ऑक्सीजन को तरस जाएगी धरती

ग्लोबल वॉर्मिंग से बढ़ रहे खतरे और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने भविष्य के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं. बाढ़, सूखा, तूफान और पिघलती बर्फ के अलावा ऑक्सीजन की किल्लत भी हो सकती है कल आने वाली मुसीबत.

एक नई शोध इसी तरफ संकेत करती है कि धरती पर ऑक्सीजन की कमी का भी खतरा हो सकता है. ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लेस्टर के वैज्ञानिकों का कहना है, "हमने ग्लोबल वॉर्मिंग के एक अन्य खतरे को पहचाना है जो बाकियों से ज्यादा खतरनाक हो सकता है."

उनकी रिसर्च फाइटोप्लैंकटन के कंप्यूटर मॉडल पर आधारित है. ये सूक्ष्म समुद्री पौधे होते हैं जो वायुमंडल में दो तिहाई ऑक्सीजन के लिए जिम्मेदार हैं. औसत 6 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वॉर्मिंग वह तापमान है जिसपर फाइटोप्लैंकटन ऑक्सीजन का निर्माण नहीं कर पाएंगे. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा होने पर ना सिर्फ पानी में बल्कि हवा में भी ऑक्सीजन की कमी हो जाएगी. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा हुआ तो धरती पर जीवन मुश्किल हो जाएगा.

जब कुदरत खेल खेलती है..

किसने सोचा था

चेन्नई की बाढ़ 260 से ज्यादा लोगों की जान ले चुकी है. एक महीने से लगातार बरसात के कारण पूरा शहर पानी से भरा रहा. लोग बिना बिजली और संचार माध्यमों के जीने पर मजबूर हो गए. बेहद कम बरसात अनुभव करने वाले चेन्नई में इस बार लगातार हो रही भारी बारिश के लिए "एल नीनो" को जिम्मेदार माना जा रहा है.

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तूफान से तबाही

चीन में डुजुयान तूफान 119 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से पहुंचा. सितंबर के अंत में आए इस तूफान के कारण 31 हजार हेक्टेयर के इलाके में बाढ़ आई और 400 घर तबाह हो गए. फुजियान इलाके में आए इस तूफान से बचने के लिए अधिकारियों ने तट पर रेत की बोरियां लगाईं, जिनसे बहुत ज्यादा असर नहीं हो सका.

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खतरनाक खूबसूरती

43 साल तक चिली का कालबुको ज्वालामुखी शांत बैठा था. 22 अप्रैल 2015 को यह अचानक इतनी जोर से फटा कि आसमान में 15 किलोमीटर तक राख उठी. आसपास 20 किलोमीटर तक के इलाके को खाली कराना पड़ा. 24 अप्रैल को यह एक बार फिर फटा, और फिर 30 अप्रैल को भी.

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कैसे बचाएं

काठमांडू में एक घर के मलबे से बच्चे को निकालने की कोशिश में लगे राहतकर्मी. यह तबाही भी अप्रैल के महीने में ही आई. भूकंप इतना ताकतवर था की नई दिल्ली तक उसके झटके महसूस किए गए. एक बड़े झटके के बाद नेपाल को कई छोटे झटकों से गुजरना पड़ा. इनमें 8800 लोगों की जान गयी.

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राख ही राख

जून 2015 में सुमात्रा द्वीप के माउंट सिनाबुंग में ज्वालामुखी फटा. 2460 मीटर ऊंचे इस पहाड़ से इतनी राख उठी कि आसपास के सभी इलाके इससे भर गए. लोगों के घरों पर राख की चादर सी फैल गयी. कुछ लोग खुद को बचाने के लिए सर पर प्लास्टिक के थैले भी पहनने लगे. हालांकि इसमें किसी की जान को नुकसान नहीं पहुंचा.

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कुदरत से लड़ाई

यह दृश्य है अमेरिका के कैलिफोर्निया का, जहां सितंबर में ऐसा सूखा पड़ा कि एक चिंगारी भी जंगल की आग भड़काने के लिए काफी होती. तस्वीर में दिखाई दे रहे व्यक्ति की तरह अमेरिका में 10,500 दमकलकर्मी आग को बुझाने के काम में लगे रहे. हजारों लोगों को अपना घर छोड़ कर जाना पड़ा.

तापमान का 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ना मुख्यधारा में बताए जा रहे तापमान से ज्यादा है, हालांकि इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी चेतावनी दे चुकी है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि को पलटा ना गया तो ऐसा होना संभव है. कई वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कभी तापामन इतना बढ़ा तो इसका कारण लंबे समय तक बेलगाम कार्बन उत्सर्जन होगा.

जलवायु को बचाने के लिए समझौते की कोशिश कर रहे संयुक्त राष्ट्र सदस्यों ने पेरिस में तय किया कि वे ग्लोबल वॉर्मिंग का स्तर औद्योगिक क्रांति के पहले के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ऊपर नहीं जाने देंगे. संयुक्त राष्ट्र के जलवायु विज्ञान पैनेल के मुताबिक अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को काबू में नहीं किया गया और हालत बहुत खराब रही तो इस सदी में पृथ्वी का तापमान 4.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है.

पृथ्वी के बदलाव की तस्वीरें

नर्क सी आग

सितंबर में कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग को बुझाने के लिए 10,500 दमकलकर्मियों की मदद लेनी पड़ी. कोशिशों के बावजूद वे बड़े इलाके और 1400 घरों को आग की जद में आने से बचा नहीं पाए. यह आग जलवायु परिवर्तन के कारण शुष्क और गर्म मौसम का नतीजा थी.

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शिकार की मारामारी

पोलर बियर जलवायु परिवर्तन का प्रतिबिंब सा बन गया है. सबसे ज्यादा इन्हीं के ठंडे इलाकों के घरों पर असर पड़ा है. आर्कटिक की बर्फ तेजी से घट रही है. इससे इन्हें शिकार में भी दिक्कत आ रही है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसे ही रहा तो 2050 तक आर्कटिक में गर्मियों के मौसम में बर्फ नहीं दिखेगी.

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नुकसान की हद

ऊंचाई से देखने पर नॉर्वे के श्पित्सबैर्गेन इलाके में एक छोटी सी लकड़ी की झोपड़ी ही दिखाई देती है. यह आर्कटिक रिसर्च बेस है जहां जर्मन और प्रांसीसी वैज्ञानिक ध्रुवीय इलाकों में जलवायु और वायुमंडलीय परिवर्तनों को समझ रहे हैं.

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बदलते मंजर

यूनेस्को की विश्व धरोहरों में शामिल स्विस ग्लेशियर आलेच समय के साथ सिकुड़ रहा है. 1860 में इसकी लंबाई वर्तमान से करीब एक किलोमीटर ज्यादा थी. ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण यह हिमखंड हर साल 50 मीटर सिकुड़ रहा है. वैज्ञानिकों को डर है कि यूरोप का सबसे बड़ा ग्लेशियर एक दिन पूरी तरह खत्म हो सकता है.

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निश्चित दूरी से

दूर से देखने पर जादुई रोशनी में जगमगाता इलाका. लेकिन असलियत कुछ और है. एरियल व्यू देखने पर पता चलता है कि फिलीपींस का सेंट्रल ल्यूजोन इलाका तूफान और भारी बरसात के बाद किस बरबादी से गुजरा है. इन तूफानों में हजारों लोग बह गए या जमीन में दफ्न हो गए. फिलीपींस में हर साल करीब 20 तूफान आते हैं.

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जान का खतरा

सब कुछ खो जाने के बाद खुद की जान बचाकर भागना ही रास्ता रह जाता है. विश्व बैंक की चेतावनी के मुताबिक अगर ग्लोबल वॉर्मिंग यूं ही बढ़ती रही तो सबसे ज्यादा खतरा अफ्रीका और दक्षिणी एशिया के लोगों की जान को होगा. सूखे और बाढ़ से फसलों को नुकसान होगा, भुखमरी, महामारियां और महंगाई की मार टाली नहीं जा सकेगी.

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बच्चों पर बोझ

जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों को होता है. सूखे और बाढ़ से होने वाली आर्थिक तंगी उनके भविष्य को प्रभावित करेगी. महंगाई में परिवार घर के सदस्यों को कम करने के लिए अपनी लड़कियों की शादियां जल्दी करने पर उतारू होंगे.

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व्यापार में नुकसान

राइन नदी यूरोप में सबसे व्यस्त जलमार्ग है. लेकिन जलवायु परिवर्तन से व्यापार भी प्रभावित हो रहा है. लगातार सूखे की स्थिति में शिपिंग कंपनियां छोटे जहाज ले जाने को मजबूर हो जाती हैं जो कम पानी में आसानी से चल सकें. ऐसे में काफी माल सड़क के रास्ते भेजना पड़ता है.

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भूतिया तस्वीर

स्वस्थ कोरल किसी बगीचे से दिखते हैं. लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण उनके जीवन पर भी असर पड़ा है. अगर पानी का तापमान लगातार ऊपर रहता है तो कोरल को पोषण की कमी हो जाती है. उनका रंग फीका पड़ जाता है और वे मर जाते हैं.

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उत्तर में विनयार्ड

ग्लोबल वॉर्मिंग का एक फायदा भी हुआ है. हाल के सालों में जर्मनी के सबसे उत्तरी द्वीप सिल्ट पर वाइन बनाई जा रही है. तापमान बढ़ने से कई उत्तरी इलाकों में अंगूर की खेती संभव हो सकी है. अंगूर की फसल जल्दी और ज्यादा मीठी भी मिल रही है.

रिपोर्ट के सहलेखक सेर्गेई पेत्रोव्स्की के मुताबिक, "इस शोध से यह संदेश मिलता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के परिणामस्वरूप जल्द ही कोई नई आपदा हम तक पहुंच सकती है, और यह उन परिणामों से भयंकर हो सकती है जिनका अब तक अनुमान लगाया गया है." उन्होंने कहा कि हो सकता है कि आपदा के आने से पहले हमें बहुत संकेत मिलने का समय भी ना रहे. एक बार अगर सीमा पार हो गई तो बर्बादी बहुत तेजी से हमारे पास पहुंचेगी.

एसएफ/एमजे (एएफपी)

खोते द्वीप की खूबसूरती

अलग थलग द्वीप

ऑनतोंग जावा सिर्फ 12 वर्ग किलोमीटर बड़ा है जिसकी जमीन समुद्र स्तर से केवल 3 मीटर ऊंची है. सोलोमन द्वीप से 500 किलोमीटर दूर बसे इस द्वीप के चारों ओर पश्चिमी प्रशांत सागर की गहराइयां हैं. यहां के लोग हमेशा ही लहरों और तूफान के साये में जिए हैं लेकिन मुश्किलें बढ़ रही हैं.

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परंपराओं का पालन

यह द्वीप सैकड़ों सालों से बसा है. पोलीनेशिया के लोग इस द्वीप पर 2000 साल पहले बसे. सदियों पुराने नृत्य ताकतवर प्राकृतिक शक्तियों की कथा कहते हैं. ये नृत्य स्थानीय संस्कृति का अहम हिस्सा तो हैं ही, वे स्थानीय आबादी की पहचान का भी अभिन्न अंग हैं.

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प्रकृति का साथ

परंपरागत रूप से घर नारियल और पंडाना के पेड़ों से बनाए जाते हैं. आजकल इन झोपड़ियों में सौर ऊर्जा की मदद से आधुनिक रोशनी की जाती है. इस द्वीप के दुनिया से कटे होने का एक फायदा यह भी है कि रात के आसमान का अंधेरा पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त दिखता है.

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कहां जाएंगे बच्चे

यदि समुद्र स्तर का बढ़ना जारी रहता है तो जल्द ही यह द्वीप समुद्र में डूब जाएगा. 8 वर्षीय विल्सन आयुंगा जैसे ऑनतोंग जावा के बच्चों के लिए इस द्वीप को छोड़कर कहीं और ऊंची जगह पर बसने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा. लोगों को डर है कि उनकी जन्मभूमि छिन जाएगी.

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अप्रतिबद्ध सरकार

लुआनिउआ की अनछुई खूबसूरती ऊपर से साफ दिखती है. यह ऑनतोंग जावा के उन दो द्वीपों में शामिल है जहां लोग रहते हैं. ताड़ के इन खूबसूरत पेड़ों के पीछे एक प्रतिबद्ध सरकार की कमी दिखती है. ऑनतोंग जावा सोलोमन द्वीप समूह का हिस्सा है, लेकिन नागरिक सुविधाओं के अभाव में समस्याएं पैदा हो रही हैं.

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बंटता द्वीप

ऑनतोंग जावा के लोगों को जलवायु परिवर्तन के नतीजे साफ होने लगे हैं. समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से हेनुआ आइकू द्वीप दो हिस्सों में बंटने लगा है. समुद्र का पानी द्वीप के बीच से घुसने लगा है और उसने खाद्य सुरक्षा और भूस्खलन की समस्या सबके सामने ला दी है.

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जलवायु परिवर्तन

समुद्री जलस्तर बढ़ने से द्वीप के हिस्से डूब रहे हैं. उनसे होने वाले नुकसान के अलावा जलवायु परिवर्तन के कारण तेज हवाओं और कभी भी आने वाले तूफानों का खतरा बढ़ गया है. ये द्वीप के तटीय इलाकों के अलावा वहां बसे गांवों को भी खतरे में डाल रहे हैं.

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फसल में कमी

समुद्र का पानी द्वीप पर घुसने का एक नुकसान यह भी हो रहा है कि वह जमीन को खराब कर रहा है. मिट्टी के धूसर होने के कारण खेती ठीक से नहीं हो रही है. पैट्रन लालियाना का तारो गार्डन धरती की उर्वरा शक्ति कम होने के कारण उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है.

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बदलता समय

सैरा अबोरा ने अपनी सारी जिंदगी ऑनतोंग जावा पर बिताई है. उन्हें वह समय भी याद है जब द्वीप पर आज जहां गांव है वहां झाड़ियां हुआ करती थी. उन्हें यह भी याद है कि पहले जहां लोग रहा करते थे, वह जगह इस बीच पानी में डूब चुकी है. पानी के बढ़ने से गांव छोटा हो गया है.

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डूबा गांव

ऑनतोंग जावा के लोगों के लिए समुद्री जलस्तर बढ़ने के खतरों के सबूत द्वीप पर हर कहीं दिखते हैं. आज जहां सफेद रेत दिखती है, वहां कभी सुंदर रमणीक गांव हुआ करता था. बढ़ते समुद्री पानी ने 40 घरों और एक कब्रगाह को लील लिया है.

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धरती बिन संस्कृति नहीं

ऑनतोंग जावा के लोगों को पता नहीं कि अपनी धरती के बिना वे अपनी संस्कृति कैसे बचा पाएंगे. अपने द्वीप को छोड़ना उनके लिए पहचान खोने जैसा है. लेकिन जैसे जैसे जलवायु परिवर्तन के नतीजे लोगों को विस्थापित करने का खतरा पैदा कर रहे हैं ऑनतोंग जावा की संस्कृति का भविष्य धूमिल हो रहा है.

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उम्मीद की किरण

ऑनतोंग जावा से लोगों के विस्थापन की संभावना बढ़ती जा रही है, लेकिन अभी भी लोग आशावान हैं कि वे अपनी परंपरागत भूमि पर रह सकेंगे. वह भूमि जिसने उन्हें 2000 साल से पनाह दी है और खुशहाली में जिंदा रखा है.

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