क्या अफगानिस्तान में निष्पक्ष चुनाव हो पाएंगे?

अमेरिका द्वारा 2001 में अफगानिस्तान पर हमले के बाद से वहां जब भी चुनाव हुए हैं तो धांधली हुई है. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा इसलिए क्योंकि अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक नींव कमजोर है. क्या आगामी चुनाव धांधली से बच पाएगा?

अमेरिका ने जब 17 साल पहले अपने समर्थकों के साथ तालिबान पर हमला किया तो उम्मीद जगी कि अब युद्धग्रस्त इस देश में लोकतंत्र की शुरुआत होगी, पर ऐसा हुआ नहीं. 2004 के राष्ट्रपति चुनाव और 2005 में हुए संसदीय चुनाव में धोखाधड़ी और अनियमितताओं के मामले सामने आए. लेकिन चूंकि ये चुनाव दशकों के गृहयुद्ध और तनातनी के बाद हुए थे, ऐसे में लोगों को भरोसा था कि परिस्थितियां बेहतर हो जाएंगी. यह उम्मीद 2009 में फिर टूटी जब राष्ट्रपति पद के चुनाव हुए. इस चुनाव में सुरक्षा मामलों, मतपेटी में गड़बड़ी व धोखधड़ी के अन्य मामले सामने आए.

राष्ट्रपति हामिद करजई और अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह के बीच दोबारा चुनाव कराने की घोषणा हुई लेकिन अब्दुल्लाह के मना करने के बाद करजई फिर से अगले पांच वर्षों के लिए राष्ट्रपति बन गए. अफगानिस्तान के चुनावों में गिरावट 2010 के संसदीय चुनावों में भी जारी रही. 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस' की तर्ज पर शक्तिशाली लोगों ने संसद की सीट पर कब्जा कर लिया. सबसे बुरी स्थिति 2014 के चुनाव में हुई जब देश एक बार फिर गृहयुद्ध की कगार पर आ गया. चुनावी उम्मीदवार अशरफ गनी और अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह, दोनों ने खुद को विजयी घोषित कर दिया और उनके समर्थकों ने चेतावनी दी कि अगर उनके नेता को नहीं चुना गया तो वे समानांतर सरकार बना लेंगे. यह संकट अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद दूर हुआ और दोनों नेताओं ने सत्ता का बंटवारा किया.

सुरक्षा की चिंता

अफगानिस्तान के खराब ट्रैक रिकॉर्ड की वजह से साफ-सुथरे चुनावों को लेकर भरोसा कायम नहीं हो पाया है. सुरक्षा से जुड़े मुद्दे इस समस्या को और बढ़ा देते हैं. यहां तक की अफगानियों के स्टैंडर्ड के मुताबिक भी आगामी चुनावों को लेकर संशय बरकरार है. यूरोपीय संघ के अफगानिस्तान के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख पियर मायायुडन कहते हैं, ''वर्तमान सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए हम केवल धोखाधड़ी को कम कर सकते हैं.'' उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, ''महत्वपूर्ण यह है कि चुनावी नतीजे अफगानिस्तान के लोगों को कबूल हों. इसका मतलब है कि धोखाधड़ी और धांधली को कम किया जाए.''सुरक्षा चुनौतियों का मसला सिर्फ अफगानी वोटरों के साथ ही नहीं बल्कि उम्मीदवारों के साथ भी है. चुनाव की घोषणा के बाद से कम से कम दस उम्मीदवारों को विद्रोहियों द्वारा किए हमले में मारा जा चुका है. वहीं उग्रवादियों ने सैकड़ों अफगानियों को भी मारा है. दरअसल तालिबान व अन्य विद्रोहियों ने कसम खाई है कि वे आगामी चुनावों को लेकर हमले करते रहेंगे. उनका कहना है कि ये चुनाव अफगानियों पर विदेशियों ने थोपे हैं. हाल ही में तालिबान ने शिक्षकों और छात्रों को चेतावनी देकर कहा है कि वे वोट न दें और स्कूलों को वोटिंग सेंटर न बनने दें.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

आईएस की शुरुआत

2014 में अमेरिका और नाटो जब अफगानिस्तान में अपने युद्ध मिशन को समेट रहे थे तो आईएस ने वहां पहली बार अपने पैर जमाने की कोशिश की. हाल के सालों में कई बड़े हमले कर आईएस ने अफगानिस्तान में अपनी ताकत को लगातार बढ़ाया है.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

पाकिस्तानी लड़ाके

अफगानिस्तान में आईएस की शाखा को मुख्य रूप से पाकिस्तानी तालिबान के उन लड़ाकों ने शुरू किया जिन्हें पाकिस्तान में सैन्य अभियान के बाद भागना पड़ा था. हिंसा कम करने और शांति प्रकिया जैसे मुद्दों पर अफगान तालिबान के नेतृत्व से नाराज कई लड़ाके भी इस गुट में शामिल हो गए.

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बढ़ी ताकत

शुरू में आईएस पाकिस्तान से लगने वाले पूर्वी अफगान प्रांत नंगरहार तक ही सीमित था. लेकिन अब उसने उत्तरी अफगानिस्तान तक अपना विस्तार कर लिया है. पाकिस्तान के दक्षिणी वजीरिस्तान से निकाले गए इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान के लड़ाकों को साथ लेने से उसकी ताकत बढ़ी है.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

खोरासान प्रांत

इराक और सीरिया में जहां इस्लामिक स्टेट अपने नियंत्रण वाले इलाके को खिलाफत का नाम देता था, वहीं अफगानिस्तान में उसकी शाखा अपने इलाके को खोरासान प्रांत कहती है. खोरासान मध्य एशिया का प्राचीन नाम है जिसमें आज का अफगानिस्तान भी आता है.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

निशाने पर शिया

तालिबान की तरह ही आईएस की अफगान शाखा भी देश से अमेरिका के समर्थन वाली सरकार को बेदखल कर कट्टर इस्लामी शासन लागू करना चाहती है. लेकिन तालिबान जहां सरकारी इमारतों को निशाना बनाते हैं, वहीं आईएस के निशाने पर शिया समुदाय के हजारा लोग हैं.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

समाज में फूट

आईएस शिया लोगों को धर्म से पथभ्रष्ट मानता है. काबुल में रहने वाले सुरक्षा विश्लेषक वाहिद मुजदा कहते हैं कि जिहादी समूह आईएस अफगान समाज में सांप्रदायिक मतभेद पैदा करना चाहता है. आईएस खुद की तालिबान से अलग पहचान बनाने के लिए शिया लोगों को निशाना बना रहा है.

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बगदादी के वफादार

इस बारे में सटीक जानकारी नहीं है कि अफगानिस्तान में आईएस कितना बड़ा है. लेकिन अनुमान है कि उसके लड़ाकों की संख्या तीन से पांच हजार के बीच है. अफगानिस्तान में सक्रिय आईएस लड़ाके भी अबु बकर अल बगदादी के वफादार हैं और उसकी तरह दुनिया में मुस्लिम खिलाफत का सपना देखते हैं.

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खून से रंगे हाथ

सीरिया और इराक में आईएस को शुरू करने वाले बगदादी की तरह अफगान आईएस लड़ाकों को शियाओं से नफरत है. अफगानिस्तान की 3.5 करोड़ की आबादी में अल्पसंख्यक शिया 15 प्रतिशत है. वहीं आईएस एक सुन्नी गुट है, जिसे शियाओं के खून से हाथ रंगने में कोई हिचकिचाहट नहीं है.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

बेहाल सुरक्षा

अफगानिस्तान में आईएस की बढ़ती ताकत को देखते हुए शियाओं ने अपने धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ा दिया है. लेकिन देश में समूची सुरक्षा व्यवस्था डांवाडोल है. लगातार हो रहे हमलों को रोकना सुरक्षा बलों की क्षमता से बाहर दिख रहा है.

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लोगों का कितना समर्थन

अफगानिस्तान एक सुन्नी बहुल रुढ़िवादी समाज है. लेकिन वहां आईएस को ज्यादा लोगों का समर्थन प्राप्त नहीं है. हालांकि तालिबान ने कई बड़े हमले किए हैं, लेकिन कई इलाकों में वे प्रशासन भी चला रहे हैं. कुछ अफगान लोग काबुल की 'भ्रष्ट सरकार' से ज्यादा तालिबान को पसंद करते हैं.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

देसी बनाम विदेशी

दूसरी तरफ इस्लामिक स्टेट को सिर्फ बर्बर हिंसा के लिए जाना जाता है जिसकी दुनिया भर में निंदा होती है. अफगानिस्तान में आईएस को एक विदेशी संगठन के तौर पर देखा जाता है जबकि तालिबान खुद अफगान धरती पर पैदा हुए.

अफगानिस्तान में आईएस ने ऐसे पैर जमाए

शांति प्रक्रिया

तालिबान और आईएस में कई अंतर हैं. मसलन तालिबान ने कभी बगदादी के इस दावे को स्वीकार नहीं किया कि वह पूरे मुस्लिम जगत में फैली खिलाफत का नेतृत्व करता है. साथ ही तालिबान ने कई बार शांति प्रक्रिया में शामिल होने की इच्छा जताई है, जबकि आईएस पूरी तरह से इसके खिलाफ है.

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जंग का मैदान

नंगरहार प्रांत में आईएस और तालिबान एक दूसरे से लड़ते रहे हैं. रूस और कई अन्य देश आईएस के बढ़ते असर को रोकने के लिए तालिबान के साथ सहयोग के हक में हैं. लेकिन शांति वार्ता के मोर्चे पर कोई प्रगति न होने की वजह अफगानिस्तान बदस्तूर जंग का मैदान बना हुआ है.

विशेषज्ञों का कहना है कि हिंसा और धांधली की आशंका अफगानियों को वोट डालने से रोकते हैं. वाशिंगटन स्थित थिंकटैंक वुड्रो विल्सन सेंटर में दक्षिण एशिया के उप निदेशक माइकल कुगेलमन सवाल करते हैं, ''अफगान क्यों अपनी जान जोखिम में डालकर ऐसे चुनाव के लिए वोट डालने जाएंगे जिसके निष्पक्ष होने पर संदेह है.''

काबुल यूनिवर्सिटी में लेक्चरर फैज मोहम्मद जालांद का कहना है, ''शक्तिशाली नेताओं ने कभी भी चुनाव में हार को कबूल नहीं किया और मानते हैं कि वे सत्ता में भागीदारी बनने के योग्य हैं.'' उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, ''अफगानिस्तान का चुनावी संस्थान कभी इतना शक्तिशाली और निष्पक्ष नहीं रहा कि वह सही तरीके से काम कर सके. उनके मुताबिक, ''पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान की नींव को मजबूत किए बिना समय से पहले ही लोकतंत्र थोप दिया है.''

संसदीय चुनावों के बाद 2019 में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं. आम लोगों में डर है कि देश की सुरक्षा एक बार फिर गर्त में चली जा सकती है. 

मसूस सैफुल्लाह (वीसी)

क्या कभी सुधरेगा अफगानिस्तान का हाल

चरमराती सुरक्षा व्यवस्था

पिछले कई महीनों से अफगानिस्तान कभी बम धमाके तो कभी आत्मघाती हमलों के चलते सुर्खियां बटोर रहा है. अब तक इसमें कई सौ बेकसूर अफगान लोगों की जान जा चुकी है. लेकिन देश की सुरक्षा व्यवस्था सुधरने का नाम ही नहीं ले रही. इन हमलों ने स्थानीय लोगों में निराशा भर दी है. वहीं सरकार भी सुरक्षा के मसले पर विफल साबित हो रही है.

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लगातार हो रहे हमले

लगातार हो रहे इन हमलों ने एक बार फिर अफगानिस्तान को दुनिया की निगाहों में ला दिया है. आतंकवादी गुट तालिबान और इस्लामिक स्टेट (आईएस) समय-समय पर इन हमलों की जिम्मेदारी लेते रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ अफगानिस्तान सरकार पर भी दबाव है कि वह तालिबान और आईएस के कब्जे वाले इलाकों में अपना शासन कायम कर सके.

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आक्रामक नीति

हाल में ही तालिबान ने अफगानिस्तान के भीतर बेहद ही आक्रामक नीति अपनाने की घोषणा की. साथ ही राष्ट्रपति के साथ शांति वार्ता के प्रस्ताव को भी सिरे से खारिज कर दिया. आतंकवादी गुट अफगानिस्तान में सख्त इस्लामिक कानूनों को लागू करने के पक्षधर हैं. उनका आक्रामक कैंपेन अमेरिका की कड़ी सैन्य रणनीतियों का उत्तर है.

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ट्रंप की अफगान नीति

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पिछले साल अफगानिस्तान के लिए नई रणनीति तय की थी. इसके तहत अफगान सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण और मदद के लिए 11000 अतिरिक्त शीर्ष अमेरिकी सैनिकों की तैनाती की बात कही गई थी. इसके साथ ही ट्रंप ने तालिबान के खिलाफ लड़ाई में अफगान सैनिकों को समर्थन देने की प्रतिबद्धता जताई थी. साथ ही यह भी कहा था कि अफगानिस्तान में जरूरत के मुताबिक अमेरिका की उपस्थिति बनी रहेगी.

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अफगान शांति प्रक्रिया

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने इस साल फरवरी में तालिबान के सामने शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था. लेकिन तालिबान ने इस ओर कोई रुचि नहीं दिखाई. और, इसे एक षड्यंत्र कहकर खारिज कर दिया. विशेषज्ञों के मुताबिक कोई भी आतंकी समूह उस वक्त बातचीत में शामिल नहीं होगा जब जमीन पर उसकी पकड़ मजबूत बनी हुई हो.

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पाकिस्तान की भूमिका

अफगानिस्तान के धमाके, पाकिस्तान पर भी दबाव बढ़ा रहे हैं. अफगानिस्तान और अमेरिका दोनों ही पाकिस्तान पर आतंकियों को आश्रय देने का आरोप लगाते रहे हैं. लेकिन पाकिस्तान लगातार इन आरोपों का खंडन करता रहा है.

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तालिबान के इतर

तालिबान के अलावा अफगान लड़ाकों के सरदारों की भी देश की राजनीति में अहम भूमिका है. पिछले साल, हिज्ब-ए-इस्लामी के नेता गुलबुद्दीन हिकमतयार 20 साल देश से बाहर रहने के बाद अफगान राजनीति में वापस लौ़टे हैं. साल 2016 में अफगान सरकार ने हिकमतयार के साथ इस उम्मीद के साथ समझौता किया था कि ये समूह काबुल के साथ बेहतर संबंध रखेंगे.

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असक्षम सरकार

अफगानिस्तान में सत्ता के लिए जारी इस लड़ाई का असर राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी हो रहा है. मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ गनी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता जनता के बीच लगातार घट रही है. वहीं अफगान सरकार में बढ़ते भ्रष्टाचार और भीतरी खींचतान के चलते भी आतंकवाद के खिलाफ सरकार की मुहिम कमजोर पड़ी है.


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