क्या रिजर्व बैंक के रेट कट से होगा मोदी सरकार को फायदा?

भारतीय रिजर्व बैंक ने इस बार रेपो रेट में कमी कर सबको चौंका दिया. अर्थशास्त्री कहते हैं कि इससे किसी को फायदा नहीं होगा. मगर कुछ नेताओं का मानना है कि इससे सरकार को वोटरों को रिझाने में मदद मिल सकती है.

भारत के केंद्रीय बैंक,आरबीआई ने 18 महीने में पहली बार ब्याज दरों को कम किया है, जिससे देश के सभी अर्थशास्त्री आश्चर्यचकित हैं. जानकारों का मानना है कि ये चुनाव से ठीक पहले सेंट्रल बैंक की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को मिला तोहफा है.

इस दावे की जांच करें तो पहला सवाल यह है कि आखिर इस रेट कट का मोदी सरकार को फायदा कैसे मिल सकता है. खुद मोदी सरकार के समर्थक, कई कारोबारी और किसान मानते हैं कि इससे बहुत कुछ नहीं बदलेगा क्योंकि ये बदलाव लाने में रिजर्व बैंक ने काफी देरी कर दी है और मई में होने वाले चुनाव से पहले इसका कुछ ज्यादा असर नहीं होगा.

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को ऋण देते हैं. रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे. जैसे कि घर या गाड़ी खरीदने के लिए लिया जाने वाला लोन.

पिछले साल से ही रिजर्व बैंक के ऊपर सरकार और कारोबारियों की बात मानते हुए रेपो रेट में कटौती करने के लिए दवाब बना हुआ था. लेकिन इस बार जाकर बैंक के रेपो रेट में एक चौथाई अंकों की कमी की गई है. भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता के बारे में बीते कई महीनों से सवाल उठते रहे हैं, जिसके चलते दिसंबर में गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह मोदी प्रशासन के करीबी माने जाने वाले शक्तिकांत दास लाए गए.

वोटरों को रिझाने के लिए

हाल ही में देश के कई राज्यों में हुए चुनाव से ऐसे संकेत मिले थे कि मोदी सरकार ने ग्रामीण इलाकों में अपनी लोकप्रियता खो दी है. लोगों को लगने लगा था कि सरकार को किसानों की लगातार गिरती आय और नई नौकरियां पैदा करने की कोई चिंता नहीं है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अश्वनी महाजन का मानना है कि इस रेट कट से मोदी सरकार को फायदा होगा क्योंकि इससे आर्थिक विकास होगा और छोटे व्यवसायों को कर्ज देना भी आसान होगा. मगर महाजन कहते हैं, "ये काफी नहीं हैं. नए गवर्नर ने अपनी परीक्षा पास तो कर ली है मगर सिर्फ 50 प्रतिशत से. रेट कट कम से कम आधे अंकों का होना चाहिए था."

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति में छह लोग होते हैं, जिनमें से चार लोगों ने रेट कट के लिए समर्थन दिया था. मगर सभी लोगों ने मानना था कि रिजर्व बैंक की नीति को 'न्यूट्रल' से बदल कर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर देना चाहिए. 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' का मतलब होता है कि बचे हुए वित्तीय वर्ष में रेट कट नहीं होगा. रिजर्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों के लिए कर्ज देना आसान कर दिया है और बिना गारंटी के कर्ज की सीमा भी बढ़ा दी है, जिससे 12 करोड़ ग्रामीण परिवारों को फायदा हो सकता है.

सरकार ने रेट कट का स्वागत किया क्योंकि इससे ये धारणा बदलने में मदद मिलेगी कि सरकार लोगों की कर्ज की समस्या हल करने के लिए कुछ नहीं कर रही है. जब से सरकार ने देश में नोटबंदी और जीएसटी लागू किया है, तब से कई लोगों में सरकार के प्रति ऐसी नाराजगी है. ये रेट कट बजट के एक ही हफ्ते बाद आया है और इस बार के बजट में भी किसानों और निम्न मध्यम वर्ग के लिए कई योजनाएं पेश की गई हैं. 

बाजार को झटका

ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना था कि इस बार दरों को कम नहीं किया जाएगा. अब अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि ना तो इस कदम के बारे में किसी ने सोचा था ना तो इस कदम से किसी को फायदा होगा. इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के प्रमुख अर्थशास्त्री देवेंद्र कुमार पंत का कहना है, "इस रेट कट से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि इससे निवेश नहीं बढ़ेगा. निर्माण क्षेत्र अभी भी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहा है."

कुछ अर्थशास्त्री इस पर चिंता जता रहे हैं कि इस कदम से आगे चल कर महंगाई काफी बढ़ सकती है क्योंकि बजट में भी बहुत सा राजस्व प्रोत्साहन दिया गया है. यह भी हो सकता है कि 1 अप्रैल से शुरु हो रहे अगले वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाही में महंगाई बढ़े. कुछ का मानना है कि बजट के बाद रिजर्व बैंक ने सरकार के दवाब में आकर फिलहाल अर्थव्यवस्था को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन देने वाला कदम उठाया है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बढ़ती महंगाई के रूप में सामने आएंगे. 

बहुत कम और बहुत देर से

शेयर बाजार विश्लेषकों का कहना है कि इस रेट कट से मोदी सरकार को आने वाले चुनाव में कोई फायदा नहीं मिलेगा. इसका कारण ये है कि बैकों के पास इस रेट कट का फायदा लोगों तक पहुचाने का ज्यादा समय ही नहीं बचा है. बीते विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने तीन राज्यों में हार देखी और आने वाले लोकसभा चुनावों मे भी हो सकता है कि कांग्रेस बाकी पार्टियों के साथ मिल कर बीजेपी को अच्छी ठक्कर दे. इस रेट कट से बाजार में आर्थिक मंदी भी आ सकती है. रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने भी अप्रैल-सितम्बर 2019 का आर्थिक वृद्धि का अपना पूर्वानुमान कम करके 7.2 से 7.4 प्रतिशत की रेंज में कर दिया है. ये पहले 7.5 प्रतिशत था. रेपो रेट कम करने को आर्थिक विकास की दर के धीमे होने का संकेत भी माना जाता है. 

कारोबारियों और किसानों का कहना है कि कर्ज लेने में अब भी बड़ी परेशानी पेश आती है. उत्तर प्रदेश के शामली में रहने वाले एक किसान देशपाल राणा कहते हैं, "खाद और डीजल के दाम बढ़ने की वजह से हमको ज्यादा कर्ज लेना पड़ता है. हम कई बार निजी साहूकारों से कर्ज लेते हैं जो हम से 24 प्रतिशत तक ब्याज लेता है. हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि बैंक हमें कर्ज देने से मना कर देते हैं."

एनआर/आरपी (रॉयटर्स)

इन गवर्नरों ने दिया आरबीआई से इस्तीफा

उर्जित पटेल

निजी कारणों का हवाला देते हुए आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने 10 दिसंबर 2018 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. माना जाता है कि यह इस्तीफा पटेल और केंद्र सरकार के बीच मतभेदों का नतीजा है. जानकारों के मुताबिक दोनों पक्षों में स्वायत्ता के मसले पर टकराव की स्थिति थी.

इन गवर्नरों ने दिया आरबीआई से इस्तीफा

क्या था विवाद

स्थानीय मीडिया के मुताबिक वित्त मंत्रालय रिजर्व बैंक कानून की धारा सात को लागू करने पर सोच विचार कर रही थी. यह धारा बैंक के गवर्नर को जनहित के मुद्दों पर निर्देश देने का अधिकार देती है. कहा तो यह भी गया कि सरकार बैंक से 3 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक की मांग कर रही है, जिसका आरबीआई विरोध कर रहा है.

इन गवर्नरों ने दिया आरबीआई से इस्तीफा

आर एन मल्होत्रा

आर एन मल्होत्रा फरवरी 1985 से दिसबंर 1990 तक आरबीआई के गवर्नर रहे. वीपी सिंह सरकार ने मल्होत्रा का कार्यकाल बढ़ा दिया था. लेकिन वीपी सिंह के बाद केंद्र में आई चंद्रशेखर सरकार में वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और मल्होत्रा के मतभेदों के चलते गवर्नर ने अपना पद छोड़ दिया. इसके बाद एस वेंकटरमन केंद्रीय बैंक के गवर्नर नियुक्त किए गए.

इन गवर्नरों ने दिया आरबीआई से इस्तीफा

सर बेनेगल रामाराउ

आरबीआई के इतिहास में इस्तीफे का सबसे पहला मामला साल 1957 में सर बेनेगल रामाराउ का था. रामाराउ के तात्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी के साथ कई मुद्दों पर मतभेद थे. वित्त मंत्री कृष्णामाचारी ने आरबीआई को अप्रत्यक्ष रूप से वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाली संस्था कहा था, जिसके बाद रामाराउ ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने आगे काम करने को लेकर अपनी असमर्थता जताई और पद से इस्तीफा दे दिया.

इन गवर्नरों ने दिया आरबीआई से इस्तीफा

मनमोहन सिंह

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी ने अपनी किताब में खुलासा किया था कि साल 1984 में मनमोहन सिंह ने आरबीआई के गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया था. दरअसल उस वक्त केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विदेशी बैंकों को लाइसेंस जारी करने की शक्तियां आरबीआई से वापस लेने को मंजूरी दी थी. लेकिन सिंह के इस्तीफे को सरकार ने नहीं माना और कैबिनेट प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसके बाद मनमोहन सिंह ने अपना कार्यकाल पूरा किया.

हमें फॉलो करें