क्यों कर रहा है जर्मनी शरणार्थियों का पैसा जब्त

स्विट्जरलैंड और डेनमार्क के बाद अब जर्मनी ने भी शरणार्थियों से साथ लाया गया धन और कीमती चीजें जब्त करना शुरू कर दिया है. अधिकारियों का कहना है कि वे कानून का पालन कर रही है और इसमें कुछ भी नया नहीं है.

जर्मनी के अखबार "बिल्ड" ने यह खबर छापी कि बवेरिया प्रांत में शरणार्थियों का कीमती सामान जब्त किया जा रहा है. बवेरिया जर्मनी के दक्षिण में स्थित प्रांत है जिसकी सीमा ऑस्ट्रिया से लगी है. अखबार ने गृह मंत्री योआखिम हेरमन का बयान छापते हुए लिखा है, "शरण के लिए आवेदन देने वालों की सीमा पर बनाए गए सेंटर में जांच की जाती है, उनसे पूछा जाता है कि क्या उनके पास धन, कीमती वस्तुएं या कोई कागजात हैं. अगर धनराशि और चीजों का मूल्य 750 यूरो से अधिक हो, तो उसे जमा करा लिया जाता है."

पहले स्विट्जरलैंड और फिर डेनमार्क से भी इस तरह की खबरें आ रहीं थीं. इस सूची में जर्मनी का नाम जुड़ जाने से एक आम धारणा बनने लगी कि जो जर्मनी पहले शरणार्थियों के लिए अपनी बाहें खोल रहा था, वह अब उन पर अत्याचार करने लगा है. सच्चाई क्या है, यह जानने के लिए डॉयचे वेले ने शरणार्थी मामलों से जुड़े कुछ प्रतिनिधियों से सवाल किए.

क्या होगा इस पैसे का?

बवेरिया के रिफ्यूजी काउंसिल के श्टेफान डुनवाल्ड ने हमें बताया कि इसमें कुछ भी नया नहीं है, "ऐसा हमेशा से ही होता रहा है. शरणार्थी अपने साथ जो भी ले कर आते हैं, उसे सरकार जमा करा लेती है और उसकी रसीद बना कर उन्हें दे दी जाती है. इसके बाद उन पर जो भी खर्च आता है, उसे उस पैसे में से काट लिया जाता है. औसतन महीने के 400 यूरो का हिसाब लगाया जाता है. यह जर्मनी का कानून है, इसमें शरणार्थियों पर किसी तरह की रोकटोक का कोई सवाल नहीं उठता."

एक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया, "कुछ महीने पहले एक वॉलंटियर ने मुझे फोन कर बताया कि सीरिया से एक परिवार 10,000 यूरो ले कर आया, जो कि जब्त कर लिया गया. अब वे जानना चाहते हैं कि क्या उन्हें वह पैसा वापस मिल सकता है. तो मैंने कहा, नहीं. देखिए, उस परिवार में पांच सदस्य हैं. हर एक पर 400 यूरो महीने का खर्च. यानि पांच महीने बाद वह पैसा खर्च हो चुका होगा."

जाड़ों का डर

कड़कड़ाती रातें

जर्मनी में अभी तक जाड़े आए नहीं हैं, लेकिन अच्छी खासी ठंड होने लगी है. बहुत से शरणार्थी बालकन के लंबे रास्ते से मौसम की मार झेल कर आए हैं. दिन में तापमान 10 डिग्री से ज्यादा रहता है लेकिन रात को तापमान गिरकर शून्य के करीब पहुंच जाता है.

जाड़ों का डर

आपात सुरक्षा

पास के जंगल से चुनकर लाई गई लकड़ी के सहारे शरणार्थी ठंड का मुकाबला कर रहे हैं. ऑस्ट्रिया में शरण मांगने वाले 60,000 लोगों से अलग ये जर्मनी पहुंचना चाहते हैं. इस तरह की परिस्थितियों से बचने के लिए बालकन रूट पर 100,000 लोगों के लिए रहने की व्यवस्था की जा रही है.

जाड़ों का डर

सीमा पर शिविर

जर्मनी और ऑस्ट्रिया की सीमा पर शुक्रवार से हर घंटे सिर्फ 50 शरणार्थियों को आने दिया जा रहा है. मकसद है कि उनका सही तरीके से रजिस्ट्रेशन हो सके. इंतजार के दौरान ठंड से बचाने के लिए ऑस्ट्रिया के कोलरश्लाग में शरणार्थियों के लिए तंबू लगाया गया है.

जाड़ों का डर

सीमा पर इंतजार

इसमें संदेह है कि यह नियम लंबे समय तक जारी रखा जा सकेगा. सीमा पर लगाए गए सारे तंबू बुरी तरह भरे हैं. कुश्टाइन और कोलरश्लाग में 1000 से ज्यादा शरणार्थी इंतजार कर रहे हैं. उधर अधिकारी शिकायत कर रहे हैं कि बहुत से शरणार्थी रजिस्ट्रेशन कराए बिना ही चले जा रहे हैं.

जाड़ों का डर

बालकन में मुश्किल मौसम

बालकन के रास्ते पर स्थित दूसरे देशों को सर्दियों के लायक रिहायशी जगह बनाने में और मुश्किल हो रही है. स्लोवेनिया के रिगोंसे में बहुत से शरणार्थियों को ठंड और बरसात में रात गुजारनी पड़ी. ज्यादातर जगहें सर्दियों के लायक नहीं हैं. दूसरे बालकन देशों में भी हालात बेहतर नहीं हैं.

जाड़ों का डर

खतरनाक पलायन

ग्रीक द्वीप लेसबोस बहुत से शरणार्थियों के लिए पहला मुकाम होता है. वहां का तापमान ठंडा होकर 20 डिग्री सेल्सियस हो गया है. साल के अंत तक वह 17 डिग्री हो जाएगा. जब मौसम खराब हो जाता है तो मानव तस्कर अपनी कीमत गिरा देते हैं. फिर ज्यादा शरणार्थियों के आने की संभावना है.

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लोवर सेक्सनी में गर्म तंबू

जर्मनी ने तंबुओं में शरणार्थियों को ठहराने की व्यवस्था को अस्थायी समाधान बताया था. यह गर्मियों की बात है. लेकिन इस बीच साफ हो गया है कि बहुत से शरणार्थियों को जर्मनी की सर्दियां तंबुओं में ही बितानी होगी. यहां की तरह सभी तंबुओं को गर्म करना मुमकिन नहीं है.

जाड़ों का डर

जानलेवा सर्दी

सिर्फ यूरोप आए शरणार्थी ही सर्दियों की चिंता नहीं कर रहे हैं. लेबनान में करीब 200,000 लोग बेका पहाड़ों की तलचटी में प्लास्टिक के अस्थायी तंबुओं में रह रहे हैं. पिछले साल भी लोगों को बर्फबारी का सामना करना पड़ा था. यहां जमीन के मालिक नहीं चाहते कि शरणार्थी यहां स्थायी रूप से रहें.

इसी तरह अखबार ने एक दूसरे प्रांत बाडेन वुर्टेमबर्ग के बारे में लिखा है कि वहां सीमा पर पुलिस 350 यूरो से ज्यादा का सामान जब्त कर रही है. डॉयचे वेले ने प्रांत के समेकन मंत्रालय के प्रवक्ता क्रिस्टॉफ हेरिंग से इस बारे में बात की तो उन्होंने बताया, "हम सभी शरणार्थियों की जांच नहीं करते. लेकिन पुलिस ने जब कुछ लोगों से पूछताछ की तो उन्हें पता चला कि कई लोग काफी पैसा ले कर आए हैं." हेरिंग ने यह भी बताया कि यह धारणा गलत है कि सारा पैसा एक समान सरकारी कोष में चला जाता है, "शरणार्थियों को देश भर में बांटा जाता है और एक तरह से देखा जाए तो उनका पैसा भी उनके साथ ही घूम रहा होता है. मसलन जब शरणार्थी किसी एक राज्य में पहुंच कर बैंक का खाता खोलते हैं, तब इस पैसे का हिसाब उसी खाते में जोड़ दिया जाता है."

सिर्फ पैसा नहीं, गहने भी जब्त

जर्मनी की संघीय सरकार में विदेशी मामलों की कमिश्नर आयदान ओएजगुज ने "बिल्ड" को दिए इंटरव्यू में कहा कि सरकार के पास धन के अलावा गहने जब्त करने का भी हक है क्योंकि उसे भी "निजी संपत्ति" में ही गिना जाएगा. अखबार ने उनका बयान छापा, "शरणार्थियों के अधिकार सामाजिक कल्याण भत्ता से ज्यादा नहीं होंगे." हालांकि बिल्ड में छपी इस खबर को खूब सुर्खियां मिल रही हैं और इसकी हर जगह आलोचना भी हो रही है लेकिन डॉयचे वेले ने जब ओएजगुज की प्रवक्ता से इस बयान पर सफाई मांगी, तो उन्होंने बताया कि यह कोई नया कानून नहीं है, "शायद लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं है." उन्होंने कहा कि जर्मनी के कानून के अनुसार मदद लोगों की जरूरतों के हिसाब से दी जाती है, "शरण के लिए आवेदन देने वाले को तभी मदद राशि मिल सकती है, अगर यह साबित हो कि उसे उसकी जरूरत है."

पिछले साल शुरू हुए शरणार्थी संकट से पहले भी जर्मनी में लोग शरण लेते रहे हैं. शरण देने की प्रक्रिया में साफ तौर पर लिखा है, "शरण का आवेदन देने वाले और उसके साथ रहने वाले परिजनों की कमाई और संपत्ति जब तक पूरी तरह खर्च नहीं हो जाती, तब तक मदद राशि नहीं दी जा सकती, घर के किराए पर भी यही नियम लागू होता है." साथ ही वे प्रति व्यक्ति 350 यूरो से ज्यादा की नकद राशि अपने पास नहीं रख सकते, क्योंकि धन होने का मतलब है कि वे अपना खर्च खुद उठाने की हालत में हैं और ऐसे में सरकार को उन पर खर्च करने की जरूरत नहीं है.

ग्रीस का हॉट स्पॉट रिफ्यूजी कैंप

शरणार्थी या आप्रवासी

जब विदेशी लेसबोस पहुंचते हैं तो उन्हें राष्ट्रीयता के आधार पर अलग किया जाता है. सीरिया के लोगों को कारा टेपे कैंप में भेजा जाता है जहां ज्यादातर लोग घरों में रहते हैं. दूसरे लोगों को मोरिया भेजा जाता है जो पहले बंदियों को रखने का सेंटर था लेकिन अब उसे हॉट स्पॉट रजिस्ट्रेशन सेंटर में बदल दिया गया है. यहां आर्थिक कारणों से आने वाले आप्रवासियों को रखा जाता है.

ग्रीस का हॉट स्पॉट रिफ्यूजी कैंप

भीड़ ज्यादा संसाधन कम

भीड़ की वजह से अक्सर विवाद पैदा होते हैं, जैसे यहां खाने की लाइन में. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार कैंप की क्षमता 410 लोगों को रखने की है. लेकिन लेसबोस में वोलंटीयरों के संयोजक फ्रेड मोर्लेट का कहना है कि कैंप में आम तौर पर 4000 तक लोग रहते हैं. "शुरू से ही यहां आपूर्ति की कमी है और चूंकि कुछ भी नहीं बदला है, यह दुनिया का सबसे खराब रिफ्यूजी कैंप बन गया है."

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खाद्य पदार्थों की कमी

रमोना ब्रोंजर्स लिव फॉर लाइव्स फाउंडेशन की संस्थापक हैं. वे इंटरनेट में इमरजेंसी ऑनलाइन अपील पढ़कर हॉलैंड स्थित अपनी संस्था को लेकर मोरिया पहुंची. "हम हर रोज 1500 लोगों के लिए खाना पकाते हैं, लेकिन सभी लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं होता." वे कहती हैं कि उनकी संस्था जितना हो सकता है, मदद कर रही है, "लेकिन समस्याएं अत्यंत गंभीर हैं और बड़ी संस्थाएं जिम्मेदारी नहीं ले रही हैं."

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कूड़े में आराम

रमोना ब्रोंजर्स का कहना है कि उनके 36 वोलंटीयरों के लिए कूड़ा हटाने और साफ सफाई का काम आसान नहीं. "बस आस पास देखिए, लोग कूड़े के बीच सो रहे हैं. इस जगह को साफ रखना असंभव है." वे कहती हैं कि उन्हें डर लगता है कि यहां कभी भी महामारी फैल सकती है. हाल के हफ्तों में कारा टेपे कैंप में खुजली की महामारी फैलने की खबर आई थी.

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सुस्ती का आलम

वोलंटीयर प्रमुख मोरलेट कैंप में अमानवीय परिस्थियों से नाखुश हैं. उनका कहना है, "इसकी वजह यह है कि कैंप की व्यवस्था पुलिस के हाथ में है. उनमें प्रेरणा का अभाव दिखता है." मोरलेट बताते हैं कि कभी कभी पुलिस वाले आते ही नहीं जिसका मतलब यह होता है कि लोगों का रजिुस्ट्रेशन नहीं हो पाता जबकि नए लोग लगातार आते जाते हैं. "बस दो घंटे की देर हो जाए तो मानवीय प्रलय मच जाता है."

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नंगे पांव पाकिस्तान से तुर्की

अपने बुलाए जाने का इंतजार कर रहे पाकिस्तान के फियाज उद्दाह (गुलाबी कपड़े में) कहते हैं, "मैं नंगे पांव पाकिस्तान से तुर्की आया हूं." उनके साथी इसरार अहमद (एकदम दाएं) का कहना है, "हम इसी तरह सोते हैं, कार्डबोर्ड पर, बिना कंबल के." इसरार के मुताबिक वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि उनके बच्चों को इस तरह नहीं सोना पड़े.

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महिलाओं की मुश्किल

एक्शन ऐड संस्था की प्रोग्राम कोर्डिनेटर कोंसतांटीना स्त्रीकू का कहना है कि वे कैंप में जाड़ों से पहले महिलाओं के शेड का विस्तार करना चाहती हैं. लेकिन पुलिस ने हस्तक्षेप कर इसे रोक दिया है. वे कहती हैं, "हमारे पास कंटेनर था, जो कैंप के गेट तक पहुंच गया था, लेकिन पुलिस ने उसे अंदर नहीं लाने दिया. मुझे पता नहीं कि ऐसा क्यों किया गया." मां बेबी वाला इलाका बुरी तरह भरा रहता है.

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कौन करेगा फैसला

अफगानिस्तान के गजनी प्रांत के 20 वर्षीय अर्शिद रहीमी का कहना है कि तालिबान हमले में पिता और बहन के मारे जाने के बाद उसकी मां ने जोर देकर उसे भाग कर यूरोप जाने के लिए कहा. "मेरी जान को तालिबान से खतरा था, लेकिन यहां लोग कह रहे हैं कि मैं आर्थिक कारणों से यूरोप आया हूं. कौन फैसला करेगा कि मैं शरणार्थी हूं या नहीं?"

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गुआंतानामो जैसा

कुछ परिवारों को मोरिया के अस्थायी शेड में रहने की इजाजात है. लेकिन मोरलेट डिटेंशन सेंटर के शेड की तुलना जेल से करते हैं. "घेरे और बाड़ों के कारण यह कैंप गुआंतानामो जैसा लगता है." उनका कहना है कि यहां की परिस्थितियों के बावजूद शरणार्थियों की संख्या कम नहीं होगी. "लोग कहते हैं कि सर्दियां उन्हें रोक देंगी, लेकिन समुद्र सर्दियों में शांत होता है."

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ऊपरवाले का सहारा

इरान से भागकर ग्रीस पहुंचा अफगान पेजमान उसेफी कहता है, "जब मैं यहां आने के लिए नाव पर था, समुद्र के बीच में, तो मुझे महसूस हुआ कि सिर्फ अल्लाह का सहारा है." उसका कहना है कि समुद्र में नाव की ही तरह यदि अल्लाह जान बचाने का फैसला करता है तो तुम बच जाओगे. "कैंप में मैं अपनी हालत ऐसी ही देखता हूं."

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