आधुनिक मानव और निएंडरथाल के बीच कितना अंतर था?

मानव की उत्पत्ति का रहस्य अब भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी पहेली है. रेंगने वाले जीव से इंसान के विकास तक की दास्तान तो छोड़िए इंसान की ही अलग अलग प्रजातियों का सफर कैसे चला यह नहीं सुलझ पा रहा है. एक नई बात पता चली है.

मानव की उत्पत्ति का रहस्य सुलझाने में लगे वैज्ञानिक अब उन्नत डीएनए तकनीकों पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं. इससे उन्हें हमारे प्राचीन पूर्वजों के समय जीवाश्मों का पता लगाने के लिए "मॉलिक्यूलर क्लॉक" मिलता है. 

हालांकि हाल ही में वैज्ञानिकों को जीवाश्म में मिले दांतों का परीक्षण करने की एक नई तकनीक का पता चला जो निएंडरथाल और आधुनिक मानव के बीच के विस्तार को पहले की तुलना में बहुत ज्यादा बता रहा है. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की आईदा गोमेज रॉबल्स का कहना है कि दोनों प्रजातियों का जो आखिरी पूर्वज था वह कम से कम 8 लाख साल पहले धरती पर था.

इसके साथ ही मानव शास्त्रियों के बीच गर्म रहने वाली बहस में एक नई कहानी जुड़ गई है. नई टाइमलाइन मौजूदा टाइमलाइन की तुलना में 2 से 4 लाख साल पुरानी है. अगर यह दावा सच निकलता है तो होमो हाइडेलबेरगेंसिस खारिज हो जाएगा. यह एक और मानव की प्रजाति है जो लुप्त हो चुकी है. यह होमो सेपियंस और हमारे नजदीकी पूर्वज निएंडरथाल के बीच में आती है.

फाइल

गोमेज रोबल्स का रिसर्च पेपर बुधवार को साइंस एंडवांसेज में प्रकाशित हुआ है. इस रिसर्च पेपर के मुताबिक हाल ही में होमिनिन दांतों की रिसर्च ने दिखाया है कि मानव प्रजातियों के आकार में भले ही अंतर हो लेकिन उनके दांत के आकार में समानता है और सभी प्रजातियों में इनके विकास की गति सुदृढ़ रही है. रॉबल्स ने 30 जीवाश्मों की दाढ़ और उससे आगे के चबाने वाले दांतों का परीक्षण किया. इन्हें पहले स्पेन से मिले निएंडरथाल और सात दूसरी लुप्त हो चुकी प्रजातियों का दांत माना जाता था. वो यह जानना चाहती थीं कि समय के साथ इनमें कितना बदलाव हुआ.

2014 की एक स्टडी में चमक तकनीक और पुराचुम्बकत्व तरीके से अध्ययन में स्पेन की इन गुफाओं का भरोसेमंद तरीके से समय बताया गया था. स्पेन के एतापुएर्का पहाड़ों की इन गुफाओं का काल 4 लाख 30 हजार साल पहले का बताया गया. इससे यह संकेत मिला कि सेपियंस और निएंडरथाल इससे पहले ही अलग हो गए थे.

कंप्युटर मॉडलिंग का इस्तेमाल कर उन्होंने पता लगाया है कि सिमा दातों में जो खास गुण नजर आए हैं उसका मतलब है कि सेपियंस और निएंडरथाल 8 लाख साल पहले ही अलग हो गए थे. इसमें उन्होंने मजबूत जलवायु कारणों को खारिज किया है जिसके कारण प्रजातियों का विकास ज्यादा तेजी से हुआ. रॉबल्स ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि होमो हाइडेलबेरगेंसिस आधुनिक मानव और निएंडरथाल दोनों का पूर्वज नहीं हो सकता."

चेन्नई की खोज से उलझी मानव इतिहास की कहानी

वैज्ञानिकों ने यह अनुमान चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर अत्तिरमपक्कम में मिले 7200 पत्थर के औजारों को देखने और उनकी पड़ताल करने के बाद किया है.

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इन औजारों की आयु 385,000 साल से 172,000 साल के बीच मध्य पुरापाषाण युग के शुरू होने से पहले की मानी जा रही है. यह युग 125000 साल पहले शुरू हुआ था.

चेन्नई की खोज से उलझी मानव इतिहास की कहानी

वैज्ञानिकों को चेन्नई में जो हथियार मिले हैं वे काफी उन्नत किस्म के है जिन्होंने 400000 साल पहले के पुराने औजारों की जगह ली थी.

चेन्नई की खोज से उलझी मानव इतिहास की कहानी

इन हथियारों की खोज ने धरती पर इंसान के पैदा होने की अब तक चली आई मान्यता ध्वस्त कर दी है और पहले माना जाता था कि इंसान के पूर्वज होमो सेपियंस का 3 लाख साल पहले अफ्रीका में अभ्युदय हुआ था.

चेन्नई की खोज से उलझी मानव इतिहास की कहानी

बाद में वे दुनिया के दूसरे हिस्सों में गए और वहीं बसने लगे. हालांकि इस बात पर वैज्ञानिकों में मतभेद है कि यह कब और कैसे हुआ? यह भी साफ नहीं है कि वे अकेले गए या फिर समुदाय के साथ.

चेन्नई की खोज से उलझी मानव इतिहास की कहानी

एक हफ्ते पहले ही इस्राएल में इंसान का एक जबड़ा मिला जिससे पता चला कि इंसान ने 180000 साल पहले अफ्रीका को छोड़ दूसरे इलाकों में जाना शुरू किया.

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अब तक माना जाता था कि अफ्रीका और यूरोप में 3-4 लाख साल पहले पत्थरों से औजार बनने लगे थे और भारत में यह 125,000 साल पहले शुरू हुआ लेकिन औजारों की नई खोज ने कहानी बदल दी है.

चेन्नई की खोज से उलझी मानव इतिहास की कहानी

वैज्ञानिकों का कहना है कि औजारों के पास कोई जीवाश्म नहीं मिला है इसलिए थोड़ा सावधानी बरतने की जरूरत है क्योंकि पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इसे होमो सेपियंस ने बनाया या किसी और जीव ने.

चेन्नई की खोज से उलझी मानव इतिहास की कहानी

चेन्नई में रिसर्च का नेतृत्व कर रही प्रोफेसर शांति पप्पू ने कहा, "अफ्रीका और यूरोप के बाहर मध्य पाषाणयुग में परिवर्तन को समझना यूरेशिया में मानव जीवन को समझने के लिए अनिवार्य है. खासतौर से रूप रंग और उससे जुड़ा आधुनिक मानव का अफ्रीका में और अफ्रीका से बाहर प्रवासन."

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मानव का इतिहास जानने की कहानी के टुकड़े जोड़ना बेहद जटिल है. वैज्ञानिक अकसर खुदाई में मिले औजारों और जीवाश्मों से इस कहानी को पूरी करने की कोशिश करते हैं.

इस खोज से लंबे समय से चली आ रही बहस खत्म नहीं होगी, ना ही यह बहस कमजोर होगी क्योंकि डीएनए आधारित डेटिंग की तकनीक से जिसका यह विरोध करती है वह भी इन्हीं धारणाओं पर भरोसा करता है कि समय के साथ जेनेटिक्स में कितना तेज बदलाव होता है.

गोमेज रॉबल्स का कहना है कि कोई भी तरीका पक्का नहीं है, लेकिन शारीरिक बदलाव का अध्ययन "हमें ज्यादा सही तस्वीर देता है." इसकी एक वजह यह भी है कि सबसे ज्यादा प्राचीन जीवाश्मों से डीएनए हासिल कर पाना अब भी संभव नहीं है. इसके साथ ही विकसित हो रहे शरीर का अलग अलग टाइमलाइन इस बात का भी सबूत है कि अलग अलग प्रजातियों के बीच कोई साफ विभाजन नहीं था.

एनआर/एमजे (एएफपी)

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