हुई थी.” असम सरकार ने बीते साल विधानसभा में बताया था कि वर्ष 2010 से 2018 के बीच हाथियों के हमले में 761 लोगों की मौत हो चुकी है.

यहां इस बात का जिक्र भी प्रासंगिक है कि देश भर में असम में ही सबसे ज्यादा पालतू हाथी हैं. इनमें से कुछ वन विभाग के पास हैं और बाकी आम लोगों के. बीते साल तक के आंकड़ों के मुताबिक देश में 2,675 ऐसे हाथियों में से 905 अकेले असम में थे. वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि हाथियों की बढ़ती तादाद की वजह से जंगल में उनके भोजन की कमी होने लगी है. इसके चलते वह इंसानी बस्तियों और सेना की छावनियों तक पहुंचने लगे हैं. ऐसे में सरकार को ऐसी ठोस योजना बनानी होगी ताकि हाथियों को जंगल में ही पर्याप्त भोजन मिल सके. इसमें वन्यजीव विशेषज्ञों और गैर-सरकारी संगठनों की मदद भी ली जा सकती है.

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