इतिहास में आज: 9 अक्टूबर

साल 2012 में आज ही के दिन तालिबान की गोली ने मलाला के सिर को तो भेद दिया था. मगर कोई उसके हौसले पस्त नहीं कर पाया.

लड़कियों की शिक्षा के लिए प्रचार में अहम भूमिका रखने के कारण तालिबान ने मलाला को 9 अक्टूबर 2012 को अपनी गोली का निशाना बनाया जब वह स्कूल से घर जा रही थी. 16 साल की बच्ची पर बंदूकधारियों की गोलियों की बौछार ने पूरी दुनिया को हिला दिया. इस हादसे के बाद कुछ दिनों तक पाकिस्तान में इलाज के बाद मलाला को ब्रिटेन भेज दिया गया, जहां बर्मिंघम के क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल में उसका इलाज हुआ. मलाला इस समय अपने परिवार के साथ बर्मिंघम में ही रह रही है.

मुश्किल में पाकिस्तान

टीवी चैनल पर कब्जा

पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ और कनाडा से लौटे मौलवी ताहिर उल कादरी के समर्थकों ने सोमवार को राष्ट्रीय टीवी चैनल पीटीवी की इमारत पर कब्जा कर लिया. प्रदर्शनकारियों के नियंत्रण के बाद पीटीवी का अंग्रेजी प्रसारण बंद है.

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प्रधानमंत्री लाहौर में

इससे पहले प्रदर्शनकारियों ने राजधानी इस्लामाबाद में संसद और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आवास पर धावा बोला. अनहोनी की आशंका को देखते हुए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इस्लामाबाद छोड़कर अपने गृह राज्य पंजाब चले गए. पंजाब में नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग एन की अच्छी पकड़ है.

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प्रदर्शनकारियों पर सख्ती

प्रधानमंत्री के इस्तीफे के मांग कर रहे उग्र प्रदर्शनकारियों को काबू में करने के लिए इस्लामाबाद में पुलिस ने आंसू गैस और रबर की गोलियां फायर की. फायरिंग में कम से कम तीन लोगों की मौत हुई. सैकड़ों घायल हैं.

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दो नेता, एक मकसद

सरकार विरोधी प्रदर्शनों की अगुवाई इमरान खान और सुन्नी मौलवी ताहिर उल कादरी (तस्वीर में) कर रहे हैं. दोनों नेता चुनावी प्रक्रिया में सुधार की मांग कर रहे हैं. दोनों का आरोप है कि बीते साल हुए चुनावों में शरीफ ने बड़े पैमाने पर धांधली की.

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बातचीत की गुंजाइश

इमरान खान ने रविवार को बातचीत की किसी संभावना से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, "मैं सभी पाकिस्तानियों ने अपील करता हूं कि वो इस सरकार के खिलाफ खड़े हो. यह एक संवैधानिक सरकार नहीं है, ये हत्यारे हैं." सरकार का कहना है कि वो विपक्ष के साथ बातचीत के लिए तैयार है.

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बड़े मार्च की शुरुआत

14 अगस्त को सरकार विरोधी हजारों प्रदर्शनकारियों ने लाहौर से इस्लामाबाद के लिए मार्च करना शुरू किया. पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक मार्च में दो लाख प्रदर्शनकारियों ने हिस्सा लिया. उन्हें रोकने के लिए सरकार ने कई रास्ते भी बंद किए लेकिन इस्लामाबाद पहुंचने के बाद प्रदर्शन उग्र हो गए. ये अब भी जारी हैं.

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सिस्टम से झल्लाहट

विशेषज्ञों का कहना है कि कई पाकिस्तानी लचर कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, बिजली की कमी और महंगाई जैसी समस्याओं की वजह से झल्लाए हुए हैं. वो बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं. हालांकि कई लोगों का यह भी आरोप है कि खान और कादरी लोगों के गुस्से का राजनीतिक फायदा उठा रहे हैं.

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पर्दे के पीछे कौन

लोकतंत्र समर्थकों को लगता है कि प्रदर्शनों के पीछे पाकिस्तानी सेना का हाथ है. नवाज शरीफ का भारत के साथ संबंध सुधारने की पहल करना सेना को नागवार गुजर रहा है. शरीफ और पाकिस्तानी सेना के बीच अफगान नीति को लेकर भी मतभेद हैं.

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तख्ता पलट का नया रास्ता

अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जरनल में 27 अगस्त को एक रिपोर्ट छपी. रिपोर्ट में कहा गया है कि शरीफ और सेना के बीच इस बात को लेकर समझौता होने जा रहा है कि "प्रधानमंत्री सुरक्षा मामलों और रणनीति के लिहाज से अहम विदेश नीति के मामलों का नियंत्रण छोड़ देंगे."

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सेना की मध्यस्थता

अमेरिकी अखबार में छपी रिपोर्ट के एक दिन बाद 28 अगस्त को नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख राहिल शरीफ से हालात संभालने की गुजारिश की. सेना अब मध्यस्थ की भूमिका निभा रही है.

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सेना के हाथ में चाबी

1947 में मिली आजादी के बाद से अब तक पाकिस्तान की कमान ज्यादातर वक्त सेना के हाथ में रही है. विशेषज्ञों को लगता है कि मौजूदा सरकार के खिलाफ हो रहे है प्रदर्शन लोकतंत्र की मदद करने के बजाए सेना को दखल देने का मौका देंगें.

पाकिस्तान सहित पूरी दुनिया में मलाला पर हमले की निंदा हुई. पाकिस्तान की औरतों ने उसके लिए सार्वजनिक तौर पर दुआएं मांगीं और तालिबान के खिलाफ प्रदर्शन किया. कराची और दूसरे शहरों में बच्चियों ने सड़कों पर निकल कर मलाला का समर्थन किया और तालिबान के खिलाफ नारे लगाए.

मलाला युसुफजई को यूरोपीय संघ के प्रतिष्ठित सखारोव मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके पहले 2011 में उसे पाकिस्तान के अहम शांति पुरस्कार से नवाजा गया था. इसके अलावा इस हादसे से पहले उसके एक ब्लॉग ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उसकी पहचान बना दी थी. वह अपने पिता के स्कूल में पढ़ने जाती थी, जिसे 2009 में तालिबान के उपद्रव की वजह से कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ा. बाद में उसने पढ़ाई जारी रखी और तालिबान की धमकियों के बाद भी वह स्कूल जाती रही.

इस बीच मलाला की ब्रिटिश पत्रकार क्रिस्टीना लैम्ब के साथ मिल कर लिखी आत्मकथा 'आई एम मलालाः हू स्टुड अप फॉर एजुकेशन एंड वाज शॉट बाइ द तालिबान' भी बाजार में आ गई है. इसमें उसने तालिबान के खिलाफ अपनी लड़ाई, स्वात घाटी में पढ़ाई के लिए अपने संघर्ष, खौफ के साए में वहां बीता उसका बचपन, उस पर हुए हमले और बर्मिंघम के साथ बढ़ रही अपनी दोस्ती का जिक्र किया है.

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