इतिहास में आज: एक सितंबर

47 साल पहले आज ही के दिन लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी ने सैन्य तख्तापलट के बाद खुद को लीबिया का शासक घोषित किया.

लीबिया यूनिवर्सिटी के बेनगाजी कॉलेज में पढ़ने के दौरान गद्दाफी ने सेना में भर्ती होने का फैसला किया. पढ़ाई छोड़ दी. पुलिस रिकॉर्ड खराब होने के बावजूद रॉयल मिलिट्री अकादमी में उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई. 1960 के दशक में लीबिया में राजा इदरिस की सरकार के खिलाफ जन असंतोष बढ़ने लगा. उन्हें इस्राएल का करीबी माना जाता था. गद्दाफी ने इसे भांप लिया. अकादमी में ट्रेनिंग ब्रिटिश सैन्य अफसर दिया करते थे. टेस्ट के दौरान गद्दाफी ने अंग्रेजी बोलने से मना कर दिया, इसके चलते उन्हें फेल कर दिया. इसी दौरान यह भी शक हुआ कि 1963 में अकादमी के कमांडर की हत्या में वो शामिल हैं. हालांकि बड़े सैन्य अफसरों ने गद्दाफी का बचाव किया. धीरे धीरे गद्दाफी सेना के भीतर ही अपने विश्वस्त लोगों का एक गुट बनाते गए.

सेना की नौकरी के साथ गद्दाफी जनांदोलनों में भी शिरकत करते रहे. इसी दौरान 1966 में तीसरे इस्राएल-अरब जगत के बीच चले छह दिन के युद्ध में अरब देशों की बुरी हार हुई. मिस्र समेत अरब जगत की ऐसी हार के लिए इस्राएल और पश्चिमी देशों को जिम्मेदार ठहराया गया. विवाद को धर्म युद्ध जैसा नाम दिया गया. राजा इदरिस को खुले तौर पर इस्राएल का समर्थक करार दिया गया. उनके खिलाफ असंतोष अब और सुलग गया.

एक सितंबर 1969 की सुबह गद्दाफी की अगुवाई में विद्रोहियों ने राज परिवार को बंधक बना लिया. त्रिपोली को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया. गद्दाफी ने खुद को शासक घोषित किया और देश को लीबिया अरब गणतंत्र नाम दिया. पूरे घटनाक्रम को पहली सितंबर की क्रांति कहा गया. खुद को सुधारवादी कहने वाले गद्दाफी ने शुरुआत में समाजवादी नीतियां भी अपनाई. लेकिन धीरे धीरे वक्त के साथ वो कट्टर होते गए. उन्होंने अपने विरोधियों की हत्याएं करवाई, दूसरे देशों में भी उन पर हमले कराए. 1988 के लॉकरबी हमले के बाद पश्चिम से उनके रिश्ते बिगड़ते चले गए. अमेरिकी यात्री विमान में हुए बम हमले में 243 लोग मारे गए.

इसके बाद गद्दाफी भी पश्चिम विरोधी होते गए. वो धार्मिक उन्मांद का भी सहारा लेने लगे. साथ ही खुद भी विलासिता में डूबे रहने लगे. उनकी छवि महिलाओं से बलात्कार, कुछ लोगों को बेशकीमत तोहफे देने और विरोधियों की कहीं भी हत्या कराने वाले शासक की बन गई.

लेकिन 2011 के ट्यूनीशिया से शुरू हुए अरब वसंत को गद्दाफी सही तरह नहीं भांप सके. उनके देश में भी प्रदर्शन हुए. कई कबीलों वालों लीबिया में कुछ गुट उनके खिलाफ हथियारबंद संघर्ष भी करने लगे. शुरुआत में गद्दाफी ने विरोधियों को सेना के जरिए कुचलने की कोशिश की, लेकिन बाद में फ्रांस की मदद से विरोधियों ने आखिर गद्दाफी को सिमटने पर मजबूर कर दिया. 20 अक्टूबर 2011 को गद्दाफी विरोधियों के हाथ लग गए. उनका वहीं अंजाम हुआ जो तानाशाहों का होता है. कभी खुद विद्रोही रहे गद्दाफी नए विरोधियों के हाथों मारे गए.

कार्टूनों में लोकतंत्र

राजनीतिक उलझन

जर्मन कार्टूनिस्ट रोजर श्मिट के लिए दुनिया उल्टी हो गई है. वामपंथी पार्टी सामाजिक फायदों को काटना चाहती हैं और रूढ़िवादी ऊर्जा परिवर्तन के पक्ष में हैं. श्मिट पूछते हैं, ''किसे या किस चीज के लिए मैं वोट दूं? किसी की स्थिति साफ नहीं और पार्टियों में सच्चाई की कमी है.'' पेशे से इंजीनियर श्मिट को कार्टून बनाना खूब पसंद है.

कार्टूनों में लोकतंत्र

अगर बैलेट बॉक्स बोल पाते

मिस्र के कार्टूनिस्ट जेएफ अंदील कहते हैं, ''अगर अमेरिका ने लोकतंत्र पेश नहीं किया होता तो शायद आप मध्य पूर्व के लोगों को इस तरह की सरकार के लिए समझा लेते.'' अंदील जब 19 साल के थे तब अपने देश की हालात पर व्यंग वाले स्केच बनाने लगे. इसस कार्टून में यहां तक कि बैलेट बॉक्स भी गड़बड़ी की शिकायत कर रहा है.

कार्टूनों में लोकतंत्र

हम किधर जा रहे हैं?

''अमेरिका ऐसा लोकतंत्र है जहां कई आवाजें हैं और सभी अलग अलग बातें बोल रहे हैं. बाएं मुड़िए, अंकल सैम, दाएं मुड़िए तो भी, लेकिन रेगिस्तान में आप किसी ओर नहीं जा सकते.'' सुधारों वाले अपने देश अमेरिका को कार्टूनिस्ट माइक लेस्टर इस तरह परिभाषित करते हैं. उन्होंने अपने कार्टूनों के लिए कई अवॉर्ड जीते हैं.

कार्टूनों में लोकतंत्र

गंभीर संकट में सीरिया

काहिरा के गोमा फरहत कार्टून की दुनिया के पुराने महारथी हैं. उनके तीखे व्यंग मिस्र में तो पसंद किए ही जाते हैं, वह अमेरिकी, यूरोपीय और एशियाई अखबारों के लिए भी लगातार काम करते हैं. फरहत का कहना है कि मिस्र में लोकतंत्र लड़खड़ा रहा है और चुनावी सुधार एक गंभीर समस्या हैं, लेकिन सीरिया में तो आपदा की स्थिति है.

कार्टूनों में लोकतंत्र

हर चीज के लिए कानून

हॉपसी के नाम से सक्रिय पीटर टेमेसी ने कंप्यूटर गेम और विज्ञापन के लिए ढेरों ग्राफिक बनाए हैं. अब उनकी नजर लोकतंत्र पर है. हंगरी में लोकतंत्र है लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी पर काफी पाबंदियां हैं. उनका कहना है, ''हमारे प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान कानून बनाते हैं और उनका इस्तेमाल किसी भी चीज के लिए संभव है.''

कार्टूनों में लोकतंत्र

सब कुछ नियंत्रण में

''रूसी लोकतंत्र के लिए अब बहुत देर हो चुकी है. पुतिन ने पूरे देश को अपने कब्जे में ले रखा है.'' रूस के बारे में यह राय कार्टूनिस्ट डेनिस लोपाटिंस की है. 2007 से ही उनके स्केच पर लगातार पाबंदियां लगती रही हैं. म्यूजियम से यहां की तस्वीर गायब हो गई और किसी को कुछ पता नहीं चला. अब वो सिर्फ फूल बनाते हैं.

कार्टूनों में लोकतंत्र

लोकतंत्र का पालना

दुनिया भर में मशहूर ग्रीक कार्टूनिस्ट बास मित्रोपुलोस का कहना है, ''ग्रीस लोकतंत्र का पर्यायवाची था, है और हमेशा रहेगा.'' 76 साल के इस बुजुर्ग कार्टूनिस्ट का कहना है, ''इस वक्त लोगों को सख्त आर्थिक कटौतियों के साथ चलना पड़ रहा है. इससे सामाजिक शांति खतरे में पड़ सकती है. हम उम्मीद करते हैं कि लोकतंत्र का झंडा बुलंद रहेगा.''

कार्टूनों में लोकतंत्र

यूरो को जिंदा करने की कोशिश

अंटोनियो मेसामादेरो कभी एक अखबार के लिए हॉकर का काम करते थे. अब वो खुद पत्रकार और कार्टूनिस्ट हैं. उनका कहना है, ''स्पेन के ज्यादातर राजनेता अपने लिए खिचड़ी का सबसे बड़ा हिस्सा चाहते हैं. भ्रष्टाचार यहां अब नियम बन गया है.'' वह कहते हैं कि लोकतंत्र तो अपनी सबसे खराब स्थिति में है.

कार्टूनों में लोकतंत्र

हम सब राजी हैं, है न?

मिस्र के कार्टूनिस्ट गोमा फरहत मानते हैं कि कई अरब देशों में लोकतंत्र महज एक छलावा है. उनके मुताबिक, ''सच्चाई यह है कि तानाशाही ने लोगों को बांध रखा है, जो या तो एक परिवार या फिर सरकार चला रही है.'' इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि धार्मिक कट्टरपन की वजह से लोकतंत्र के पास ज्यादा मौके नहीं हैं.

कार्टूनों में लोकतंत्र

सत्ता के खेल

पत्थर, कागज, कैंचियां, कार्टूनिस्ट के लिए काफी हैं. ओलेग स्माल कहते हैं, ''आधिकारिक रूप से यूक्रेन में कोई सेंशरशिप नहीं, लेकिन आलोचना से त्यौरियां चढ़ जाती है.'' स्माल को अब बहुत मुश्किल से ही कोई काम मिलता है.

हमें फॉलो करें