क्यों बंद हो रही हैं जर्मनी में बेकरी

क्यों बंद हो रही हैं जर्मनी में बेकरी

दस साल में एक तिहाई बंद

जर्मनी में बेकरियां खत्म हो रही है. सदियों से ये पारिवारिक कारोबार का प्रतीक रही हैं. लेकिन अब ये धीरे धीरे मर रही हैं. पिछले दस सालों में करीब एक तिहाई बेकरियां और कसाईखाने बंद हो गए हैं.

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पांच हजार से ज्यादा दुकानें बंद

जर्मनी में 2008 में 15, 337 बेकरियां रजिस्टर्ड थीं. 2018 के अंत में सिर्फ 10,926 बच गईं. इसी तरह 18,320 मीट की दुकानें थीं, जो पिछले साल के अंत में सिर्फ 12,897 रह गईं. और दुकानों के बंद होने का ट्रेंड जारी है.

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जीवन का केंद्र

शहर हो या देहात, बेकरी और मीट की दुकान, दोनों ही सामाजिक जीवन के केंद्र में होती थीं. यहां से लोग सुबह के नाश्ते के लिए ब्रेड खरीदते थे, शाम के नाश्ते के लिए केक और रात के खाने के लिए रोटियां. और खाने में मीट वाला हिस्सा मीट की दुकान से आता था.

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बंद होने की वजहें

इन दुकानों के बंद होने की एक नहीं, कई वजहें हैं. सबसे प्रमुख वजह बड़े सुपर बाजारों से मिली प्रतिस्पर्धा है. बेकरी की दुकानें छोटे कारोबार वाली दुकानें थीं. सुपर बाजारों में बड़े पैमाने पर बेकरी के उत्पाद मिलने लगे जो काफी किफायती होते थे.

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क्वालिटी पर समझौता नहीं

ये प्रतिस्पर्धा एकमात्र कारण नहीं. सुपर बाजार कितना ही सस्ता ब्रेड बेच सकते हों, उसमें वो स्वाद नहीं जो पड़ोस के बेकर मास्टर के बनाए ब्रेड का होता था. लेकिन परिवार में दुकान को आगे बढ़ाने वाले कोई न हो तो क्या करें.

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रोजगार की संभावनाएं

जर्मनी की ज्यादातर बेकरियां 200 से 300 सालों से पारिवारिक मिल्कियत में चल रही है. पहले लोग पेशे से प्यार के कारण या और कोई संभावना ना होने के कारण इसी पेशे में रहते थे. लेकिन अब रोजगार की दूसरी ज्यादा धन देने वाले मौके हैं.

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आबादी का असर

इन दुकानों के बंद होने का एक कारण उत्तराधिकारियों का अभाव भी है. पिछले सालों में बहुत से विदेशियों को इस पेशे में आकर्षित करने की कोशिश हुई है. कामगारों की कमी पिछले सालों में आए आप्रवासियों से भी पूरी की जा रही है.

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कामगारों की कमी

इस बीच प्रतिस्पर्धा सिर्फ कारोबार में ही नहीं है बल्कि कर्मचारियों की भर्ती में भी है. सभी उद्यम और कारोबार नए कर्मचारियों या व्यवसायिक प्रशिक्षण पाने वालों की तलाश में हैं. जर्मन व्यवसायिक प्रशिक्षण संस्थान के अनुसार पिछले साल ट्रेनिंग की 906 सीटें खाली रहीं.

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मीट की दुकानें

यही हाल मीट वाले उद्यमों का भी रहा. जर्मनी में मीट के दुकानों की भी परंपरा रही है. छोटे इलाकों में मीट की दुकानें स्थानीय समृद्धि के साथ जुड़ी रही हैं. जैसे जैसे पैसा आता गया लोगों का खानपान भी बेहतर होता गया..

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मीट उद्योग भी परेशान

लेकिन मीट उद्योग में भी युवा कर्मियों की समस्या रही. वहां भी 894 सीटों पर नए प्रशिक्षुओं की भर्ती नहीं हो पाई. कामगार नहीं मिलने के अलावा बहुत से लोग पैकेजिंग संबंधी नए कानूनों जैसी नौकरशाही बाधाओं के कारण भी दुकान बंद कर रहे हैं.

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बड़े हो रहे हैं उद्यम

छोटी दुकानें बंद हो रही हैं और उनकी जगह दुकानों का आकार बड़ा हो रहा है. मांस उद्योग के अधिकारी हैर्बर्ट डोरमन बताते हैं कि 1970 में हर उद्यम में 6 कर्मचारी होते थे जबकि 2018 में हर उद्यम में 11.7 कर्मचारी काम करते थे.

जर्मनी के शहरों में बेकरियां और मीट शॉप बंद हो रही हैं. अधिकारी परेशान हैं. ये जर्मनी की शहर संस्कृति का हिस्सा हैं. पान और चाय की दुकानों की तरह यहां लोग मिलते हैं, इन दुकानों के बंद होने से सामाजिक जीवन खत्म हो जाएगा.

मीडिया सेंटर से और सामग्री

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