गलत मोड़ लिया मिस्र ने

होस्नी मुबारक को सत्ता से हटाने के बाद मिस्र एक नए युग की राह पर दिखा. लेकिन अब उत्तरी अफ्रीका का यह देश पहले से कहीं अधिक विभाजित है और लोकतंत्र दूर का सपना बन गया है.

काहिरा से आने वाली खबरों में इन दिनों राजनीतिक जंग, धार्मिक दंगे और नीचे जाती अर्थव्यवस्था प्रमुख होती हैं, ऐसा लगता है कि बदलाव की राह के सामने दीवार आ गई है. मुबारक को हटाने के बाद जोश से उफनता नील नदी का शहर अब हिंसा और अफरातफरी की खबरों से सहमा है.

मिस्र की सत्ता से मुबारक की विदाई पर मिस्रवासियों को लगा था कि वो एक नए युग की दहलीज पर हैं जहां से ज्यादा आजादी, अधिकार और सबके लिए पर्याप्त रोटी का रास्ता खुलेगा. अब जब ऐसा हुआ नहीं तो लोग क्रांति को कोस रहे हैं और एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि क्या गलत हुआ?

धर्म से ध्रुवीकरण

मिस्र में लोकतंत्र की राह में मुश्किलों और नाकामियों के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड और सेना पर आरोप लग रहे हैं. काहिरा के अल अहराम सेंटर के राजनीतिक विश्लेषक एमाद गाद का का मानना है कि इन दोनों ने शुरुआत से ही गलतियां की. उनका कहना है कि देश में ट्यूनीशिया की तरह संविधान सभा बनाने की बजाए सेना और इस्लामी ताकतों ने संसदीय चुनावों के लिए दबाव बनाया. मिस्रवासी भी उनके कहने में आ गए और मार्च 2011 में हुए जनमत संग्रह में चुनाव के लिए हां कह दी. मिस्र ने लोकतंत्र के कदमों को जाने बगैर ही उसके साथ नाचना शुरू कर दिया. उस पर और बुरा यह हुआ कि जल्दबाजी में हुए चुनावों ने समाज को इस्लामी और धर्मनिरपेक्ष धड़े में बांट दिया. तब से यही बंटवारा और ध्रुवीकरण मिस्र की राजनीति पर हावी है.

राजनीति में धर्म का दबदबा

मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक शाखा द फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी को 2011 के आखिर में हुए चुनावों में 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले. चुनाव के छह महीने बाद इस पार्टी के मुहम्मद मुर्सी को देश का पहला नागरिक राष्ट्रपति चुना गया और उन्होंने शुरुआत से ही धर्म को एजेंडे में सबसे ऊपर रखा. गाद कहते हैं, ''मिस्र में वोट पाने का सबसे आसान तरीका है धर्म, 40 फीसदी से ज्यादा लोग अनपढ़ हैं और इसका मतलब है कि उन्हें आसानी से प्रभाव में लिया जा सकता है.''

लोकतंत्र को समझने में नाकाम

जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स में मिस्री मामलों के जानकार श्टेफान रॉल मुस्लिम ब्रदरहुड की ध्रुवीकरण वाली नीतियों के साथ विपक्ष के भी कड़े आलोचक हैं. उनका कहना है, ''धर्म निरपेक्ष ताकतें बराबरी के आधार पर सत्ता चाहती हैं लेकिन ऐसा करने में वो चुनाव के नतीजों को बेकार कर रही हैं.'' उनका यह भी मानना है कि चुनाव में जीत को इस्लामी ताकतों ने शासन का निरंकुश अधिकार मान लिया है. रॉल के मुताबिक, ''दोनों पक्ष साफ तौर पर लोकतंत्र का सही मतलब समझने में नाकाम रहे हैं.''

संसदीय चुनावों में इस्लामियों की भारी जीत के बाद से मिस्र में राजनीतिक बहस पूरी तरह से संविधान, मीडिया और समाज में धर्म की भूमिका पर केंद्रित हो गई है. क्रांतिकारियों की सामाजिक न्याय की मांग धुंधली पड़ गई है और राजनेता मिस्र के आर्थिक मुद्दों की भी अनदेखी कर रहे हैं. रॉल का कहना है कि जब तक राजनेता बुनियादी मसलों से स्वतंत्र रूप से निपटना नहीं सीख लेते देश आगे नहीं जा सकता.

मुर्सी और शफीक

पुराने तौर तरीकों का विरोध

मिस्र का विपक्ष आर्थिक ठहराव और राजनीतिक यथास्थिति के लिए इस्लामियों को दोषी मान रहा है तो इस्लामी मौजूदा स्थिति को पिछले शासन की खुमारी बता रहे हैं. इस्लामियों का कहना है कि मुबारक की पुरानी सत्ता के समर्थक विकास के रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं. हालांकि यह किस हद तक सच है इस पर भारी विवाद है. एमाद गाद का कहना है कि मुबारक की विरासत भ्रष्टाचार, जुल्म और भाईभतीजावाद के रूप में जिंदा है लेकिन साथ ही मुबारक समर्थकों को मिस्र की समस्याओं की वजह मानना, ''मुस्लिम ब्रदरहुड की बहानेबाजी है जो सुधार नहीं करना चाहता.''

श्टेफान रॉल मानते हैं कि पुराना तंत्र जिस हद तक नए तंत्र पर असर डाल रहा है उसे कम कर के आंका गया है. मुबारक की सत्ता केवल दो या तीन परिवारों से मिल कर नहीं बनी थी बल्कि उसने आर्थिक उच्च वर्ग, न्याय तंत्र और सुरक्षा के तंत्र में भी गहरी पैठ बना रखी थी. मुबारक के पूर्व प्रधानमंत्री अहमद शफीक ने पिछले साल राष्ट्रपति चुनावों में 48 फीसदी वोट हासिल किए और इस सच्चाई से इस सिद्धांत को मजबूती मिलती है. तो क्या ऐसे में इस्लामियों के प्रभुत्व वाली संसद को भंग कर दिया जाना चाहिए जिसका आदेश मिस्र के शीर्ष जजों ने दिया है?

सेना की भूमिका

मध्यस्थ की तलाश

हर तरफ अविश्वास के माहौल ने मिस्र में लोकतंत्र लागू होने की प्रक्रिया रोक दी है और लोग मानने लगे हैं कि जब तक कोई शख्स या कोई राष्ट्रीय संस्था मध्यस्थ के रूप में सामने आ कर दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर नहीं ले आता तब तक मामला आगे नहीं बढ़ेगा.

अब मिस्र में कोई नेल्सन मंडेला जैसा शख्स तो है नहीं, ऐसे में बहुत से लोग इस खाई को भरने के लिए सेना की तरफ देख रहे हैं. हालांकि एमाद गाद इस काम के लिए सेना को सही नहीं मानते. गाद याद दिलाते हैं, ''मुबारक के हटने के बाद के महीनों में जब सत्ता सीधे इनके हाथ में थी तब हालात बेहद बुरे थे. सेना के जनरल नए वक्त में सिर्फ अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित करने में दिलचस्पी ले रहे हैं.''

हाल ही में कार्यकर्ताओं के एक गुट ने कहा कि सत्ता में सेना की वापसी की मांग के लिए उन्होंने दस लाख लोगों के हस्ताक्षर जमा किए हैं. अगर सचमुच सेना ने राजनीतिक रूप से सत्ता में वापसी की तो मिस्र में लोकतंत्र के सूरज को डूबने के लिए शाम का इंतजार नहीं करना होगा.

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