ईरान में चुनाव से पहले कोहराम

ईरान में राष्ट्रपति चुनाव से पहले एक प्रमुख उम्मीदवारी खारिज कर दी गई है, जिस पर बवाल मच रहा है. फ्रांस सहित कई ताकतों ने इसका विरोध किया है और मौजूदा राष्ट्रपति भी इसके लिए गुहार लगाना चाहते हैं.

जिन लोगों को चुनाव लड़ने से रोका गया है, उनमें राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के करीबी सहयोगी एफसंदार रहीम मशाई और पहले राष्ट्रपति रह चुके हाशमी रफसंजानी शामिल हैं.

अहमदीनेजाद ने कहा है कि वह गार्डियन काउंसिल के इस फैसले के खिलाफ देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खमेनाई के पास अपील करेंगे. उनकी यह बात राष्ट्रपति की वेबसाइट पर जारी की गई है. हालांकि सुप्रीम नेता की हरी झंडी के बगैर गार्डियन काउंसिल अपना फैसला बदल नहीं सकता. राष्ट्रपति अहमदीनेजाद इस बार के चुनाव में नहीं लड़ सकते क्योंकि वह लगातार दो बार यह पद संभाल चुके हैं.

उन्होंने मशाई को एक "सही और कर्णधार" व्यक्ति बताते हुए उम्मीद जताई कि आखिरी समय से पहले इस मामले को सुलझा लिया जाएगा. ईरान में 14 जून को राष्ट्रपति चुनाव होने हैं.

अकबर हाशमी रफसंजानी

मशाई को राष्ट्रपति अहमदीनेजाद का पूरा समर्थन हासिल है लेकिन देश के कट्टरपंथी नेताओं का विरोध करने की वजह से उनकी छवि एक विजयी नेता की तरह नहीं बन पाई है.

गार्डियन काउंसिल ने पूर्व राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफसंजानी की उम्मीदवारी भी रद्द कर दी है. रफसंजानी 1979 की इस्लामी क्रांति में शामिल रहे हैं, जिसके बाद से ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी सबसे बड़े नेता बन कर उभरे.

रफसंजानी की उम्मीदवारी खारिज होने के बाद देश के उदारवादी धड़ों ने भी आलोचना शुरू कर दी है. उधर फ्रांस ने कहा है कि ईरान की जनता को इस बात का अधिकार होना चाहिए कि वे स्वतंत्र होकर अपना नेता चुन सकें. फ्रांसीसी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता फिलिप लालियोत ने कहा, "गार्डियन काउंसिल का यह फैसला बताता है कि ईरान की व्यवस्था में कितनी खामियां हैं. ईरान के लोगों का यह हक है कि वे अपना राष्ट्रपति खुले मन से चुन सकें."

गार्डियन काउंसिल के प्रमुख अहमद जन्नती

ईरान के अंदर भी कई लोगों ने इस फैसले को बदलने की मांग की है. पूर्व अयातुल्लाह खुमैनी की बेटी जहरा मुस्तफावी का कहना है कि इससे रफसंजानी और अयातुल्लाह के बीच दरार बढ़ेगी, जो कभी करीबी हुआ करते थे. "मैं यह सलाह दे रही हूं क्योंकि इस फैसले से लोगों की दिलचस्पी इस चुनाव के प्रति कम हो सकती है."

हालांकि मीडिया ने नहीं बताया कि उन्हें क्यों चुनाव नहीं लड़ने दिया जा रहा है लेकिन जानकारों का मानना है कि 78 साल की उम्र में वह देश का नेतृत्व करने लायक नहीं हैं.

देश में मीर हुसैन मुसावी को लेकर भी को लेकर भी लोगों की सहानुभूति जग रही है, जिन्होंने 2009 के पिछले चुनावों में हिस्सा लिया था.

एजेए/एमजे (एएफपी, रॉयटर्स)

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