ईरान: क्रांति जो एक बुरा सपना बन कर रह गई

इस्लामी क्रांति के चालीस साल बाद आज ईरान की सरकार मजबूत तो लगती है लेकिन जमशेद बार्जेगर का कहना है कि जितनी हिंसा और सेंसरशिप का इस्तेमाल वह कर चुकी है, अब उसके लिए अपने दिन गिनने का वक्त आ गया है.

चालीस साल पहले जब इस्लामी क्रांति हुई और ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रेजा शाह पहलवी से उनकी गद्दी छिनी, तब मैं केवल सात साल का था. लेकिन मेरी छोटी उम्र मुझे प्रदर्शनों का हिस्सा बनने से नहीं रोक पाई थी. मेरे परिवार के वो सदस्य, जो इस्लामी क्रांति का समर्थन कर रहे थे, मुझे प्रदर्शनों में साथ ले जाया करते थे. ईरान के अन्य कई परिवारों की तरह, मेरा परिवार भी दो धड़ों में बंटा था, एक बड़ा हिस्सा शाह के खिलाफ था और एक छोटा हिस्सा क्रांति के खिलाफ.

शुरुआती महीनों में राजनीतिक चर्चा लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी, फिर चाहे वो घर पर हो या सड़क पर. स्कूल में हमें लाइन लगा कर अयातोल्लाह खोमैनी और उनके सहयोगियों की तारीफ में गीत गाने होते थे. लेकिन कई बार ऐसा भी होता था कि क्रांति के विरोधी हमें सड़क पर घेर लेते थे और हाल ही में सत्ता हाथ में लेने वाले इमाम के खिलाफ नारेबाजी कराते थे. घर में हम बच्चों को अकसर सिखाया जाता था कि खुद को इस मुसीबत से दूर रखना है.

और फिर एक दिन ये सवाल ही खत्म हो गया कि हमें किसके समर्थन में खड़ा होना है. हमें स्कूल से निकाल कर ले जाया जाता था ताकि "क्रांति के विरोधियों" को फांसी पर लटकते हुए देख सकें. आज भी इस्लामी क्रांति का विरोध करने वालों को अपराधियों के रूप में देखा जाता है और उन्हें कड़ी सजा देने के लिए यही वजह काफी होती है.

जमशेद बार्जेगर

फांसी, जेल और देशनिकाला - किसी भी तरह के विरोध को दबाने के लिए इस्लामी नेता इन्हीं हथकंडों का सहारा लेते थे. शुरुआत हुई तख्तापलट के बाद शाह के अधिकारियों और कुछ सेनाध्यक्षों की फांसी से. फिर इसके कुछ ही समय बाद अस्सी के दशक में कई "पूर्व क्रांतिकारियों" को भी मार डाला गया. अधिकतर मामलों में इनकी कोई सुनवाई नहीं हुई थी.

इस्लामी प्रशासन कभी भी प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाने से नहीं कतराया. पहले 2009 में ऐसा हुआ, फिर 2018 में. इसी तरह "सीरियल किलिंग" करवा कर प्रशासन ने साबित कर दिया था कि वह सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. देश में कई लेखकों की हत्या कराई गई थी. जिस दौरान यह हुआ, मैं पत्रकार बन चुका था और ईरान के लेखक संघ का सदस्य भी था.

ये 1998 की बात है. देश के दो राजनीतिक आलोचकों की उनके घर में ही हत्या कर दी गई. दारियुश और परवानेह फरूहर के शव विकृत अवस्था में मिले. इसके दो दिन बाद तेहरान के बाहर रेगिस्तान में दो लेखकों, मोहम्मद मोख्तारी और मोहम्मद जाफर पुयानदेह के शव मिले. ये दोनों भी लेखक संघ के सदस्य थे.

इससे कुछ वक्त पहले ही 20 लेखकों से भरी एक बस को ढलाई पर गिराने की कोशिश की गई थी. उस दौरान हमारे संघ की बैठकें डर से भरी होती थीं. मुझ जैसे युवाओं के लिए ये एक नया तजुर्बा था लेकिन पुराने सदस्य क्रांति के शुरुआती सालों को याद करते थे, जब एक वामपंथी कवि को उसी के शादी में गिरफ्तार कर लिया गया था और बाद में फायरिंग स्क्वॉड ने उसकी जान ले ली थी.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

आक्रोश के बीज

ईरान की इस्लामी क्रांति के बीज कई मायनों में 1963 में पड़े. तत्कालीन शाह, मोहम्मद रजा शाह पहलवी ने श्वेत क्रांति का एलान किया. ये ऐसे आर्थिक और सामाजिक सुधार थे, जो ईरान के परंपरागत समाज को पश्चिमी मूल्यों की तरफ ले जाते थे. इनका विरोध होने लगा.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

शाह के शाही ख्बाव

1973 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में भारी गिरावट आई. इससे ईरान की आमदनी चरमरा गई. लोग संकट में फंसे थे और शाह श्वेत क्रांति के सफल होने के ख्बावों में. इसी दौरान मौलवियों के एक धड़े ने श्वेत क्रांति को इस्लाम पर चोट करार दिया.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

लोग जुटते गए

सितंबर 1978 में ईरान में मोहम्मद रजा शाह पहलवी के खिलाफ प्रदर्शन भड़क उठे. धीरे धीरे मौलवियों के समूह ने प्रदर्शनों का नेतृत्व संभाल लिया. मौलवियों को फ्रांस में रह रहे अयातोल्लाह खोमैनी से निर्देश मिल रहे थे.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

अमेरिका की कठपुतली

लोगों में मोहम्मद रजा शाह की नीतियों के प्रति बहुत आक्रोश था. आलोचक कहते थे कि शाह अमेरिका के इशारों पर नाच रहे थे. लोग इससे खीझ गए थे. शाह ने आक्रोश को शांत करने के बजाए प्रदर्शकारियों को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू कर दिया.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

खूनी संघर्ष

जनवरी 1979 आते आते पूरे ईरान में हालात बिल्कुल गृह युद्ध जैसे हो गए. प्रदर्शनकारी, निर्वासन में रह रहे अयातोल्लाह खोमैनी की वापसी की मांग कर रहे थे. उस समय सेना उन पर गोलियां चला रही थी.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

भाग गए शाह

हालात बेकाबू हो गए. शाह को परिवार समेत ईरान से भागना पड़ा. लेकिन भागने से पहले शाह विपक्षी नेता शापोर बख्तियार को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त कर गए.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

खोमैनी की वापसी

शापोर बख्तियार ने अयातोल्ला खोमैनी को ईरान वापस लौटने की इजाजत दे दी. लेकिन उन्होंने यह शर्त रखी कि प्रधानमंत्री वही रहेंगे.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

लौट आए खोमैनी

बख्तियार से ग्रीन सिग्नल मिलते ही अयातोल्लाह खोमैनी ने 14 साल बाद फ्रांस के निर्वासन से देश वापस लौटने का एलान किया. यह तस्वीर 11 फरवरी 1979 को छपे कायहान अखबार की है.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

तेहरान में स्वागत

12 फरवरी 1979 को खोमैनी एयर फ्रांस की फ्लाइट में सवार होकर पेरिस से तेहरान के लिए निकले. विमान जब तेहरान में लैंड हुआ तो क्रांतिकारी धड़े के नेताओं ने खोमैनी का जोरदार स्वागत किया.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

खोमैनी का सीधा दखल

तेहरान में लोगों को संबोधित करते हुए खोमैनी ने कहा, "मैं सरकार का गठन करुंगा." तेहरान के बेहशत ए जाहरा में उनका भाषण को सुनने के लिए एक लाख से ज्यादा लोग जमा हुए थे.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

समानान्तर सत्ता

खोमैनी ने लोगों से बख्तियार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी रखने की अपील की. इसी बीच 16 फरवरी को खोमैनी ने मेहदी बाजारगान को अंतरिम सरकार का नया प्रधानमंत्री घोषित कर दिया.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

प्रदर्शन का इस्लामीकरण

ईरान में दो प्रधानमंत्री हो गए. एक बख्तियार और दूसरे बाजारगान. बाजारगान के पीछे खोमैनी के साथ साथ बड़ा जन समर्थन था. धीरे धीरे खोमैनी ने प्रदर्शन को धार्मिक रंग दे दिया.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

सेना में फूट

इसी बीच खबर आई कि ईरान की वायुसेना खोमैनी के समर्थन में उतर गई है. 19 फरवरी 1979 को कायहान अखबार की इस तस्वीर में वायु सैनिक खोमैनी को सलाम करते दिख रहे हैं.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

आपस में भिड़े सैनिक

20 फरवरी को तेहरान में एक निर्णायक घटना हुई. शाह के प्रति वफादारी दिखाने वाले इंपीरियल गार्ड के सैनिकों ने एयरफोर्स डिफेंस ट्रूप्स पर हमला कर दिया.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

ढह गया पुराना ढांचा

इसके बाद मार्च तक हिंसक झड़पें चलती रही. धीरे धीरे सेना भी हथियारबंद विद्रोहियों के साथ इमाम खोमैनी के समर्थन में झुकती चली गई.

ऐसे हुई ईरान में इस्लामिक क्रांति

इस्लामिक ईरान के सर्वेसर्वा

अप्रैल 1979 में एक जनमत संग्रह के बाद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का एलान किया गया. सरकार चुनी गई और खोमैनी को देश का सर्वोच्च धार्मिक नेता घोषित किया गया. खोमैनी के उत्तराधिकारी अयातोल्लाह खमेनेई आज भी इसी भूमिका में हर सरकार से ऊपर हैं.

हमें बाद में पता चला कि देश को बदलने का सपना रखने वाले राष्ट्रपति मोहम्मद खतामी के कहने पर देश की खुफिया एजेंसी एमओआईएस को हत्याओं के काम पर लगाया गया था. ऐसे में प्रशासन पर तो कोई असर नहीं पड़ा, उल्टे प्रेस की स्वतंत्रता पर भारी अंकुश लग गया और लेखकों के साथ साथ पत्रकार भी गिरफ्तार किए जाने लगे.

लगातार हो रहे इस दमन के चलते विरोधियों को आयोजित तरीके से एकजुट होने का मौका ही नहीं मिल सका है. लेकिन अब जब ईरान इस्लामी क्रांति के चालीस साल मना रहा है, कुछ ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं जो भविष्य में ईरान की राजनीति को बदल सकते हैं. तेहरान की सियासत जिन धड़ों में बंट रही है, वह इतना अस्पष्ट तो कभी भी नहीं था.

अर्थव्यवस्था के सुधरने की उम्मीद अब कम ही दिखती है. ऐसे में बदलाव की पैरवी करने वाले अब खुद को "हार्ड लाइनर्स" और "रिफॉर्मर्स" दोनों ही धड़ों से दूर रख रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो अब दो कैंप बन गए हैं, जो पहली बार 2017-18 में हुए प्रदर्शनों में आमने सामने थे. एक तरफ हैं वो जो मौजूदा इस्लामी गणतंत्र का बचाव करना चाहते हैं और दूसरी ओर वो जो देश में बड़े बदलाव देखना चाहते हैं यानि एक बार फिर तख्तापलट. 

पिछले बीस सालों में, जबसे मैंने ईरान छोड़ा है, मुझसे कई बार यह सवाल किया गया है कि ईरान का भविष्य कैसा होगा. आज भी मैं यही कहता हूं: मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है. लेकिन एक बात है कि आज की स्थिति चालीस साल पहले वाली स्थिति जैसी ही है. और उस वक्त जो हुआ था वो भी किसी की भी कल्पना के परे था.

हमें फॉलो करें