ऑनलाइन डाटा को लेकर चिंता में हैं जर्मन

एक नए सर्वेक्षण में पता चला है कि जर्मनी के लोगों को अपने डाटा की काफी चिंता है. हाल में हुई देश के अहम लोगों की साइबर हैकिंग से देश में फिक्र बढ़ी है.

जर्मनी की सरकारी प्रसारण सेवा एआरडी द्वारा करवाए गए "डॉएचलांडट्रेंड" सर्वेक्षण के अनुसार ज्यादातर मानते हैं कि डाटा के मामले में सुरक्षा और सुधर सकती है. सर्वे में शामिल हुए 35 साल से ज्यादा उम्र के करीब दो तिहाई लोगों का मानना है कि उनकी ऑनलाइन जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है. वहीं 18 से 34 की उम्र वाले 49 प्रतिशत जर्मन मानते हैं कि ऐसी कोई बात नहीं है.

एक हफ्ते पहले ही जर्मनी में हजार के करीब अकाउंट हैक कर लिए गए थे. यह ऑनलाइन खाते प्रमुख राजनेताओं और मीडियाकर्मियों के थे, जिनकी जानकारियां चुरा कर ऑनलाइन लीक कर दी गई थीं. लोगों की निजी जानकारी जैसे फोटो और संदेशों के सार्वजनिक मंच पर आने से निजता पसंद जर्मन लोग हिल गए. वैसे ही ज्यादातर जर्मन लोग अपनी जानकारी ऑनलाइन देने से कतराते हैं. सर्वे में शामिल 60 प्रतिशत जर्मन मानते हैं कि वो ऑनलाइन कम से कम जानकारी देते हैं.

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राजनीतिक माहौल में कोई बदलाव नहीं

लोगों के बीच में जो निराशा 2018 में बनी थी वो 2019 में भी जारी है. सिर्फ 34 प्रतिशत लोगों ने माना कि वो अभी की सरकार से संतुष्ट हैं. अगर करीब से देखें तो ये आंकड़े अलग अलग राजनीतिक दलों की तरफ जाते हैं. रूढ़िवादी पार्टियों के 56 प्रतिशत और 51 प्रतिशत सोशल डेमोक्रेट (एसपीडी) समर्थकों ने कहा कि वे संतुष्ट हैं. यह दोनों वर्तमान सरकार का हिस्सा हैं. वहीं धुर दक्षिणपंथी दल एएफडी के 5 प्रतिशत समर्थकों ने भी सरकार से संतोष जताया.

लोगों से यह भी पूछा गया कि अगर अगले रविवार को चुनाव हों, तो वे किसको वोट देंगे. रूढ़िवादी क्रिश्चियन डेमोक्रैट्स (CDU), अपनी साथी बवेरियन पार्टी, क्रिश्चियन सोशल यूनियन (CSU) के साथ, पिछले महीने के सर्वेक्षण से एक अंक नीचे 29 प्रतिशत पर सबसे आगे रहे.

दूसरे स्थान पर 20 प्रतिशत वोटों के साथ रही ग्रीन पार्टी. वहीं एसपीडी ने एक अंक की बढ़त लेकर 15 प्रतिशत वोट जुटाए. ऑल्टर्नेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) 14 प्रतिशत पर बरकरार रही, वहीं व्यापार-समर्थक फ्री डेमोक्रैट (एफडीपी) और लेफ्ट पार्टी ने भी एक एक अंक की बढ़त से 9 प्रतिशत वोट बटोरे.

अगर व्यक्तिगत स्तर पर बात करें तो चांसलर अंगेला मैर्केल अब भी जर्मनी की सबसे लोकप्रिय राजनेता हैं. उनको 56 प्रतिशत लोगों का समर्थन है, जो पिछले महीने से एक अंक कम है. वहीं उनकी जगह पर आने वाली आनेग्रेट क्रांप-कारेनबावर की भी लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ रही है. वो 46 प्रतिशत समर्थन दर के साथ दूसरे स्थान पर रहीं, जो मार्च 2018 से 11 अंक ज्यादा है.

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आर्थिक रूप से मजबूत, परिवर्तन के लिए तैयार

पैसों की बात पर 78 प्रतिशत जर्मन मानते हैं कि वो अपनी आर्थिक स्थिति से खुश या बहुत खुश हैं. जब आंकड़ों को पार्टियों में बांटा जाता है तो 80 प्रतिशत ग्रीन्स, एफडीपी, एसपीडी और सीडीयू/सीएसयू समर्थकों ने माना कि वो खुश हैं. एएफडी और लेफ्ट पार्टी के 69 और 59 प्रतिशत लोगों ने थोड़ा कम उत्साह दिखाया.

जर्मनी में इस समय कई मुद्दों पर बहस चल रही है, जिनमें आप्रवासन, जलवायु परिवर्तन और यूरोपीय संघ का भविष्य सबसे अहम हैं. 51 प्रतिशत लोग मानते हैं कि देश में बदलाव पर्याप्त तेजी से नहीं आ रहा है. अगर इस आंकड़े को पार्टी स्तर पर देखें तो असमानता स्पष्ट दिखती है.

86 प्रतिशत एएफडी समर्थकों का कहना है कि वो खुश नहीं हैं. वहीं ऐसे लोग जो किसी भी पार्टी का समर्थन नहीं करते हैं, उनमें 69 प्रतिशत भी मानते हैं कि वे खुश नहीं हैं. बाकी की पांच पार्टियां जो संसद में हैं उनके लिए ये आंकड़ा 50 प्रतिशत से कम हैं.

(डेव राइष/एनआर)

इंटरनेट में कैसे रहें सतर्क

अमेरिकी खुफिया एजेंसी एनएसए ने केवल अमेरिकी नागरिकों और नेताओं की ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोगों की जासूसी की. जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल के मोबाइल फोन की जासूसी पर काफी बवाल खड़ा हुआ.

इंटरनेट में कैसे रहें सतर्क

फेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों के पास आपकी अलग अलग जानकारी होती है. पूरी जानकारी को कंपनी का हर सदस्य नहीं देख सकता है. उनके पास आपका नियमित डाटा होता है, वे आपके मेसेज नहीं खोल सकते हैं.

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लेकिन जब खुफिया एजेंसी के पास आपके कंप्यूटर पर चल रहे माइक्रोसॉफ्ट प्रोसेसर से लेकर आपके गूगल, फेसबुक और दूसरे अहम अकाउंट की जानकारी होती है तो उनके पास सब कुछ होता है.

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इन एजेंसियों के पास ऐसे सॉफ्टवेयर होते हैं कि वे जब चाहें आपके कंप्यूटर से खुद अपने कंप्यूटर को जोड़ कर आपकी हर हरकत का पता कर सकते हैं.

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हालांकि अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित कानून के अनुसार केवल जिस व्यक्ति पर शक है, उसके अकाउंट से जुड़ी जानकारी के लिए खुफिया एजेंसी को पहले अदालत से अनुमति लेनी होती है. इसके आधार पर उन्हें इंटरनेट कंपनियां सर्वर तक की पहुंच देती हैं.

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थोड़ी बहुत इंटरनेट जासूसी सभी देशों की सरकार करती है. यह देश की सुरक्षा के लिए अहम भी है. इसमें कंप्यूटर के डाटा के साथ साथ आपके फोन की सारी जानकारी भी मौजूद है.

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बड़े कैमरे से कोई आप पर नजर रखे तो आप उस से बच भी सकते हैं, लेकिन जासूसी ऐसे स्तर पर हो रही है कि आईक्लाउड और एयर एंड्रॉयड जैसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भी सुरक्षित नहीं है.

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ऐसा नहीं है कि ये मामले यहीं थम जाएंगे. ऐसे सिस्टम की कमी है जो निजता को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए आश्वस्त कर सके.

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