गलाकाट होड़ के बीच टोयोटा और सुजुकी ने हाथ मिलाया

दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी टोयोटा सुजुकी के साथ पार्टनरशिप करेगी. कार बाजार में आने वाले तूफान से निपटने के लिए दोनों जापानी कंपनियों को हाथ मिलाना पड़ रहा है.

टोयोटा और सुजुकी ने बुधवार को साझा बयान जारी कर पार्टनरशिप का एलान किया. दोनों कंपनियां पर्यावरण के लिहाज से बेहतर नई तकनीक साथ मिलकर विकसित करेंगी. सेफ्टी और इनफॉर्मेशन नेटवर्किंग में भी एक दूसरे का हाथ बंटाएंगी. जापानी कंपनी टोयोटा दुनिया की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी है. वहीं सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन छोटी और किफायती कारें बनाने में माहिर है.

टोयोटा के अध्यक्ष अकियो टोयोडा के मुताबिक दोनों कंपनियों का भविष्य अब ऐसे ही सहयोगों पर टिका है, "अब ये बेहद जरूरी हो चला है कि ऐसे साझेदार हों जिनका लक्ष्य और जज्बा एक समान हो."

जापान का कार उद्योग मुश्किल में है. मित्सुबिशी मोटर्स की धोखाखड़ी पता चलने के बाद सुजुकी की कारों की गड़बड़ भी सामने आई है. अच्छे माइलेज के लिए मशहूर सुजुकी की कारें भी निर्धारित मात्रा से ज्यादा हानिकारक गैसें छोड़ रही हैं. जापान सरकार ने सुजुकी को आदेश दिया है कि वह अपनी कारों की समीक्षा करे और उन्हें नियमों को मुताबिक ढाले.

टोयोटा बीएमडब्ल्यू से पार्टनरशिप कर चुकी है

घर में मुश्किलें हैं ही ऊपर से बाहर से भी कड़ी चुनौती मिली रही है. यूरोप और अमेरिका के कार निर्माता इलेक्ट्रिक कारों पर बहुत ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक इलेक्ट्रिक कारें बहुत ही जल्द पेट्रोल और डीजल वाली कारों का सफाया कर देंगी. सुजुकी ने अब तक कोई भी हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक और फ्यूलसेल कार नहीं बनाई है. सुजुकी के चैयरमैन ओसामु सुजुकी के मुताबिक टोयोटा के साथ साझेदारी से उनकी कंपनी को फायदा मिलेगा, "'टोयोटा उद्योग में अग्रणी है और ऐसी भरोसेमंद कंपनी है जो कई तरह की एडवांस और फ्यूचर टेक्नोलॉजीज पर काम कर रही है."

टोयोटा गैस-इलेक्ट्रिक हाइब्रिड कारों के मामले में काफी आगे है. कंपनी के प्रियस मॉडल ने लॉन्च के बाद काफी सुर्खियां बटोरीं, लेकिन कुछ ही समय बाद टोयोटा को दुनिया भर से 3,40,000 प्रियस कारें वापस मंगानी पड़ी. गाड़ी के पार्किंग ब्रेक में डिफेक्ट मिला.

इस बीच खुद चलने वाली कारें कई देशों में सड़कों पर उतर चुकी हैं. अमेरिकी कंपनी टेस्ला के साथ ही गूगल और एप्पल जैसी प्रमुख कंपनियां भी सेल्फ ड्राइविंग कार में निवेश कर चुकी हैं. टोयोटा अब भी इससे हिचकिचा रही है.

पहले नंबर पर रहने के बावजूद टोयोटा को लगातार जर्मन कंपनी फोल्क्सवागेन से टक्कर मिलती रही है. फोल्क्सवागेन, मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू जैसी दिग्गज जर्मन कंपनियां भी अपनी रणनीति में बड़े बदलाव कर रही हैं. जर्मनी में 2030 से पेट्रोल और डीजल के कम्बशन इंजन पर रोक लगाने पर गंभीरता से विचार हो रहा है.

(देखिये 135 साल बाद कैसे वापसी कर रही हैं इलेक्ट्रिक कारें)

135 साल बाद इलेक्ट्रिक कारों की वापसी

पहली इलेक्ट्रिक गाड़ी

1881 में गुस्ताव ट्रोव अपनी तिपहिया इलेक्ट्रिक गाड़ी पर सवार हुए. उसे ट्रोव ट्रिसाइकिल कहा गया. पैरिस की सड़कों पर यह गाड़ी 12 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से चल सकती थी. एक बार चार्ज करने पर गुस्ताव की इलेक्ट्रिक साइकिल 12 से 26 किलोमीटर की यात्रा करती थी. गुस्ताव ने साइकिल के एक्सेल में सीमेंस की मोटर लगाई थी. बैटरी ड्राइवर के पीछे रखी.

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घोड़ों की जगह तार

आज बिजली से चलने वाली ट्रेनें और बसें इसी सिद्धात पर चलती हैं. 1882 में वैर्नर सीमेंस ने इलेक्ट्रोमोट नाम की गाड़ी पेश की. गाड़ी ऊपर से गुजरने वाली बिजली की तारों से करंट लेती थी और आगे बढ़ती थी. बर्लिन के कुरफुर्स्टेनडाम में आज भी सीमेंस का वही पुराना 540 मीटर लंबा टेस्ट ट्रैक दिखाई पड़ता है.

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इलेक्ट्रिक थी पहली कार

जर्मन आविष्कारक आंद्रेयास फ्लॉकेन (तस्वीर में अपनी पत्नी के साथ) ने शायद दुनिया की पहली इलेक्ट्रिक कार 1888 में बनाई. उनकी ऊंचे पहिये वाली कार इलेक्ट्रिक मोटर से चलती थी. एक चमड़े की बेल्ट से पीछे के पहियों को ताकत मिलती थी.

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ई-कार का स्पीड रिकॉर्ड

यह भी 117 साल पुराना रिकॉर्ड है. 1899 में बेल्जियम के इंजीनियर और रेसिंग ड्राइवर कामिल जेनात्जी ने अपनी ई-कार को 100 किमी प्रतिघंटा से भी ज्यादा रफ्तार से दौड़ाया. टॉरपीडो जैसे आकार वाली उनकी कार में 25 किलोवॉट की दो इलेक्ट्रिक मोटरें लगी थीं.

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छा गई इलेक्ट्रिक कारें

1899 में न्यूयॉर्क की 90 फीसदी टैक्सियां बिजली से चलती थीं. उसी साल लुडविग लोनर और फर्डिनांड पोर्शे ने इलेक्ट्रिक कार लोनर-पोर्शे बनाई. इसने ई-कारों का चेहरा बदल दिया. 1902 में पोर्शे ने दुनिया की पहली हाईब्रिड कार बनाई. 1912 आते आते इलेक्ट्रिक कारों का उत्पादन बढ़कर 33,842 मॉडल प्रतिवर्ष हो गया.

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पेट्रोल इंजन का आना

ई-कारें अपने उफान पर थीं. तभी 1911 में पेट्रोल इंजन के लिए इलेक्ट्रिक स्टार्ट तकनीक खोजी गई. तेल के दाम कम थे. पेट्रोल आसानी से उपलब्ध भी होने लगा था. 1920 आते आते इलेक्ट्रिक कारों का उत्पादन करीब करीब बंद हो गया. इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल इक्का दुक्का जगहों तक सिमट गया.

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तेल संकट से नया जीवन

1990 के दशक में खाड़ी युद्ध के दौरान तेल संकट पैदा होने से इलेक्ट्रिक कारों की मांग फिर उठने लगी. 1996 से 1999 के बीच, तीन साल के भीतर जनरल मोटर्स ने EV1 नाम की कार उतार दी.

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आविष्कारकों और पर्यावरण प्रेमियों के लिए

एक शताब्दी बाद अब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते इलेक्ट्रिक कारों की मांग फिर जोर पकड़ने लगी है. 2003 के बाद से लगातार कई कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहन बना रही है.

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टेस्ला ने बदली छवि

2006 में अमेरिकी कंपनी टेस्ला ने टेस्ला रोडस्टर पेश की. इस स्पोर्ट्स कार ने इलेक्ट्रिक कारों का चेहरा बदल दिया. कार 100 किमी की रफ्तार मात्र 3.7 सेकेंड में पकड़ सकती थी. 201 किमी प्रतिघंटा की अधिकतम रफ्तार वाली यह कार एक बार में 350 किलोमीटर दूर जा सकती है.

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जर्मन कार कंपनियों की मुश्किल

मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और फोल्क्सवागेन जैसी प्रमुख जर्मन कंपनियां इलेक्ट्रिक कारों को बड़ी देर तक टालती रहीं. लेकिन बाजार में पिछड़ने के डर से 2013 में आखिरकार वोल्क्सवागेन और बीएमडब्ल्यू को अपनी ई-कारें पेश करनी ही पड़ीं. ऊंची कीमत और सीमित क्षमता वाली ये कारें लोगों को रिझा नहीं सकीं. जर्मन कार बाजार में ई-कारों की हिस्सेदारी सिर्फ 0.6 फीसदी है.

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121 साल बाद दूसरी ई-पोर्शे

अब करीब सभी कार कंपनियां जान चुकी हैं कि भविष्य ई-कारों का ही है. फोल्क्सवागेन 2025 तक ई-कारों की सेल 25 फीसदी करना चाहती है. जर्मन कंपनियां टेस्ला को टक्कर देना चाहती हैं. पोर्शे मिशन-ई नाम की कार तैयार कर रही है. यह 2020 में बाजार में आएगी.

ओएसजे/एमजे (एपी)

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