किसान की मौत पर छिड़ी सियासत

देश भर से कई किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रही हैं. लेकिन जब दिल्ली में 'आप' की किसान रैली में ही एक किसान फांसी के फंदे पर झूल गया, तब अचानक इस पर राष्ट्रीय विमर्श और आरोपों-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरु हो गया है.

गुरुवार सुबह से ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर के बाहर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया. बुधवार को दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की रैली के दौरान एक किसान ने खुदकुशी कर ली थी. आप ने यह किसान रैली मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आयोजित की थी. समाचार एजेंसी एपी ने लिखा है कि बीते कुछ हफ्तों में ही कम से कम 40 किसानों की आत्महत्या की खबरें आयी हैं. कर्ज में दबे किसानों को असामयिक बरसात में तबाह हुई फसलों के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा है. पिछले बीस सालों में देश में करीब 3 लाख किसानों ने अपनी जान ली है.

विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार किसानों की मदद के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है. इसके अलावा, आम आदमी पार्टी की रैली में इकट्टा हुए कई किसानों ने मोदी सरकार के नए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर असंतोष जताया. उनका मानना है कि इस कानून के कारण उन्हें अपनी खेती की जमीन को अपनी मर्जी के खिलाफ व्यापारी वर्ग और उद्योगपतियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

बुधवार को आत्महत्या करने वाले इस किसान का नाम गजेन्द्र सिंह बताया जा रहा है जो कि भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान के दौसा का रहने वाला था. भारतीय मीडिया में खबरें आईं कि किसान ने कथित रूप से अपने पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसमें उसने फसल बर्बाद हो जाने के कारण हुए भारी नुकसान की बात लिखी थी. राजस्थान के सरकारी अधिकारियों ने बताया है कि भारी वर्षा ने राज्य की 30 फीसदी फसल बर्बाद की है जबकि किसानों का कहना है कि बर्बादी का स्तर इससे कहीं ज्यादा है.

किसान की मौत पर केंद्रीय गृह मंत्री ने शोक व्यक्त किया. प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्विटर पर किसान के परिवार के लिए लिखे अपने शोक संदेश में कहा कि उसकी मृत्यु से "पूरा देश दुखी है." रैली के आयोजकों ने कहा कि उन्हें लगा था कि वह किसान केवल रैली में अवरोध डालने की कोशिश कर रहा था. जब उसने फांसी लगा ली तब वे उसे पेड़ से उतारने दौड़े और उसे लेकर अस्पताल पहुंचे जहां वह मृत घोषित किया गया. गजेन्द्र के परिजनों ने बताया है कि उनके इलाके में सरकारी आश्वासनों के बावजूद किसानों को किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं मिली है. पूरे उत्तरी भारत के राज्यों में सरकार ने मदद का वादा किया था लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के चक्करों में उलझने के कारण अभी तक उन किसानों को कोई भुगतान नहीं हुआ है जिनकी फसल बर्बाद हो चुकी है.

आरआर/ एमजे (रॉयटर्स, एपी, पीटीआई)

खतरे में है धरती

जमीन के नीचे

मुट्ठी भर मिट्टी में उससे ज्यादा जीव रहते हैं जितने इंसान धरती पर रहते हैं. वे इस बात का ख्याल रखते हैं कि खाद की परत में पोषक तत्व और पानी जमा रहता है. समुद्र के बाद जमीन ही कार्बन डाय ऑक्साइड का सबसे बड़ा भंडार हैं. वे सारे जंगलों से ज्यादा कार्बन सोखती है.

खतरे में है धरती

ढक दी जमीन

दुनिया भर में शहर बढ़ रहे हैं. खेती की जमीन कंक्रीट और रोड के नीचे दबकर खत्म हो रही है. नकली चादर के नीचे छोटे छोटे जीवों का दम घुट रहा है. वर्षा का पानी जमीन के नीचे जाने और उसे नम बनाने के बदले बहकर दूर चला जा रहा है.

खतरे में है धरती

हवा के झोंके

धरती की संवेदनशील त्वचा इंसान की त्वचा की ही तरह सूरज, हवा और ठंड से सुरक्षा चाहती है. जमीन में पानी न रहने से, उसकी नमी खत्म होने से बड़े बड़े इलाके सूख सकते हैं और हल जोतने के बाद ढीली हुई मिट्टी को तेज हवाएं उड़ाकर ले जाती है.

खतरे में है धरती

रेत बनती धरती

जमीन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी अच्छा नहीं. जंगल काटने, बहुत ज्यादा खाद डालने और अत्यधिक घास चराने से कम पानी वाले इलाके रेगिस्तान में बदल जाते हैं. सूखे जैसे कारक इंसान द्वारा शुरू की गई इस प्रक्रिया को तेज कर देते हैं.

खतरे में है धरती

बहा ले गया पानी

पानी की तेज धार भी उपजाऊ मिट्टी को बहा ले जाती है. जब तेज बरसात का पानी कंक्रीट या सड़कों पर गिरता है, जब गर्मी के कारण गलने वाले बर्फ का पानी नदी का जलस्तर बढ़ा देता है, तो इसके साथ अच्छी फसल देने वाली मिट्टी भी बह जाती है.

खतरे में है धरती

फायदे के लिए चूसा खेत

बड़े इलाके में एक ही तरह की फसल के लिए अतिरिक्त खाद और कीटनाशकों की जरूरत होती है. फसल को फायदेमंद बनाने के लिए खाद का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. दुनिया भर में करीब 40 फीसदी जमीन खाद के अत्यधिक इस्तेमाल से खतरे में है.

खतरे में है धरती

अनुपयोगी होती जमीन

बड़ी झीलों में बहुत सारा पानी भाप बन जाता है, मौसम बदलने के कारण बहुत से इलाकों में पर्याप्त बरसात नहीं होती. इसकी वजह से पानी में मिला लवण ऊपरी सतह पर रह जाता है. इसका असर मिट्टी की उर्वरता पर पड़ता है और जमीन को अनुपयोगी बनाता है.

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दूषित जमीन

उद्योग का कचरा हो, दुर्घटना या युद्ध की वजह से हुआ प्रदूषण या खाद के सालों के नियमित उपयोग से, कोई जमीन एक बार दूषित हो जाए तो नुकसान को खत्म करना बहुत ही मुश्किल और खर्चीला होता है. चीन में 20 फीसदी जमीन के दूषित होने का अंदेशा है.

खतरे में है धरती

खनन की जरूरत

खनिज हासिल करने के लिए मिट्टी को हटाया जा रहा है. जर्मनी में भी भूरे कोयले के खनन के लिए उपजाऊ जमीन की बलि दी जा रही है. इस तरह जमीन का इस्तेमाल जैव विविधता की रक्षा, खेती या रिहाइश के लिए नहीं किया जा सकता.

खतरे में है धरती

नया जीवन

प्रकृति को जमीन की सतह पर उर्वरक मिट्टी की परत डालने में दो हजार साल लगते हैं, जिस पर पेड़ पौधे उग सकें और पानी तथा पोषक तत्व जमा हो सकें. फसल लायक उपजाऊ जमीन की सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में अंतरराष्ट्रीय भूमि वर्ष मनाने का फैसला किया है.

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