गृह युद्ध से जूझता थाइलैंड

एशियाई देश थाइलैंड ऐसी जंग में घिरा है, जिस पर दुनिया का ध्यान नहीं जा रहा है. इस्लामी अलगाववादी दिन पर दिन हिंसक होते जा रहे हैं. बदले में सेना की कार्रवाई भी तेज हो गई है. अब सरकार समाधान निकालना चाहती है.

मलेशिया की सरहद से सटे थाइलैंड के तीन दक्षिणी राज्य पटनी, याला और नराथिवट में मुस्लिम कट्टरपंथी कब्जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं. कहीं पुलिस चौकियां जलाई जा रही हैं तो कहीं कार बम विस्फोट किए जा रहे हैं. दुकानों पर सरेआम गोलियां चलती हैं. अगर किसी इस्लामी त्योहार के दिन कोई दुकान खुली मिल जाए तो दुकानदारों को धमकियों का सामना करना पड़ता है. जिन लोगों पर सरकार का समर्थन करने का शक हो उनका सिर काट दिया जाता है. ये दहशत भरी वारदात लगभग हर रोज यहां होती हैं. फुकेट से कुछ घंटों की दूरी पर. फुकेट, जिससे थाइलैंड के पर्यटन को पहचान मिलती है.

बर्बर गृह युद्ध

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप का कहना है कि थाइलैंड के दक्षिणी इलाके में गृह युद्ध छिड़ा है, जो बर्बर होता जा रहा है. इस संगठन के दिसंबर के सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि 2004 से अब तक देश में करीब 5,300 लोग जान गंवा चुके हैं.

दक्षिणी थाइलैंड के इन तीनों राज्यों में करीब 20 लाख लोग रहते हैं. इनमें से 80 प्रतिशत मुस्लिम हैं जिनकी जडें मलेशिया में हैं. थाइलैंड की 6.6 करोड़ की आबादी में ये लोग अल्पसंख्यक हैं. देश की अधिकतर आबादी बौद्ध धर्म मानने वाली है. लेकिन दक्षिणी इलाका कई सदियों तक मुस्लिम सुलतान पटनी के राज में रहा. 1902 में पहली बार इसका नेतृत्व थाइलैंड सरकार के हाथों में आया.

थाइलैंड की 6.6 करोड़ की आबादी में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं.

क्या है उद्देश्य?

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के जिम डेला गिआकोमा ने डॉयचे वेले से बातचीत में कहा कि अब तक ठीक से इसे समझा नहीं जा सका है कि इस्लामी कट्टरपंथी चाहते क्या हैं, अगर उनके साथ समझौता भी हो तो क्या, "हम जो देख रहे हैं वह इतना है कि मलेशियाई मूल के मुस्लिम विरोध कर रहे हैं और स्वाधीनता के लिए लड़ रहे हैं. लेकिन हम यह नहीं जानते कि क्या वे थाइलैंड से अलग स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते हैं. और अगर ऐसा है तो यह बहुत अवास्तविक है."

संस्था की रिपोर्ट में इसे विद्रोहियों का ऐसा नेटवर्क बताया गया है जो गांवों और कस्बों के स्तर पर सक्रिय है. गांव में ही विद्रोह के लिए पैसा जमा होता है, प्रचार किया जाता है और खुफिया जानकारियां भी जुटाई जाती हैं. इस गुरिल्ला रणनीति के साथ वे आगे बढ़ रहे हैं.

2004 से अब तक देश में करीब 5,300 लोग जान गंवा चुके हैं.

सेना का पलटवार

सरकार ने पूरे इलाके में सेना तैनात कर दी है. करीब 65,000 सैनिक, पुलिसबल और अर्धसैनिक जवान विद्रोहियों का सामना करने मौजूद हैं. इसके अलावा 80,000 स्थानीय बौद्ध लोगों को भी हथियार मुहैया कराए गए हैं और उन्हें बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिया गया है.

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि जिस पर भी शक जाता है सुरक्षा बल उसे उठा ले जाते हैं, प्रताड़ित करते हैं और कई बार हत्या कर देते हैं. युद्ध और आपात स्थिति के विशेष कानूनों के कारण इन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती और ये जवान सजा से बच जाते हैं. मानवाधिकार संगठन लंबे समय से शिकायत करते आ रहे हैं कि सेना का विशेषाधिकारों का गलत उपयोग हो रहा है.ह्यूमन राइट्स वॉच के सुनई पाठक ने डॉयचे वेले को बताया, "पिछले नौ साल से ऐसे मामले पड़े हैं, जहां सुरक्षा बल लोगों को उठा कर ले गए, उन्हें यातना दी, उनकी जान ले ली या फिर वे गायब हो गए और किसी भी आरोपी पर कोई मुकदमा नहीं चला."

एक घायल से बात करतीं प्रधानमंत्री यिनग्लुक शिनवात्रा

सरकार की जिम्मेदारी

पाठक का कहना है कि सेना की इस बर्बरता को देखते हुए विरोधी और हिंसक हो जाते हैं. बदले में सेना की कार्रवाई भी तेज हो जाती है, "यह एक दुश्चक्र है जिससे आप बाहर नहीं आ सकते." सेना और विद्रोहियों के बीच की लड़ाई में नुकसान स्थानीय लोगों का हो रहा है. मारे जा रहे 90 प्रतिशत लोग आम शहरी हैं, "सरकार को यह तय करना होगा कि ऐसी गैरकानूनी हरकतें न हों. और अगर ऐसा हो, तो आरोपी को सजा मिले." पाठक का कहना है कि यही एक तरीका है जिससे सरकार नागरिकों का विश्वास दोबारा हासिल कर सकती है.

थाइलैंड की प्रधानमंत्री यिनग्लुक शिनवात्रा की सरकार 28 मार्च को मलेशिया में मुस्लिम विद्रोहियों के साथ बात करेगी और शांति का प्रस्ताव रखेगी. मलेशिया में क्वालालंपुर यूनिवर्सिटी के मार्को बुंटे का कहना है, "बातचीत तभी हो सकती है जब उन्हें उनकी पहचान देने पर बहस हो. लेकिन अब तक सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया है." बुंटे का मानना है कि सरकार सेना की ताकत के बिना इस समस्या से नहीं निपट पाएगी.

रिपोर्ट: आना लेहमन/आईबी

संपादन: ए जमाल

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