क्या वाकई खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो गया है भारत?

भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के चार साल पूरे हो गये हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 27 अब खुले में शौच से मुक्त हैं. लेकिन राइस को सच में ऐसा देखने को नहीं मिला.

स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश के आम लोगों की शौचालयों तक पहुंच बढ़ी है और खुले में शौच के मामले घटे हैं. लेकिन हाल ही में रिसर्च संस्था के अध्ययन से पता चला है कि इस मामले में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में काफी अंतर है.

भारत के आधिकारिक स्वच्छता आंकड़े की मानें तो भारत में सार्वभौमिक स्वच्छता कवरेज बहुत ही सफल रहा है. जल्दी ही देश में ये लक्ष्य पूरा कर दिया जाएगा. स्वच्छ भारत अभियान के पोर्टल के नए आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 27 अब खुले में शौच से मुक्त यानि ओपन डिफीकेशन फ्री (ओडीएफ) हैं. इसमें बताया गया है कि भारत के 98.6 प्रतिशत घरों में शौचालय की सुविधा है.

लेकिन ये आंकड़े सच्चाई से कितने करीब हैं. रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कम्पैशनेट इकोनॉमिक्स (राइस) ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में अभी भी 44 फीसदी ग्रामीण आबादी खुले में शौच करती है. जबकि स्वच्छ भारत मिशन का दावा है कि बिहार के अलावा बाकी तीनों राज्य खुले में शौच से लगभग मुक्त हो चुके हैं.

स्वच्छ भारत मिशन के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश ने ग्रामीण घरों की 100 प्रतिशत स्वच्छता कवरेज (यानि शौचालयों के साथ घरों का अनुपात) हासिल किया है. जबकि राइस सर्वेक्षण में इन तीनों राज्यों में शौचालय वाले घरों का अनुपात कम पाया गया है.

बिहार के आंकड़ों में बहुत ज्यादा अंतर दिखाई दिया है. सरकारी आंकड़े जहां बिहार में 92 प्रतिशत घरों में शौचालय बताते हैं वहीं राइस की रिपोर्ट में सिर्फ 50 प्रतिशत घरों को ही शौचालययुक्त पाया गया.

Indien | Clean India Mission in Schulen

राइस ने मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 1558 घरों का सर्वेक्षण किया. मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की बात करें तो स्वच्छता मिशन का कहना है कि इन तीनों राज्यों में 100 प्रतिशत घरों में शौचालय हैं. वही राइस का कहना है कि मध्य प्रदेश में 90 प्रतिशत, राजस्थान में 78 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में केवल 73 प्रतिशत घरों में शौचालय हैं.

राइस की रिपोर्ट में स्वच्छ भारत मिशन के असर की भी बात हुई है. शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले चार सालों में शौचालयों का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है. इन चार राज्यों में 2014 में 37 प्रतिशत ग्रामीण घरों में शौचालय थे जो कि 2018 में बढ़ कर 71 प्रतिशत हो गये हैं. ये कहना गलत नहीं होगा कि इस बढ़त का श्रेय स्वच्छ भारत मिशन को जाता है.

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राइस की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014 में जिन ग्रामीण घरों में शौचालय नहीं था उनमें से 57 प्रतिशत ग्रामीण घरों में 2018 तक एक शौचालय बना दिया गया है. 42 प्रतिशत ग्रामीण घरों को सरकार की ओर से शौचालय बनाने के लिए मदद भी दी गई है.

सर्वेक्षण में पाया गया कि इन चार राज्यों में खुले में शौच करना 2014 के 70 प्रतिशत से घटकर 2018 में 44 प्रतिशत हो गया, जिसमें मध्य प्रदेश (43 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (26 प्रतिशत) में सबसे बड़ा सुधार हुआ है.

राइस का ये भी मानता है कि ये सुधार शौचालय बनने की वजह से आया होगा, ना कि लोगों की सोच में भी बदलाव की वजह से. 23 प्रतिशत ग्रामीण घर जिनके पास शौचालय हैं वो अभी भी खुले में शौच कर रहे हैं. ये आंकड़ा 2014 में भी ऐसा ही था.

असल में राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जिनके पास शौचालय होते हुए भी वे खुले में शौच करते हैं. अगर इन सारे आंकड़ों को देखा जाए तो पता चलता है कि स्वच्छ भारत मिशन की वजह से लोगों की सोच पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है.

राइस की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन को सफल बनाने के लिए जोर जबरदस्ती भी की है. 56 प्रतिशत लोगों ने माना कि उनके गांव में दवाब बना के शौचालय का इस्तेमाल करवाया गया है. 12 प्रतिशत ने माना कि उनके घर में दवाब बनाया गया है. अनुसूचित जाति और जनजाति पर सबसे ज्यादा दवाब बनाया गया है.

राइस का कहना है कि स्वच्छता अभियान को हर ओर से देखे जाने की जरुरत है. सिर्फ शौचालय बनाने से काम नहीं चलेगा बल्कि लोगों की सोच को बदलने के बारे में भी कुछ करना होगा. इसके साथ साथ, शौचालय इस्तेमाल करने से लोगों को बीमारियां ना हों, इसके लिए पानी की व्यवस्था और मल के मिपटारे के बारे में भी योजना बनानी पड़ेगी. राइस के आंकड़े बताते हैं कि चारों राज्यों में केवल 42 प्रतिशत शौचालयों में ही जुड़वां गड्ढे वाले शौचालय थे, जो कि स्वच्छता के लिए लिहाज से बेहतर होते हैं.

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इंदौर

देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब अपने नाम करने वाला इंदौर, मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी माना जाता है.

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भोपाल

दूसरे पायदान पर कब्जा किया मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल ने. सूची के टॉप 50 शहरों में प्रदेश के 11 जिलों ने जगह बनाई है.

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विशाखापत्तनम

क्षेत्र और आबादी के लिहाज से आंध्र प्रदेश का सबसे बड़ा शहर विशाखापत्तनम तीसरे पायदान पर है.

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कपड़ा उद्योग और हीरे के लिये मशहूर गुजरात के सूरत को सर्वेक्षण में चौथा स्थान मिला है.

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मैसूर

कर्नाटक के तीसरे सबसे बड़े शहर मैसूर को राज्य की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है. इसे पांचवां स्थान मिला है.

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तिरुचिरापल्ली

साल 2016 के सर्वेक्षण में तीसरे स्थान पर रहने वाला तमिलनाडु का शहर तिरुचिरापल्ली इस साल छठे स्थान पर आ गया है.

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दिल्ली

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली को सातवां स्थान मिला है. पिछले साल यह चौथे स्थान पर था.

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नवी मुंबई

महाराष्ट्र के पश्चिमी तट पर स्थित नवी मुंबई का सूची में आठवां स्थान दिया गया है.

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तिरुपति

आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में आने वाला तिरुपति नौवें स्थान पर है. यहां स्थित तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर को हिंदुओं का पवित्र स्थल माना जाता है.

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बड़ोदरा

अहमदाबाद और सूरत के बाद गुजरात के तीसरे सबसे बड़े शहर बड़ोदरा को सूची में दसवां स्थान मिला है.

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सबसे गंदे शहर

देश के 3 सबसे गंदे शहरों में उत्तर प्रदेश का गोंडा, महाराष्ट्र का भुसावल और बिहार का बगहा शामिल है. इन्हें सूची में आखिरी स्थान दिया गया है.