गरीबी नहीं, 'गरीबों को ही खत्म' कर रहे हैं इमरान खान

पाकिस्तान में यासिर सुल्तान जैसे बहुत से लोगों ने बड़ी उम्मीद से पिछले साल इमरान खान की पार्टी को वोट दिया था. लेकिन चंद महीनों के भीतर उनकी सारी उम्मीदें बिखर गई हैं.

यासिर सुल्तान टैक्सी चलाते हैं और पेट्रोल के बढ़ते दामों की वजह से उनकी आमदनी आधी से भी कम हो गई है. उन्हें इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई से बहुत उम्मीदें थीं कि वे सत्ता में आने पर गरीबों की मदद करेंगे. लेकिन पिछले पांच महीने में पाकिस्तान में मंहगाई ने रिकॉर्ड बनाए हैं, जिससे इमरान खान के बहुत समर्थकों को भी झटका लगा है. इमरान खान ने चुनाव से पहले गरीबी हटाने, नौकरियां बढ़ाने और पाकिस्तान को कल्याणकारी इस्लामी देश बनाने का वादा किया था.

30 साल के सुल्तान कहते हैं, "इमरान खान ने गरीबी हटाने की बड़ी बड़ी बातें कीं, लेकिन वह गरीबी को खत्म नहीं कर रहे हैं, बल्कि गरीबों को ही खत्म कर रहे हैं. कभी कभी तो मन करता है कि अपनी टैक्सी में आग लगा दूं."

लगातार बढ़ रहे घाटे और आर्थिक तंगियों से जूझ रही पाकिस्तान की सरकार के सामने भी ज्यादा विकल्प नहीं हैं. वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 13वां राहत पैकेज लेने में जुटी है. पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में 8.5 अरब डॉलर हैं. साल की शुरुआत से तुलना करें तो विदेशी मुद्रा भंडार को बेहतर स्थिति में कहा जाएगा. लेकिन इससे सिर्फ दो महीनों का ही आयात हो पाएगा.

इमरान खान को कितना जानते हैं आप?

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पूरा नाम?

क्या आप इमरान खान का पूरा नाम जानते हैं? उनका पूरा नाम है अहमद खान नियाजी इमरान, लेकिन बतौर क्रिकेटर और राजनेता वह दुनिया के लिए हमेशा इमरान खान रहे हैं.

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करियर की शुरुआत

इमरान खान के क्रिकेट करियर की शुरुआत 16 साल की उम्र में हुई, जब उन्होंने 1968 में लाहौर की तरफ से सरगोधा के खिलाफ पहला फर्स्ट क्लास क्रिकेट मैच खेला.

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पढ़ाई से पहले क्रिकेट

1970 में वह पाकिस्तान की राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बन गए. यानी उनकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी और उनके अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर का आगाज हो चुका था.

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इंग्लिश क्रिकेट में धाक

बाद में वह पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए. वहां भी उनके खेल के चर्चे होने लगे. वह 1974 में ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी इलेवन के कप्तान बने. उन्होंने काउंटी क्रिकेट भी खेला.

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पाकिस्तान की कप्तानी

इमरान खान 1982 में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान बने. बतौर कप्तान उन्होंने 48 टेस्ट मैच खेले जिनमें से पाकिस्तान ने 14 जीते, आठ हारे और बाकी ड्रॉ रहे.

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वनडे करियर

इमरान ने 139 एकदिवसीय मैचों में पाकिस्तानी टीम का नेतृत्व किया. इनमें से 77 जीते, 57 हारे और एक मैच का कोई नतीजा नहीं निकला.

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वर्ल्ड चैंपियन

पाकिस्तान ने अब तक सिर्फ एक बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता है और 1992 में यह कारनामा इमरान खान की कप्तानी में हुआ था.

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सबसे सफल कप्तान

इमरान पाकिस्तान के लिए सबसे सफल कप्तान साबित हुए, जिनकी तुलना अकसर भारत के पूर्व कप्तान कपिल देव से हुई है. दोनों ऑलराउंडरों के रिकॉर्ड भी प्रभावशाली रहे हैं.

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सियासत में कदम

इमरान खान ने 1996 में पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी बना कर सियासत में कदम रखा. पिछले चुनाव में उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर रही और इस बार पहले पर.

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निजी जीवन

इमरान खान अपनी निजी जिंदगी को लेकर भी सुर्खियों में रहते हैं. 65 साल की उम्र में उन्होंने तीसरी शादी की. इससे पहले सेलेब्रिटी जमैमा और टीवी एंकर रेहाम खान उनकी पत्नी रह चुकी हैं.

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गंभीर आरोप

रेहाम खान ने अपनी किताब में इमरान पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि किसी महिला को इमरान की पार्टी में तभी बड़ा पद मिलता है जब वह इमरान के साथ हमबिस्तर हो.

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पाकिस्तान के ट्रंप

कई लोग इमरान खान पर पॉपुलिस्ट होने का आरोप लगाते हैं. चरमपंथियों के प्रति उनकी नरम सोच पर कई लोग सवाल उठाते हैं. कई कट्टरपंथियों से उनके करीबी रिश्ते रहे हैं.

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अमेरिका के आलोचक

इमरान खान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी जंग और उसमें पाकिस्तान की भागीदारी पर सवाल उठाते हैं. वे इसे पाकिस्तान की कई मुसीबतों की जड़ मानते हैं.

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भ्रष्टाचार के खिलाफ

इमरान खान हमेशा से पाकिस्तान में भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाते रहे हैं. पूर्व पीएम नवाज शरीफ खास तौर से उनके निशाने पर रहे हैं जो फिलहाल जेल में हैं.

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लोकप्रियता

इमरान खान युवाओं में बेहद लोकप्रिय बताए जाते हैं. नया पाकिस्तान बनाने का उनका नारा युवाओं की जुबान पर है. 2012 में वह एशिया पर्सन ऑफ द ईयर चुने गए.

कलेक्टिव फॉर सोशल साइंस रिसर्च के अर्थशास्त्री असद सईद का कहना है, "मांग को कम करना अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने का हिस्सा है ताकि चालू खाते और व्यापारिक घाटे को कम किया जा सके." मार्च में पाकिस्तान में मुद्रास्फीति की दर 9.4 प्रतिशत से ज्यादा थी. नवंबर 2013 के बाद से ये रिकॉर्ड मुद्रास्फीति है. खाने पीने की चीजों और पेट्रोल के दाम तेजी से बढ़े हैं जो ज्यादातर उपभोक्ताओं को प्रभावित कर रहे हैं.

जून में खत्म होने वाले वित्तीय साल के लिए पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने 3.5 फीसदी से 4 फीसदी के विकास दर की भविष्यवाणी की है, जबकि सरकार ने 6.2 फीसदी का लक्ष्य रखा था. सईद का कहना है कि देश में अतिरिक्त कामगारों की बड़ी फौज वेतन और मजदूरी पर रोक लगाकर रखेगी, लेकिन लोगों के रहन सहन के स्तर में कमी आएगी.

लाहौर में रहने वाली सारा सलमान कहती हैं, "मैंने पीटीआई को वोट दिया, बदलाव के उनके नारे को देखते हुए. लेकिन अब मुझे इस बात का अफसोस है." डॉलर के मुकाबले पाकिस्तान रुपये की कीमत लगातार कम हो रही है. सरकार पर सब्सिडी को कम करने का दबाव बढ़ रहा है जिससे बिजली के पहले से बढ़े दामों में और इजाफा हो सकता है. इससे आम आदमी पर और बोझ बढ़ेगा. प्रति लीटर 6 रुपये की वृद्धि के साथ अब पाकिस्तान में पेट्रोल 98.88 रुपये लीटर मिल रहा है.

पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह आखिरी बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से सहायता पैकेज ले रही है. पाकिस्तान ने अपने मित्र देशों से भी सहायता मांगी है जिसमें चीन सबसे प्रमुख है जो पहले ही पाकिस्तान में 60 अरब डॉलर की लागत से चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर बना रहा है.

इमरान खान के कई समर्थक आज मायूस हैं

इसके अलावा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी पाकिस्तान को 11 अरब डॉलर कर्ज और मदद के तौर पर देने को राजी हो गए हैं. सरकार का कहना है कि वह घरेलू उत्पादन के जरिए आयात को कम करने के लिए काम कर रही है. साथ ही टैक्स के दायरे के बढ़ाने की भी कोशिश हो रही है. लेकिन दोनों ही मोर्चों पर उसे जूझना पड़ रहा है.

पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी का कहना है, "तेल के दाम बढ़ना और मुद्रा की कीमत कम होना, ये ऐसी चीजें हैं जो होनी ही थीं. इंशा अल्लाह आगे आने वाला समय बेहतर होगा."

पर्यवेक्षकों का कहना है कि पाकिस्तान को एक कल्याणकारी इस्लामिक राज्य बनाने का वादा अब पीछे छूट गया है. पाकिस्तान के अखबार डॉन में बिजनेस एडिटर खुर्रम हुसैन कहते हैं, "उन्हें मुश्किल आर्थिक समायोजन करने होंगे." उनका मतलब है टैक्स और ब्याज दरें बढ़ाना, आयात और सरकारी खर्च को घटाना और रुपये का अवमूल्यन. वह कहते हैं, "ऐसे माहौल में उन कल्याणकारी वादों को पूरा करना बहुत मुश्किल होगा जिनका वादा किया गया था."

आर्थिक जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान के सामने खर्चों को कम करने और रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं है. लेकिन आम लोगों का संयम जवाब दे रहा है. लाहौर के एक स्कूल में पढ़ाने वाले मोहम्मद वकास कहते हैं, "मौजूदा वित्तीय नीतियां और बढ़ती महंगाई लोगों का अपमान है. अगर पीटीआई की सरकार इन समस्याओं को हल नहीं कर सकती है तो उसे सत्ता छोड़ देनी चाहिए."

एके/एमजे (रॉयटर्स)

Flash-Galerie Indien Mahatma Gandhi (AP)

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1947

अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भारत का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया. पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना देश के गवर्नर जनरल बने जबकि लियाकत अली खान को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया. लेकिन इसके एक साल बाद ही जिन्नाह का निधन हो गया जो टीबी की बीमारी से पीड़ित थे.

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1951

प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की रावलपिंडी में हत्या कर दी गई. कंपनी बाग में वह एक सभा में मौजूद थे कि उन पर दो गोलियां दागी गईं. पुलिस ने मौके पर ही हमलावर को ढेर कर दिया. लियाकत अली को झटपट अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका. उनके बाद बंगाली मूल के ख्वाजा नजीमुद्दीन पाकिस्तान के दूसरे प्रधानमंत्री बने.

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1958

पाकिस्तान को 1956 में पहला संविधान मिला. लेकिन सियासी खींचतान के बीच 1958 में पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति इसकंदर मिर्जा ने संविधान को निलंबित कर मार्शल लॉ लगा दिया. फिर कुछ दिनों बाद ही सेना प्रमुख जनरल अयूब खान ने मिर्जा को हटाया और खुद देश के राष्ट्रपति बन बैठे. पाकिस्तान में पहली बार सत्ता सेना के हाथ में आई.

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1965

पाकिस्तान में अमेरिका जैसी राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू करने वाले अयूब खान ने 1965 में चुनाव कराने का फैसला किया. वह खुद पाकिस्तान मुस्लिम लीग के उम्मीदवार बने जबकि उनके सामने विपक्ष ने जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना को उतारा. फातिमा जिन्ना को भरपूर वोट मिले लेकिन अयूब खान इलेक्ट्रोल कॉलेज के जरिए चुनाव जीत गए.

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1969

फातिमा जिन्ना के खिलाफ विवादास्पद जीत और भारत के साथ 1965 में हुई जंग के नतीजों से अयूब खान की छवि को बहुत नुकसान हुआ. जबरदस्त विरोध प्रदर्शनों के बीच उन्होंने राष्ट्रपति पद छोड़ दिया और सत्ता अपने आर्मी चीफ जनरल याहया खान को सौंप दी. देश में फिर मार्शल लॉ लगा और सभी असेंबलियां भंग कर दी गईं.

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1970

पाकिस्तान में आम चुनाव कराए गए. पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के नेता शेख मुजीबउर रहमान की पार्टी आवामी लीग को जीत मिली. नेशनल असेंबली की कुल 300 सीटों में से आवामी लीग को 160 सीटें मिली. 81 सीटों के साथ जुल्फिकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी दूसरे नंबर पर रही. लेकिन आवामी लीग की जीत को स्वीकार नहीं किया गया.

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1971

चुनाव नतीजों को लेकर छिड़े विवाद ने एक युद्ध की जमीन तैयार की. इसमें भारत ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की मदद की और 1971 में बांग्लादेश के नाम से भारतीय उपमहाद्वीप में एक नए देश का उदय हुआ. बुनियादी तौर पर भारत का विभाजन धर्म के नाम पर हुआ. लेकिन एक धर्म होने के बावजूद पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान एक साथ नहीं रह पाए.

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1972

पाकिस्तान की टूट के लिए याहया खान के शासन को जिम्मेदार माना गया, जिसके कारण उनका सत्ता में रहना मुश्किल होने लगा. ऐसे में, उन्होंने देश की सत्ता जुल्फिकार अली भुट्टो को सौंप दी. देश में लगे मार्शल लॉ को हटाया गया और जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने. 1972 में ही भुट्टो ने पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम शुरू किया.

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1973

पाकिस्तान में फिर एक नया संविधान लागू हुआ जिसके तहत पाकिस्तान को एक संसदीय लोकतंत्र बनाया गया, जिसमें प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख हो. इस तरह भुट्टो राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री पद पर आ गए. भुट्टो ने 1976 में जनरल जिया उल हक को अपना चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया, जो आगे चल कर उनके लिए मुसीबत बन गए.

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1977

पाकिस्तान में आम चुनाव हुए. भुट्टो की पार्टी को जबरदस्त जीत मिली. लेकिन विपक्ष ने चुनावों में धांधली के आरोप लगाए और देश में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया. मौके का फायदा उठाते हुए जिया उल हक ने भुट्टो का तख्तापलट किया और संविधान को निलंबित कर देश में फिर से मार्शल लॉ लगा दिया.

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1978

जिया उल हक ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली. उन्होंने सेना प्रमुख का पद भी अपने ही पास रखा. भुट्टो को जिया की "हत्या के साजिश" के आरोप में दोषी करार देकर फांसी पर चढ़ा दिया गया. इसी साल जिया उल हक देश के इस्लामीकरण की अपनी नीति के तहत विवादित हूदूद ऑर्डिनेंस लाए, जिसमें कुरान के मुताबिक सजाएं देने का प्रावधान किया गया.

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1985

पाकिस्तान में आम चुनाव हुए, लेकिन पार्टी के आधार पर नहीं. मार्शल लॉ हटाया गया और नई नेशनल असेंबली ने बीते आठ साल के जिया के कामों पर मुहर लगाई और उन्हें राष्ट्रपति चुना गया. मोहम्मद खान जुनेजो प्रधानमंत्री बनाए गए. इससे पहले 1984 में जिया उल हक ने अपनी इस्लामीकरण की नीति पर एक जनमत संग्रह भी कराया जिसमें 95 समर्थन का दावा किया गया.

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1988

बढ़ते मतभेदों के बीच जिया उल हक ने संसद को भंग कर दिया और जुनेजो की सरकार को भी बर्खास्त कर दिया. 90 दिनों के भीतर उन्होंने देश में नए आम चुनाव कराने का वादा किया. लेकिन 17 अगस्त 1988 को वह अपने 31 अन्य साथियों के साथ एक विमान हादसे में मारे गए. 1978 से लेकर 1988 तक जिया उल हक ने पाकिस्तान पर एक छत्र राज किया.

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1988

देश में आम चुनाव हुए और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को भारी बहुमत मिला. जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. चुनाव में बेनजीर की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को 38 प्रतिशत वोट मिले. वहीं नवाज शरीफ के नेतृत्व में इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद पार्टी 30 फीसदी वोटों के साथ दूसरे स्थान पर आई.

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1990

भ्रष्टाचार के आरोपों में बेनजीर को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी. राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने संसद को भंग कर भुट्टो सरकार को बर्खास्त कर दिया. चुनाव हुए और जिया के दौर में सियासत का ककहरा सीखने वाले नवाज शरीफ देश के प्रधानमंत्री चुने गए. इसके साल भर बाद पाकिस्तान की संसद ने शरिया बिल को मंजूर किया और इस्लामिक कानून पाकिस्तान की न्याय प्रणाली का हिस्सा बने.

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1993

राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने नवाज शरीफ सरकार को भी भ्रष्टाचार और नकारेपन के आरोपों में चलता कर दिया. इसी साल खुद उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया. देश में फिर चुनाव हुए जिनमें जीत दर्ज कर बेनजीर भुट्टो दूसरी बार पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं. पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के एक सदस्य फारूक लेघारी को देश का राष्ट्रपति चुना गया.

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1996

राष्ट्रपति लेघारी ने नेशनल असेंबली को भंग कर बेनजीर सरकार को बर्खास्त कर दिया जो भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी थी. इस तरह, दस साल के भीतर देश चौथी बार आम चुनाव की दहलीज पर खड़ा था. 1997 के चुनाव में नवाज शरीफ की पीएमएल (एन) को जबरदस्त जीत मिली और वह दूसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने.

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1998

पाकिस्तान ने बलूचिस्तान प्रांत के चघाई की पहाड़ियों में परमाणु परीक्षण किया. इससे चंद दिन पहले भारत ने पोखरण 2 परमाणु परीक्षण किया था. परमाणु परीक्षण के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. लेकिन इससे भारतीय उपमहाद्वीप में परमाणु हथियारों की होड़ को रोका नहीं जा सका.

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1999

कारगिल युद्ध के बाद नवाज शरीफ सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ की जगह ख्वाजा जियाउद्दीन अब्बासी को सेना प्रमुख बनाना चाहते थे. लेकिन जैसे ही इसका पता मुशर्रफ को लगा तो उन्होंने नवाज शरीफ का ही तख्तापलट कर दिया और उन्हें नजरबंद कर लिया. इस तरह पाकिस्तान की बागडोर चौथी बार एक सैन्य शासक के हाथ में आई.

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2000

सुप्रीम कोर्ट ने मुशर्रफ के तख्तापलट को उचित ठहराया और तीन साल के लिए उन्हें सारे अधिकार दे दिए. इसी साल नवाज शरीफ और उनका परिवार निर्वासन में सऊदी अरब चले गए. 2001 में मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए और सेना प्रमुख का पद भी उन्होंने अपने पास ही रखा.

South Asian Association for Regional Cooperation summit (AP)

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2002

पाकिस्तान में फिर से आम चुनाव हुए और ज्यादातर सीटें पीएमएल (क्यू) ने जीती. इस पार्टी को मुशर्रफ ने ही बनाया था जिसमें उनके वफादारों को अहम पद मिले. जफरउल्लाह खान जमाली (फोटो में सबसे दाएं) पाकिस्तान के प्रधानमंत्री चुने गए. लेकिन वह दो साल ही पद पर रह पाए. 2004 में उनकी जगह शौकत अजीज को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया गया.

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2007

राष्ट्रपति मुशर्रफ ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी को बर्खास्त कर दिया जिसके बाद देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए. आखिरकार चौधरी को बहाल किया गया लेकिन मुशर्रफ ने देश में इमरजेंसी लगा दी. इस बीच पाकिस्तानी संसद ने पहली बार अपना पांच साल का निर्धारित कार्यकाल पूरा कर लिया.

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2007

आम चुनावों में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की नेता बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान लौटीं. उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे वापस लिए गए. लेकिन रावलपिंडी में एक चुनावी रैली के दौरान उनकी हत्या कर दी गई. उनकी हत्या उसी कंपनी बाग में हुई जहां पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को कत्ल किया गया था.

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2008

बेनजीर की मौत के बाद चुनावों में पीपीपी को सहानुभूति लहर का फायदा हुआ और नेशनल असेंबली की ज्यादातर सीटें उसके खाते में आईं. यूसुफ रजा गिलानी देश के प्रधानमंत्री बने जबकि बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी ने राष्ट्रपति का पद संभाला. आरोपों और विवादों के बीच पीपीपी की सरकार ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया.

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2013

पाकिस्तान में आम चुनाव हुए और पीएमएल (एन) सत्ता में आई. नवाज शरीफ तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. क्रिकेट से राजनेता बने इमरान की पार्टी 2013 के चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी ताकत बन कर उभरी. 17 प्रतिशत वोटों के साथ उसने राष्ट्रीय संसद की 35 सीटें जीतीं और खैबर पख्तून ख्वाह प्रांत में उसकी सरकार बनी.

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2017

भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें किसी सार्वजनिक पद पर रहने और चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दे दिया. उन्होंने प्रधानमंत्री पद अपने विश्वासपात्र शाहिद खाकान अब्बासी को सौंपा. नवाज शरीफ अपने खिलाफ मुदकमों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं. पाकिस्तानी सेना से टकराव के कारण भी वह चर्चा में आए.

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2018

पाकिस्तान में फिर चुनाव होने जा रहे हैं. सेना पर आरोप लग रहे हैं कि वह किसी भी तरह से नवाज शरीफ और उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर रखना चाहती है. चुनाव मैदान में इमरान खान भी ताल ठोंक रहे हैं जबकि पीपीपी की उम्मीदें बेनजीर के बेटे बिलावुल भुट्टों पर टिकी हैं. पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव होने हैं. पीएमएल (एन) का नेतृत्व नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ कर रहे हैं.

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