कारगर स्वास्थ्य प्रणाली में बाधाएं

किसी भी देश में कारगर स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक स्थिर राजनीतिक व्यवस्था जरूरी है जिसे योजनाओं को लागू करने की समझ हो. इसके साथ ही लोगों में बड़े पैमाने पर जागरुकता अभियान चलाना जरूरी है.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में इस सप्ताह आयोजित पांच दिवसीय 14वीं वर्ल्ड कांग्रेस आन पब्लिक हेल्थ में दुनिया भर से जुटे विशेषज्ञों ने यह राय जताई है. इनका कहना था कि आम लोगों के स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए योजनाओं को लागू करने की खातिर राजनीतिक इच्छाशक्ति और भागीदारी जरूरी है.

वर्ल्ड फेडरेशन आफ पब्लिक हेल्थ एसोसिएशंस और इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन ने साझा तौर पर इस वर्ल्ड कांग्रेस का आयोजन किया. कोलकाता में इसका आयोजन वर्ष 1981 के बाद दूसरी बार किया गया. इस दौरान दुनिया भर के सामने स्वास्थ्य से जुड़े मौजूदा और उभरने वाले मुद्दों, चुनौतियों और उनसे निपटने के उपायों पर गहन विचार-विमर्श किया गया. कांग्रेस के दौरान अलग-अलग विषयों पर कई वर्कशाप आयोजित किए गए. इसके अलावा जनस्वास्थ्य से जुड़ी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय चुनौतियों, रणनीति और नीति संबंधी मुद्दे पर भी सार्थक बहस का आयोजन हुआ.

राजनीतिक स्थिरता जरूरी

वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ पब्लिक हेल्थ एसोसिएशंस के अध्यक्ष मेंजिस्तू स्नेक ने कहा, "राजनीतिक व्यवस्था में जनस्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को समाहित करना बेहद कठिन है. एक कारगर स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक स्थिर राजनीतिक व्यवस्था जरूरी है. यह व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसे योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर लागू करने की समझ हो."

इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे रवि कुमार ने कहा, "देश में फिलहाल स्वास्थ्य से जुड़े कई मुद्दे व समस्याएं हैं. उनके लिए हमारे पास स्वास्थ्य नीतियां और कार्यक्रम भी हैं. लेकिन उनको लागू करने के मामले में हम फिसड्डी हैं." उनका कहना था कि नीतियों का सही क्रियान्वयन नहीं होने की वजह से ग्रामीण के साथ शहरी आबादी भी प्रभावित हो रही है. कुमार के मुताबिक, धन की कमी इन नीतियों को लागू करने की राह में सबसे प्रमुख बाधा है. इसके अलावा प्रशिक्षित लोगों की कमी भी एक अहम कारण है. भारत में ज्यादातर डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में जाने की बजाय शहरों में काम करने को तरजीह देते हैं. उन्होंने कहा, "जनस्वास्थ्य की तस्वीर को बेहतर बनाने के लिए संबंधित नीतियों को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति व भागीदारी सबसे अहम है." एसोसिएशन ने इस कांग्रेस के बाद पूरे देश में जागरूकता अभियान चलाने का फैसला किया है.

कोयले से मुश्किल

कांग्रेस में शिरकत करने वाले विशेषज्ञों का कहना था कि कोयले के प्रति विभिन्न देशों के भारी लगाव ने जलवायु परिवर्तन के साथ मिल कर जनस्वास्थ्य के लिए एक भारी खतरा पैदा कर दिया है. अमेरिका में शिकागो स्थित ईलिनोइस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पीटर ओरिस ने कहा, "एशिया पूरी दुनिया में कोयले का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है. ऐसे में इसे ग्रीनहाउस गैसों और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने की अपनी रणनीति में ठोस बदलाव करना होगा." विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, वायु प्रदूषण से दुनिया में हर साल 70 लाख लोगों की मौत हो जाती है. उन्होंने कहा कि एशियाई देशों में कोयले के प्रति बढ़ते लगाव की वजह से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है. इसका असर जलवायु परिवर्तन पर पड़ता है. भारत सरकार अब भी कोयले पर निर्भर है. यह एक गलती है.

पर्यावरण विशेषज्ञ आदित्य प्रद्युम्न ने कहा, "एशिया-प्रशांत क्षेत्र में वायु प्रदूषण की सबसे गहरी मार निम्न और मध्यवित्त देशों को झेलनी पड़ रही है." फिलीपींस से आए रेंजो ग्यून्टो का कहना था कि कोयले पर निर्भरता से विभिन्न देशों की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ रही है. लेकिन इससे सबक लेने की बजाय तमाम देशों में कोयले पर आधारित संयंत्रों और उद्योंग की तादाद लगातार बढ़ रही है. उन्होंने अपने देश का हवाला दिया जहां कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के पास स्थित नदियों और तालाबों में मछलियों की तादाद घट गई है.

बढ़ती असमानता

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के तकनीकी अधिकारी (शहरी स्वास्थ्य) पाल रोजेनबर्ग ने कहा, "ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर तेजी से होते पलायन ने भी जनस्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर दिया है." उन्होंने कहा कि वर्ष 2050 तक भारत की 50 फीसदी आबादी शहरी हो जाएगी. स्वास्थ्य असमानता के साथ बढ़ते शहरीकरण का भी गहरा संबंध है. इस अहम मुद्दे पर तुरंत ध्यान देना जरूरी है.

डेकिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड ओसबर्न ने कहा, "एशियाई देशों में बढ़ती स्वास्थ्य असमानता और खराब स्वास्थ्य की एक प्रमुख वजह स्वास्थ्य साक्षरता का अभाव है. इस मुद्दे पर अब तक खास ध्यान नहीं दिया गया है." उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य साक्षरता की चुनौतियों से निपटने के लिए व्यवहारिक रणनीति बना कर उसे जमीनी स्तर पर लागू करना जरूरी है. इससे खतरे पर अंकुश लगाने में काफी सहयता मिलेगी.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

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