ग्रीस ने मैर्केल से उठाया नाजीकाल के प्रायश्चित का मुद्दा

ग्रीक राष्ट्रपति प्रोकोपिस पावलोपुलोस ने कहा है कि वह दूसरे विश्व युद्ध के समय नाजी कब्जे के लिए जर्मनी से हर्जाने की मांग करना नहीं छोड़ेंगे. इस समय जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल दो दिनों की ग्रीस यात्रा पर हैं.

ग्रीस का कहना है कि उसके पास जर्मनी से हर्जाना मांगने का वैध आधार है और वह दूसरे विश्व युद्ध में नाजी कब्जे के समय ग्रीस पर ढाए गए अत्याचारों के प्रायश्चित के तौर पर अरबों यूरो का दावा बरकरार रखेगा.

राजनीति | 20.08.2018

ग्रीस के ऐसे दावों को जर्मनी खारिज करता आया था. लेकिन इस बार मैर्केल की ग्रीस यात्रा पर जब ग्रीक राष्ट्रपति ने उनके सामने यह मुद्दा उठाया तो चांसलर मैर्केल ने कहा, "हमें अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी का अहसास है. हम जानते हैं कि नेशनल सोशलिज्म के दौर में जर्मनी के हाथों ग्रीस को कितना भुगतना पड़ा. हमारे लिए उससे यही सबक है कि हम ग्रीस के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए सब संभव काम करें और एक दूसरे के फायदे के लिए हमेशा परस्पर सहयोग करें."

ग्रीक राष्ट्रपति पावलोपुलोस ने कहा, "ग्रीक होने के नाते, हम इन मांगों को वैधानिक रूप से सक्रिय मानते हैं और (जरूरत पड़ने पर) न्यायिक तौर पर भी इन्हें आगे बढ़ा सकते हैं. इन दावों को किसी काबिल यूरोपीय न्यायिक फोरम में उठाया जाना चाहिए."

दूसरे विश्व युद्ध के समय के प्रायश्चितों का मुद्दा 2010 से 2018 तक चले ग्रीक बेलआउट पैकेज के दौर में उठता रहा. आर्थिक तंगी से गुजर रहे ग्रीस ने उसे सबसे ज्यादा कर्ज देने वाले देश जर्मनी को ही अपनी तंगहाली के लिए जिम्मेदार भी बताया था.

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आर्थिक तंगी

ग्रीस में कई साल से जारी आर्थिक संकट ने लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी है. बीते सात साल में ग्रीस को अरबों यूरो की मदद मिली है, लेकिन गरीबी अब भी बड़ी समस्या बनी हुई है. लोग बेहद तंगी में जीवन काट रहे हैं.

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तीन बेलआउट पैकेज

तस्वीर एथेंस की है जहां लोग सामाजिक सुरक्षा के तहत मिलने वाली मदद के लिए लाइन लगाए खड़े हैं. वैश्विक मंदी के चलते ग्रीस के साथ आयरलैंड, पुर्तगाल और साइप्रस की भी हालत खस्ता हुई थी. उनकी हालत अब बेहतर है. लेकिन तीन बेलआउट पैकेजों के बाद भी ग्रीस बेहाल है.

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मुश्किल हुआ गुजारा

61 साल की एवा एगकिसालाकी रिटायर्ड टीचर हैं. उन्हें पेंशन नहीं मिलती क्योंकि जब बेलआउट पैकेज लागू किया गया तो रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 67 साल कर दी गई. उनके पति की पेंशन भी आर्थिक सुधारों के कारण 980 यूरो से घटकर 600 यूरो रह गई.

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"जैसे तैसे गुजारा"

एवा ऑर्थोडॉक्स चर्च की तरफ से चलाए जा रहे सूप किचन में काम करती हैं. वहां से जो कुछ उन्हें मिलता है, उससे वह अपने बेरोजगार बेटी और बेटे का भी गुजारा चलाती हैं. उनका कहना है कि बस जैसे तैसे गुजारा हो रहा है और ज्यादातर ग्रीक लोग ऐसे ही जी रहे हैं.

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अब और नहीं..

ग्रीक संसद के बाहर टैक्स में कटौती की मांग को लेकर प्रदर्शन. अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं ने ग्रीस से कहा है कि टैक्स बढ़ाए जाएं और पेंशनों में कटौती हो. लेकिन सरकार का कहना है कि जितना मुमकिन था, उतनी कटौती पहले ही हो चुकी है.

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गरीबी रेखा से नीचे

एक बुजुर्ग महिला सूप किचन में दान किए हुए कपड़े और जूते देख रही है. वैसे ग्रीस यूरोपीय संघ का सबसे गरीब सदस्य नहीं है. रोमानिया और बुल्गारिया कहीं ज्यादा गरीब हैं. लेकिन यूरोस्टैट के मुताबिक ग्रीस में 22.2 प्रतिशत लोग बेहद गरीबी में जी रहे हैं.

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कम है उम्मीद

बेघर लोगों की मदद के लिए एथेंस में मोबाइल लॉन्ड्री सर्विस चलाने वाले फानिस सोनास कहते हैं, "रोज आपको वही चेहरे दिखते हैं. कुछ नए लोग भी दिखते हैं." इस बीच, कई सारे लोग अपने कपड़ों का गट्ठर लिए उनकी वैन की तरफ बढ़े चले आ रहे हैं. रिपोर्ट: नदीन बैर्गहाउजेन/एके

जर्मनी नाजी काल में किए गए अन्यायों के लिए माफी मांग चुका है लेकिन प्रायश्चित के लिए ऐसी कोई रकम देने के विषय पर कोई बात नहीं की है. जर्मनी नहीं मानता कि उसे ग्रीस को और कुछ देना बाकी है. सन 1960 में जर्मनी ने ग्रीस को 11.5 करोड़ जर्मन मार्क दिए थे. और 1990 में जर्मन एकीकरण के समय एक ऐसी संधि हुई थी जिसमें भविष्य में जर्मनी पर किसी भी तरह का हर्जाना भरने की जिम्मेदारी नहीं रही थी. 

हिटलर की सेनाओं ने सन 1941 से 1944 तक ग्रीस पर कब्जा कर रखा था. उसने ग्रीस से "ऑक्यूपेशन लोन" के नाम पर पैसे लिए, जिसका इस्तेमाल उत्तरी अफ्रीका में उसने अपने अभियानों में किया. तब मंहगाई इतनी बढ़ गई थी कि ग्रीस में लाखों लोग भूख के चलते मारे गए. कुल मिलाकर ग्रीस ने उस समय के हिसाब से 47.6 करोड़ राइष मार्क दिए थे, जिसका मोल 6 से 10 अरब यूरो के आसपास रहा होगा. एक ग्रीक संसदीय समिति ने तीन साल पहले रिपोर्ट जारी कर उस रकम को आज के 289 अरब यूरो के आसपास बताया था.

आरपी/एके (रॉयटर्स, डीपीए)

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ग्रीस के आर्थिक संकट की शुरुआत

2009 में ग्रीस के तत्कालीन प्रधानमंत्री जॉर्ज पापान्द्रेउ ने जब बताया कि बजट का घाटा 12 फीसदी हो गया है तो तहलका मच गया. बाद में यह आंकड़ा 15 फीसदी तक पहुंचा. इसके बाद क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने ग्रीस की साख को कम ग्रेड दिए जिससे आर्थिक सहायता मिलना और कम हो गया.

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टैक्स बढ़ाए जाने का विरोध

2010 में यूरोपीय संघ और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष बेल आउट पैकेज देने को राजी हुए. लेकिन इसके बाद ही बजट घाटे को कम करने के लिए कड़े कदम उठाए गए जिसे ग्रीसवासियों ने पसंद नहीं किया. सार्वजनिक क्षेत्र के खर्चों में कटौती और टैक्स बढ़ाए जाने से लोगों में नाराजगी दिखी. 2011 में जनविरोध व्यापक स्तर पर फैला और कई वर्षों तक जारी रहा.

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बेल आउट पैकेज बना चुनावी मुद्दा

2012 में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी के बाद ग्रीसवासियों ने ऐसे दलों को वोट दिया जो बेल आउट पैकेज का विरोध कर रही थीं. नतीजा पहले चुनाव में किसी को बहुमत नहीं मिला. दूसरी बार हुए चुनाव में सेंटर-राइट पार्टी न्यू डेमोक्रेसी को वोट मिले जो ईयू और आईएमएफ के बेल आउट पैकेज के समर्थन में थी.

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बेल आउट पैकेज को नकारा

2015 में ग्रीसवासियों ने वामपंथी सिरिजा पार्टी को वोट दिया जिसके बाद यूरोपीय संघ से ठन गई. तत्कालीन प्रधानमंत्री अलेक्सिस सिप्रास ने जनमत संग्रह कराने का फैसला किया जिसमें लोगों से बेल आउट पैकेज के मिलने या न मिलने पर वोटिंग कराई गई. 61 फीसदी लोगों ने बेल आउट पैकेज को खारिज कर दिया.

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फिर मिला नया बेल आउट

बेल आउट पर हुए जनमत संग्रह के बाद यूरोपीय संघ के नियमों को जनता ने खारिज कर दिया. तत्कालीन वित्त मंत्री यानिस वारूफाकिस की कुर्सी छिनी और उसके बाद सिप्रास सरकार ने नए सिरे से समझौतों पर दस्तखत किए. इससे ग्रीस ने खुद को यूरोजोन से बाहर निकलने से बचा लिया और 80.6 करोड़ यूरो का नया बेल आउट प्रोग्राम शुरू हुआ.

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कर्ज चुकाने की ओर बढ़े

2015 में बने नए बेल आउट प्रोग्राम के तहत ग्रीस ने नए आर्थिक सुधारों को अपनाया जिसके बाद निजीकरण की शुरुआत हुई. दो वर्षों बाद आईएमएफ ने ब्रसेल्स को बेल आउट प्रोग्राम में कुछ ढिलाई बरतने को कहा. सिप्राम सरकार ने टैक्स और पेंशन योजनाओं का विस्तार शुरू किया जिससे ग्रीस अपने कर्जों को चुका सके.

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खत्म हुआ कर्ज का दौर

आखिरकार अगस्त 2018 में ग्रीस बेल आउट प्रोग्राम से आजाद हो गया. यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने इसे नए अध्याय की शुरुआत कहा और आगे भी ग्रीस के लिए और उसके साथ काम करते रहने का आश्वासन दिया. लेकिन बेरोजगारी दर और गरीबी को देखते हुए ग्रीस के भविष्य पर सवालिया निशान भी लगा हुआ है.