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ओबामा के पर कतरने की तैयारी!

१७ मई २०१३

अमेरिका में 9/11 वाले आतंकवादी हमलों के बाद राष्ट्रपति को ढेर सारे अधिकार दे दिए गए थे और अब उनमें कटौती का विचार किया जा रहा है. दूसरे देशों में अमेरिकी ड्रोन हमलों के बाद इस पर चर्चा तेज हुई है.

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तस्वीर: S. Loeb/AFP/Getty Images

अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस इस बात पर विचार कर रही है कि क्या आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के लिए राष्ट्रपति को दिए गए अतिरिक्त अधिकार जारी रखे जाएं. रक्षा अधिकारियों का कहना है कि अल कायदा का खतरा अभी भी बना है और ऐसे में अधिकारों के जारी रखना ठीक होगा. लेकिन कई रिपब्लिकन और डेमोक्रैटिक सदस्य इसके पक्ष में नहीं दिख रहे हैं.

2008 के राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा ले चुके रिपब्लिकन सीनेटर जॉन मैक्केन का कहना है, "यह प्रशासन अधिकार क्षेत्र से बहुत आगे जा चुका है. अमेरिकी संसद ने 2001 में जिन परिस्थितियों में ऐसा किया था, अब वैसी बात नहीं रह गई है."

यह पूछे जाने पर कि क्या अगर माली, लीबिया या सीरिया जैसे देशों में अल कायदा के सहयोगी संगठनों का पता चले, तो क्या कानून के तहत अमेरिका उन पर कार्रवाई कर सकता है, रक्षा अधिकारियों ने कहा, "हां."

रक्षा मंत्रालय में विशेष कार्रवाई विभाग के उप मंत्री माइकल शीहान का कहना है कि प्रशासन अपने उद्देश्य के लिए काम कर रहा है, "आखिर में अल कायदा इतिहास की राख में समा जाएगा लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि अभी वह दिन दूर है."

न्यू यॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड टावर पर आतंकवादी हमले के बाद अमेरिकी संसद ने उस कानून को पास किया था, जिसके तहत राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को अफगानिस्तान और अल कायदा पर हमले का अधिकार दिया गया था. उस समय कहा गया था कि राष्ट्रपति सेना का सर्वोच्च कमांडर होता है और इस लिहाज से सितंबर, 2011 जैसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए उसे अधिकार दिया जाना चाहिए.

लेकिन हाल के दिनों में अफगानिस्तान की घटनाओं और मानवरहित ड्रोन हमलों के बाद इस पर सवाल उठाए जाने लगे हैं. डिक डर्बन राष्ट्रपति ओबामा की डेमोक्रैट पार्टी के सदस्य हैं. उन्होंने 2001 में इस कानून का समर्थन किया था लेकिन अब उन्हें लगता है कि यह जरूरत से ज्यादा अधिकार है, "मैं विश्वास नहीं करता हूं कि हममें से ज्यादातर लोगों ने इतिहास की सबसे लंबी लड़ाई के लिए वोट दिया था और अमेरिका 10 साल बाद भी इस नीति पर अमल करता रहेगा. मैंने खुद भी इसके लिए वोट किया था."

यह मामला उस वक्त सुर्खियों में आया, जब रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर और 2016 के संभावित राष्ट्रपति उम्मीदवार रैंड पॉल ने अपनी 13 घंटे के भाषण में इस बात का जिक्र किया. उन्होंने अपना भाषण जॉन ब्रेनन को सीआईए प्रमुख बनाए जाने के मुद्दे पर दिया था. राष्ट्रपति ने वादा किया था कि वह अपनी ड्रोन नीति को समझाएंगे. प्रशासन ने कभी भी सार्वजनिक तौर पर इसके बारे में कुछ नहीं बताया है. हालांकि गैरसरकारी संगठनों ने इसके बारे में आंकड़े जुटाए हैं. उनका दावा है कि पाकिस्तान और यमन में अमेरिका अब तक 420 बार ड्रोन हमले कर चुका है. ये हमले 2004 से किए जा रहे हैं और इनमें 2424 से 3967 के बीच लोगों की मौत हो चुकी है. सबसे ज्यादा मौतें पाकिस्तानी सीमा में हुई हैं.

दो साल पहले 2011 में यमन में हुए ड्रोन हमले में तीन अमेरिकी नागरिक भी मारे गए. इनमें अमेरिका में पैदा हुआ अल कायदा का संदिग्ध चरमपंथी अनवर अल अवलाकी भी शामिल था. इसी हमले में समीर खान और अल अवलाकी का सहयोगी अब्दुल रहमान भी मारे गए थे. इसके बाद से अमेरिका के अंदर सवाल उठने लगे हैं कि क्या हमलों में अपने ही देश के नागरिकों को मारना जायज है.

एजेए/एएम (एपी)

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