क्या इंसानों जैसी बेईमानी सीख रहे हैं गोरिल्ला?

आपने अपने आसपास के बंदरों में छीना-झपटी की प्रवृत्ति जरूर देखी होगी. कई जगह बंदर लोगों का सामान छीन ले जाने के लिए कुख्यात हैं लेकिन अब पता चला है कि गुरिल्ला को बेईमानी करना भी आता है.

बंदरों के व्यवहार को इंसानों के बेहद करीब माना जाता है, लेकिन अब इंसानों जैसा व्यवहार गोरिल्लों में भी देखा जा रहा है. इंग्लैंड के गुरिल्ला पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि उनमें इंसानों की तरह बेईमानी जैसे अवगुण भी हो सकते हैं. प्रयोग के दौरान एक चिड़ियाघर में रहने वाले गुरिल्लों के सामने एक डिवाइस पेश की गई, जिसकी मदद से उन्हें मूंगफली के दानों को बाधाएं पार कर अपनी सही जगह पहुंचाना था. लेकिन कुछ गुरिल्लों ने इस खेल के नियमों से अलग मूंगफली को नीचे गिराने के आसान तरीके खोज निकाले.

इंग्लैंड के ब्रिस्टल चिड़ियाघर के डाक्टर फे क्लार्क कहती हैं, "हमने इस प्रयोग में गोरिल्लों के भीतर बहुत से बेईमानी के तरीकों को देखा है. मसलन गोरिल्लों ने अपने मुंह का इस्तेमाल कर दानों को नीचे गिरा दिया. उपकरणों को ऐसे इस्तेमाल करने के लिए नहीं बनाया गया था." क्लार्क कहती हैं कि ये गोरिल्लों के व्यावहारिक लचीलेपन को दिखाता है कि कैसे वे अपने भोजन को हासिल करने के लिए नए तरीकों को खोज निकालने में सक्षम हैं. 

Gorillas

उन्होंने कहा, "गोरिल्ला के पास समस्याओं को सुलझाने की अद्भुत क्षमता होती है जिस पर पहले कभी ध्यान नहीं दिया गया है."

खेल के इन तरीकों को इस साल सबसे पहले पेश किया गया था. वैज्ञानिक कहते हैं कि मूंगफली का खेल गोरिल्ला के बीच काफी लोकप्रिय हैं. लुप्त जानवरों की श्रेणी में आने वाले ये गोरिल्ला अकसर इस खेल को तब भी खेलते हैं, जब वहां जीतने के लिए मूंगफली जैसा भी कुछ नहीं होता.

प्रकृति और पर्यावरण | 26.10.2017

इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल और ब्रिस्टल जूलॉजिकल सोसाइटी ने गोरिल्ला गेम लैब प्रोजेक्ट को विकसित किया है, जिसका मकसद गोरिल्ला की ज्ञान और समस्याओं की सुलझाने की क्षमताओं को प्रोत्साहित करना है. कयास लगाए जा रहे हैं कि यह क्षमता इंसानों की तुलना में सात गुना ज्यादा हो सकती है. प्रोजेक्ट से जुड़े रिसर्चर कहते हैं इस प्रोजेक्ट का मकसद गोरिल्लों के भीतर सकारात्मक मनोवैज्ञानिक स्थिति और खुशी का भाव पैदा करना है.

विज्ञान

अंतरिक्ष की पहली उड़ान

1947 में सोवियत संघ ने पहली बार जीव को अंतरिक्ष में भेजा. वह एक मक्खी थी. दस साल बाद 1957 में सोवियत संघ ने एक कुतिया को अंतरिक्ष में भेजा. लेकिन रॉकेट लॉन्च के कुछ घंटों बाद लाइका मर गयी.

विज्ञान

पहली सफलता

लाइका की मौत के बावजूद सोवियत संघ ने कुत्तों को अंतरिक्ष भेजना जारी रखा. धीरे धीरे रॉकेटों को ज्यादा सुरक्षित बनाया जाने लगा. 1960 में स्ट्रेल्का और बेल्का नाम के कुत्तों को अंतरिक्ष में वापस भेजा गया. दोनों सुरक्षित वापस लौटे. 1961 में स्ट्रेल्का का एक बच्चा तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी को भेंट भी किया गया.

विज्ञान

फिर बंदर की बारी

रूस जहां कुत्तों को अंतरिक्ष में भेज रहा था, वहीं अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा बंदरों के भरोसे तैयारियां कर रही थी. 1958 में अमेरिका ने गोर्डो नाम के बंदर को अंतरिक्ष में भेजा लेकिन उसकी मौत हो गयी. साल भर बाद 1959 में मिस बेकर और एबल नाम के बंदरों को भेजा गया. दोनों सुरक्षित वापस लौटे.

विज्ञान

बंदरों पर असर

एबल और मिस बेकर पृथ्वी की कक्षा से जिंदा वापस लौटने वाले पहले बंदर थे. 500 किलोमीटर ऊपर भारहीनता ने बंदरों की हालत खस्ता कर दी थी. लैंडिंग के कुछ ही देर बाद एबल की मौत हो गयी. मिस बेकर 1984 में 27 साल की उम्र पूरी करके विदा हुई.

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कैप्सूल का प्रयोग

सैम भाग्यशाली रहा कि उस पर मिस बेकर और एबल की तरह भारहीनता के प्रयोग नहीं किये गए. सैम नाम के बंदर के जरिये अंतरिक्ष यात्रियों को जिंदा रखने वाले कैप्सूल का टेस्ट हुआ. सैम इस टेस्ट में कामयाब रहा.

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पहला चिम्पांजी

कुत्ते और बंदरों के बाद इंसान के बेहद करीब माने जाने वाले चिम्पांजी की अंतरिक्ष यात्रा का नंबर आया. 1961 में अमेरिका ने हैम नाम के चिम्पाजी को अंतरिक्ष में भेजा. उसने छह मिनट तक भारहीनता का सामना किया. वह जिंदा वापस लौटा. उसके शरीर का अध्ययन कर भारहीनता में शरीर कैसे काम करता है, यह समझने में मदद मिली.

विज्ञान

छोटे लेकिन टफ जीव

कुत्तों, बंदरों और चिम्पांजी को अंतरिक्ष में भेजने के बाद इंसान भी अंतरिक्ष में गया. लेकिन ऐसा नहीं है कि अब दूसरे जीवों को अंतरिक्ष में भेजने का काम बंद हो गया है. यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने 2007 में टार्डीग्रेड नाम के सूक्ष्म जीवों को अंतरिक्ष में भेजा. वे 12 दिन जीवित रहे. उनकी मदद से पता किया जा रहा है कि निर्वात और सौर विकिरण जीवन पर कैसा असर डालता है. (रिपोर्ट: लीजा हैनेल/ओएसजे)

एए/आरपी (रॉयटर्स)