गोमांस पर रोक से हिंदूकरण की कोशिश

भारत के बीजेपी शासित राज्य बारी बारी से गौहत्या पर रोक लगा रहे हैं. इसके साथ ही गौमांस की बिक्री और इसे खाने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है. धर्मनिरपेक्ष, हिंदू बहुल राष्ट्र भारत में यह धर्म से जुड़ा मुद्दा है.

उत्तर भारतीय राज्य हरियाणा ने गौहत्या और गौमांस बेचने से संबंधित कानूनों को और सख्त बना दिया है. अब इस अपराध के लिए जेल की सजा दोगुनी कर 10 साल कर दी गई है. हरियाणा धर्मिक रूप से संवेदनशील मुद्दे पर कार्यवाई करने वाला महाराष्ट्र के बाद दूसरा राज्य बन गया है. हरियाणा के कृषि एवं पशुपालन मंत्री ओपी धनकर ने इसके बारे में कहा, "गाय हमारी माता है और हमें किसी भी कीमत पर उसकी रक्षा करने की जरूरत है." हरियाणा में भी केन्द्र की ही तरह बीजेपी की सरकार है.

हाल ही में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के एक समर्थन गुट ने दक्षिण भारतीय राज्य केरल में गोरक्षा का अभियान शुरु किया. राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) की सरकार है. गायों की हत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए इस वीएचपी समर्थक संगठन ने गायों को मुक्त करवाने वालों को सम्मानित करने और उन्हें इनाम दिए जाने की भी घोषणा की. केरल हिंदू हेल्पलाइन नामक इस गुट ने पहले भी वीएचपी की विवादित 'घर वापसी' योजना को चलाया था. इसके कुछ ही दिन पहले केरल के मुख्यमंत्री ओम्मन चंडी ने संसद में बयान दिया था कि वे केन्द्र सरकार के गौ हत्या को रोकने की कोशिशों को राज्य में लागू नहीं करेंगे.

इस संगठन का मानना है कि राज्य में चल रहे गैरकानूनी पशुवधगृह और मांस बेचने वाली दुकानें पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं, जिनसे आसपास के लोगों को कई तरह के रोग लग जाते हैं. केरल में सत्ताधारी यूडीएफ और विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) दोनों ही गौहत्या और गौमांस पर कोई देशव्यापी प्रतिबंध लगाने के खिलाफ हैं. वे इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखलअंदाजी बता रहे हैं.

हालांकि देश के 29 राज्यों में से 24 में पहले से ही गोहत्या पर प्रतिबंध है, भारत की गिनती दुनिया के कुछ सबसे बड़े बीफ निर्यातकों में होती है. इस पेशे में ज्यादातर देश की मुसलमान आबादी लगी है. ज्यादातर निर्यात किया जाने वाला मांस नर या दूध ना देने वाली भैंसों का होता है, जिनको गायों जितना धार्मिक महत्व नहीं है. पूरे भारत में केवल कुछ ही राज्यों में भैसों को मारने की अनुमति है. 2012 में भारत में 364 करोड़ मेट्रिक टन बीफ का उत्पादन हुआ जिसमें 196 मेट्रिक टन का खपत घरेलू बाजार में हुआ और 168 मेट्रिक टन का निर्यात किया गया.

आरआर/एमजे (पीटीआई, एएफपी)

फायदे की बलि पर पालतू जानवर

थ्युरिंजिया की बकरियां

थ्युरिंजिया के जंगलों के कठोर हालात के लिए ये बकरियां विकसित की गईं. कड़ी ठंड और बारिश का इनपर कोई असर नहीं होता. इन्हें खास तौर पर घास चरने और दूध के लिए रखा जाता है. अभी इनकी संख्या एक हजार से ऊपर है.

फायदे की बलि पर पालतू जानवर

चीन का खास

चीन का ये खास सुअर पालतू जानवरों में सबसे पुराना है. माना जाता है कि ये सीधे जंगली सुअर से आए हैं. इनके शरीर पर बाल नहीं के बराबर होते हैं. अजीब से मुंह वाले इस जानवर की खासियत खुद को परजीवियों से बचाने की क्षमता है.

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अंगोरा के खरगोश

अंगोरा के खरगोशों से हर साल दो किलो ऊन मिलती है. इनकी ब्रीडिंग करने वाले चाहते हैं कि इस खरगोश से और बाल निकलें. मूलतया ये प्रजाति तुर्की की है. इस बीच यह भी विलुप्त होने के खतरे में है.

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बेहोश बकरियां

अमेरिका की ये छोटी छोटी बकरियां खतरा होने पर चौंक कर बेहोश हो जाती है. इसका कारण एक आनुवांशिक बिमारी है. ये प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है. इस बीच इनकी ब्रीडिंग करने वाले बढ़ गए हैं, इसलिए खतरा टल गया है.

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अजीब सी टर्की

ऐसी मुर्गियां जो साल में 300 अंडे देती हों, ऐसे टर्की जिनका वजन इतना ज्यादा हो कि वह इसे संभाल ही नहीं सकें. सिर्फ मांस और अंडों के उत्पादन के लिए विकसित पक्षियों के कारण जानवरों की पुरानी सामान्य प्रजातियां धीरे धीरे खत्म हो रही हैं.

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खतरे में

मैदान और दलदली जमीन सफेद भेड़ों के लिए सबसे अच्छी होती हैं. ये भेड़ विलुप्त होने की कगार पर हैं, जबकि चार सींगों वाली जैकब भेड़ बड़ी संख्या में पाई जाती है. इसकी काली ऊन काफी पसंद की जाती है.

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स्कॉटलैंड के भैंसे

मौसम से बेअसर और ताकतवर स्कॉटलैंड के ये भैंसे ब्रिटेन से बाहर भी नजर आने लगे हैं. इनकी संख्या काफी है और इनकी ब्रीडिंग भी खूब होती है. यूरोप में इनकी सबसे ज्यादा ब्रीडिंग जर्मनी में होती है.

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अफ्रीकी गधे

उत्तरी अफ्रीका के इन खास गधों की ब्रीडिंग पश्चिमोत्तर फ्रांस में होती है. ये वजन ढोने में अच्छे माने जाते हैं. इनकी संख्या दुनिया भर में सिर्फ 300 है. इसकी इतनी ज्यादा क्रॉस ब्रीडिंग हुई है कि मूल प्रजाति ढूंढे नहीं मिलती.

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बैर्गिश मुर्गे

कोलोन के आसपास के इलाके में पाए जाने वाले ये मुर्गे मध्यम आकार के होते हैं. मुर्गे के सिर पर होने वाली कलगी मुड़ी हुई होती है. ये कुछ एक सौ ही हैं. मुर्गियां साल भर में 150 अंडे ही दे पाती हैं. विकसित प्रजातियों से आधी.

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डुल्मन घोड़े

अच्छे, सीखने में तेज और संतुलित घोड़े. लेकिन इनकी संख्या 100 भी नहीं. जर्मनी के नॉर्थराइन वेस्टफेलिया में एक ही जगह ऐसी है जहां ये विलुप्त होते घोड़े रखे गए हैं. कभी जंगली घोड़ों के साथ संसर्ग के कारण ये प्रजाति अस्तित्व में आई.

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हंगेरियाई भेड़

ये भेड़ें मुखुरवा बीमारी से बची रह सकती हैं. इनके सींग एक मीटर तक लंबे हो सकते हैं. ये हंगरी में बहुतायत में पाई जाती थीं, लेकिन इन्हें मेरीनो भेड़ों के जगह बनानी पड़ी. उनके ऊन किसानों को ज्यादा पसंद थे.

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इंग्लिश भैंसा

काले कान, पैर और नाक वाला सफेद इंग्लिश भैंसा. यह पालतू प्राणियों की सबसे पुरानी प्रजातियों में से एक है. सेल्टिक पुरोहित इसे पवित्र मानते थे. अब जर्मनी में भी इनकी ब्रीडिंग की कोशिश हो रही है.

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सुंदर मुर्गी

भले ही ज्यादा अंडे और मांस देने वाली मुर्गियां पैदा की जा रही हों लेकिन इस मुर्गी जितनी सुंदर कोई नहीं दिखती.

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