इतिहास में आज: 6 अक्टूबर

जापान पर अमेरिका के परमाणु हमले के बाद सोवियत संघ बेचैन हो उठा. और फिर 6 अक्टूबर 1951 को एटमी हथियारों की होड़ का एलान कर दिया गया.

छह अक्टूबर 1951 की सुबह सोवियत संघ के प्रमुख अखबार प्रावदा के पहले पन्ने पर जोसेफ स्टालिन का इंटरव्यू छपा. इस इंटरव्यू के जरिये दुनिया को पता चला कि सोवियत संघ ने भी परमाणु बम बना लिया है. स्टालिन ने कहा, "हाल ही में हमारे देश में एक किस्म के परमाणु बमों का परीक्षण किया गया है. अलग अलग क्षमताओं वाले एटम बमों का परीक्षण भविष्य में किया जाएगा और ब्रिटिश और अमेरिकी ब्लॉक के आक्रमक रुख से देश को बचाने की योजना है." यह पहला मौका था जब सोवियत संघ के किसी नेता ने सार्वजनिक रूप से परमाणु बम बनाने की बात स्वीकार की.

अगस्त 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका के परमाणु हमलों के बाद दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ. महायुद्ध में एक तरफ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ जैसे मजबूत मित्र देश थे, तो दूसरी तरफ जर्मनी, इटली और जापान जैसे धुरी देश. लेकिन अमेरिका के एटमी हमले के फौरन बाद सोवियत संघ को यह अहसास होने लगा कि अमेरिका बहुत ही ज्यादा ताकतवर हो गया है. मॉस्को को लगा कि वॉशिंगटन ने एटमी हथियारों की बात उससे छुपाई. इससे पश्चिम और सोवियत संघ के बीच अविश्वास पैदा हो गया. और शीत युद्ध की शुरुआत हो गई.

(आज किस देश के पास कितने एटम बम हैं)

रूस

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) के मुताबिक परमाणु हथियारों की संख्या के मामले में रूस सबसे आगे है. 1949 में पहली बार परमाणु परीक्षण करने वाले रूस के पास 8,000 परमाणु हथियार हैं.

अमेरिका

1945 में पहली बार परमाणु परीक्षण के कुछ ही समय बाद अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु हमला किया. सिप्री के मुताबिक अमेरिका के पास आज भी 7,300 परमाणु बम हैं.

फ्रांस

यूरोप में सबसे ज्यादा परमाणु हथियार फ्रांस के पास हैं. उसके एटम बमों की संख्या 300 बताई जाती है. परमाणु बम बनाने की तकनीक तक फ्रांस 1960 में पहुंचा.

चीन

एशिया में आर्थिक महाशक्ति और दुनिया की सबसे बड़ी थल सेना वाले चीन की असली सैन्य ताकत के बारे में बहुत पुख्ता जानकारी नहीं है. लेकिन अनुमान है कि चीन के पास 250 परमाणु बम हैं. चीन ने 1964 में पहला परमाणु परीक्षण किया.

ब्रिटेन

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य ब्रिटेन ने पहला परमाणु परीक्षण 1952 में किया. अमेरिका के करीबी सहयोगी ब्रिटेन के पास 225 परमाणु हथियार हैं.

पाकिस्तान

अपने पड़ोसी भारत से तीन बार जंग लड़ चुके पाकिस्तान के पास 100-120 परमाणु हथियार हैं. 1998 में परमाणु बम विकसित करने के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कोई युद्ध नहीं हुआ है. विशेषज्ञों को डर है कि अगर अब इन दोनों पड़ोसियों के बीच लड़ाई हुई तो वह परमाणु युद्ध में बदल सकती है.

भारत

1974 में पहली बार और 1998 में दूसरी बार परमाणु परीक्षण करने वाले भारत के पास 90-110 एटम बम हैं. चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद के बावजूद भारत ने वादा किया है कि वो पहले परमाणु हमला नहीं करेगा. साथ ही भारत का कहना है कि वह परमाणु हथियार विहीन देशों के खिलाफ भी इनका प्रयोग नहीं करेगा.

इस्राएल

1948 से 1973 तक तीन बार अरब देशों से युद्ध लड़ चुके इस्राएल के पास करीब 80 नाभिकीय हथियार हैं. इस्राएल के परमाणु कार्यक्रम के बारे में बहुत कम जानकारी सार्वजनिक है.

उत्तर कोरिया

पाकिस्तान के वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान की मदद से परमाणु तकनीक हासिल करने वाले उत्तर कोरिया के पास कम से कम छह परमाणु हथियार हैं. उत्तर कोरिया का असली विवाद दक्षिण कोरिया से है. तमाम प्रतिबंधों के बावजूद 2006 में उत्तर कोरिया ने परमाणु परीक्षण किया.

सोवियत संघ ने बिना देर किये परमाणु हथियार बनाने का काम शुरू कर दिया. स्टालिन ने यह भी कहा, "इन परिस्थितियों ने सोवियत संघ को परमाणु हथियार बनाने के लिए विवश किया है ताकि आक्रामक देशों के खिलाफ तैयार रहा जा सके." स्टालिन ने परमाणु हथियारों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने कई बार परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की, लेकिन अटलांटिक ब्लॉक (अमेरिका-ब्रिटेन) ने हमेशा इस मांग को खारिज किया.

सोवियत संघ के एटम बम बनाने के एलान के साल भर बाद ब्रिटेन ने 3 अक्टूबर 1952 को पहली बार एटम बम बनाने का दावा किया. फिर तो होड़ ही शुरू हो गई. 1960 में फ्रांस इस होड़ में शामिल हुआ. फिर चीन, इस्राएल, भारत और पाकिस्तान भी एटमी हथियारों की एटमी शक्ति बन गए. अब उत्तर कोरिया भी इस होड़ में शामिल हो चुका है. लीबिया और ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी संदेह के घेरे में आ चुका है.

(दुनिया भर की सेनाओं के पास सोवियत संघ के हथियार)

राजनीति

मिखाईल कलाश्निकोव की राइफल

30 राउंड वाली एके 47 दुनिया की सबसे ज्यादा पहचानी जाने वाली राइफल है. सोवियत इंजीनियर मिखाईल कलाश्निकोव ने यह ऑटोमैटिक राइफल दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बनाई थी. सस्ती और भरोसे लायक होने की वजह से यह राइफल कई सेनाओं में बहुत जल्दी लोकप्रिय हुई. आज की तारीख में कई गुरिल्ला समूह और आपराधिक गिरोहों समेत दुनिया भर की कई सेनाएं इस बंदूक को इस्तेमाल कर रही हैं.

राजनीति

बंदूक जो पहुंची अंतरिक्ष

9 एमएम की मार्कोव पिस्तौल का इस्तेमाल 1951 में हुआ. यह पिस्तौल सोवियत सेना, पुलिस और विशेष बल में प्रयोग की जाती थी. यहां तक कि सोवयत के अंतरिक्ष यात्री इसे अपनी खास किट में रख कर स्पेस की यात्रा पर गए. ये पिस्तौल उन्हें इसलिए दी गयी थी कि अगर वे किसी मुसीबत में फंस जायें तो इसका इस्तेमाल कर सकें

राजनीति

अब भी उड़ रहा है मिग-29

मिग-29 1980 के शुरुआती सालों में बनना शुरू हुआ और इसकी गतिशीलता और चुस्ती की वजह से इसे खूब तारीफें मिलीं. हालांकि नाटो फाईटर्स और सुखोई ने अब इसे पीछे कर दिया है, लेकिन इसके कई विमान अब भी युद्धों में इस्तेमाल हो रहे हैं. रूसी वायुसेना सीरिया में इस्लामिक स्टेट को निशाना बनाने के लिए मिग-29 का इस्तेमाल कर रही है.

राजनीति

द्वितीय विश्व युद्ध से अब तक

रेड आर्मी ने द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मन सैनिकों के खिलाफ विनाशकारी प्रभाव के लिए कत्युशास ट्रक का इस्तेमाल किया था. इन आर्मी ट्रकों में कई रॉकेट लॉन्चर जुड़े हुए थे. ये ट्रक काफी सस्ते थे और इन्हें आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता था. इन ट्रकों को आज भी इस्तेमाल में लाया जा रहा है. ईरान-इराक युद्ध, लेबनान युद्ध, सीरियाई गृह युद्ध समेत कई लडाइयों में अब भी कई सेनाएं इसका इस्तेमाल कर रही हैं.

राजनीति

विशालकाय एस-300 वायु रक्षा तंत्र

साल 2016 में रूस ने ईरान को उन्नत हवाई रक्षा प्रणाली बेची थी. शीत युद्ध-युग संस्करण के एस-300 150 किलोमीटर दूर तक वार कर सकते थे. इसके नए संस्करणों को और सक्षम बनाया गया है, जो 400 किलोमीटर दूर तक वार कर सकते हैं. भारत और चीन दोनों एडवांस एस-300 को खरीदने का विचार कर रहे हैं.

राजनीति

ड्रैगुनोव स्नाईपर राइफल

ड्रैगुनोव स्नाईपर राइफल सोवियत आर्मी में पहली बार 1963 में इस्तेमाल होना शुरू हुई थीं. तब से अब तक ये दुनिया भर के कई देशों में जा चुकी हैं. इन राइफलों का कथित तौर पर वियतनाम में अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था. 2015 में कुछ तस्वीरें सामने आई थीं, जिसमें इस्लामिक स्टेट की सेना के पास ड्रैगुनोव स्नाईपर राइफल दिख रही थीं.

राजनीति

टी -34, एक युग का प्रतीक

रेड आर्मी की जर्मनी पर जीत के श्रेय का एक बड़ा हिस्सा टी-34 के नाम जाता है. टी-34 का लड़ाईयों में पहली बार 1941 में इस्तेमाल किया गया था. युद्ध में आजमाई गयी टी-34 तोपें बाद में दुनियाभर में सबसे ज्यादा बनाए जाने वाले टैंक साबित हुए. रूसी सेना अब भी इस तोप को विजय दिवस परेड में सबसे आगे खड़ा कर इसे सम्मान देती है.