"घर लौटें जर्मनी के प्रतिभावान लोग"

इस साल चिकित्सा का नोबेल जीतने वाले थोमस सुडॉफ जर्मन मूल के हैं, लेकिन तीन दशक से अमेरिका में हैं. 90 के दशक में उन्होंने देश लौटने की कोशिश की, लेकिन मन नहीं लगा. लेकिन बेहतर हालात के बाद कई लोग लौट रहे हैं.

जब फिलिप मायर कुकुक जर्मनी छोड़कर काम करने न्यूयॉर्क गए तो हेल्मुट कोल जर्मनी के चांसलर हुआ करते थे. देश में बेरोजगारी दर 11 फीसदी थी और जर्मन विश्वविद्यालयों का रिसर्च केंद्र के रूप में नाम नहीं था. न्यूयॉर्क के नामी अस्पताल में नौकरी का ऑफर बॉन के युवा डॉक्टर के लिए सुनहरा मौका था. अब 15 साल बाद मायर कुकुक म्यूनिख की टेक्निकल यूनिवर्सिटी में काम करने लौट रहे हैं. एक बार फिर बहुत उम्मीदों के साथ, "जब मैंने लैब को देखा, तो साफ हो गया कि हम अब न्यूयॉर्क से पीछे नहीं हैं."

2008 के बाद से जर्मनी से विदेश जाने वाले लोगों की तादाद हर साल घट रही है और 2013 में वह एक लाख 30 हजार थी. मायर कुकुक उन एक लाख 20 हजार जर्मनों में शामिल हैं, जो बहुत साल पहले देश छोड़ कर गए थे, लेकिन इस साल लौट आए हैं और वापस आने वाले आप्रवासियों की बढ़ती जमात में शामिल हो गए हैं. अखबारों ने नई रुझान की बात हो रही है और जर्मनी के आकर्षण और जर्मन अस्मिता की नई भावना को सराहा जा रहा है.

मायर कुकुक का परिवार

विदाई सदा के लिए नहीं

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ओईसीडी के आप्रवासन विशेषज्ञ थोमस लीबिष कहते हैं, "पहले के सालों में बहुत कम लोग दूसरे देश जाते थे, लेकिन हम वापसी की तगड़ी रुझान नहीं देख रहे हैं." विदेशों में रहने वाले जर्मन विद्वानों की देखभाल करने वाली और स्वदेश वापसी में उनकी मदद करने वाली संस्था जर्मन स्कॉलर्स संघ जीएसओ की सबीने युंग इससे सहमत हैं. उनका कहना है कि वापस आने वाले एक्सपैट का विस्फोट नहीं हो रहा है. "पहले की तरह लौटने वाले लोगों से ज्यादा लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं."

लीबिष और युंग वापस आने वाले अध्येताओं की रिपोर्ट की वजह आप्रवासन के पुराने विचार को मानती हैं. कुछ लोग बोरिया बिस्तर इसलिए बांध लेते हैं कि वे दिलेर हैं तो दूसरे इसलिए कि उन्हें वित्तीय चिंताएं हैं. बवेरिया प्रदेश की अर्थनीति मंत्रालय की मोनिका विल्हेम कहती हैं, "आजकल हमारे यहां से लोग पहले की तरह युद्ध या अकाल की वजह से नहीं भागते," और साथ ही जोड़ती हैं कि इसलिए भारी तादाद में वापसी नहीं हो रही. "आजकल दिमाग का सर्कुलेशन होता है, उच्च प्रशिक्षित लोग देश छोड़ जाते हैं, कहीं और रहते हैं, फिर किसी और देश चले जाते हैं, और कभी न कभी लौट आते हैं."

लौटने के अनेक कारण

विल्हेम बवेरिया सरकार की "बलेरिया वापस लौटें" प्रोग्राम की प्रभारी हैं. इसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाले उच्च प्रशिक्षित अध्येताओं को वापस आने के लिए बढ़ावा देना है. फिलिप मायर कुकुक या माक्सीमिलियान इमांस जैसे लोग. पेशे से इंजीनियर इमांस 2003 में ऑटोमोबिल सप्लायर के लिए काम करने ऑस्ट्रिया चले गए थे. उन दिनों उन्हें जर्मनी में काम नहीं मिला और रोजगार दफ्तर ने उन्हें ऑस्ट्रिया जाने में मदद दी थी. इस बीच उनकी जर्मनी में मांग है और बवेरिया प्रोग्राम की मदद से उन्हें बाड राइषेनहाल में नौकरी मिली है. इमांस वापसी की वजह परिवार और दोस्तों को बताते हैं.

इमांस परिवार

अधिकांश लोग एक खास समय विदेशों में बिताते हैं. लीबिष कहते हैं, "दो में एक व्यक्ति पांच साल के अंदर लौट आता है." ज्यादातर लोगों को उनकी कंपनी विदेश भेजती है. ओईसीडी विषेशज्ञ के अनुसार देश जितना धनी और विकसित होता है, उतनी ज्यादा संभावना होती है कि पोस्टिंग कम समय के लिए होगी. इस समय विदेश में रहने वाले 4 जर्मन में से एक ऑस्ट्रिया या स्विट्जरलैंड में रहता है और जर्मनी जैसी आर्थिक परिस्थितियों वाले देश से लोगों के लौटने की संभावना अधिक है.

वापसी का जोश

मायर कुकुक घर वापसी के बारे में जोश में हैं, लेकिन बताते हैं कि न्यू यॉर्क से म्यूनिख वापसी का कारण सिर्फ उनका नया काम और करियर में बेहतरी ही नहीं है. उनकी छोटी बेटी स्कूल जाना शुरू कर रही है और उनकी अमेरिकी पत्नी को भी काम मिल गया है, जबकि रिसर्च फंडिंग में दिक्कतों की वजह से उनका काम मुश्किल होता जा रहा था. जर्मनी की सुदृढ़ आर्थिक हालत बहुत से जर्मनों की वापसी का कारण है. लेकिन वापस आ कर उन्हें अनुभव होता है कि चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती.

ऑस्ट्रिया से लौटने वाले इमांस कहते हैं कि जब आप अपने देश को दूर से देखते हैं तो चीजों को बढ़ा चढ़ा कर देखते हैं. मायर कुकुक कहते हैं कि जर्मन बहुत शिकायत करते हैं. "यहां गिलास हमेशा आधा भरा होता है जबकि अमेरिका में हमेशा आधा खाली होता है." उनका कहना है कि उनका परिवार ऐसा है कि बेहतर संभावनाओं और जीवन स्तर को देखते हुए दोनों महादेशों में रह सकता है. उनके मन में कोई संदेह नहीं है, "यदि अमेरिका या कोई और अंग्रेजी भाषा वाला देश बेहतर मौका देता है तो हम वहां चले जाएंगे."

रिपोर्टः अलोइस बैर्गर/एमजे

संपादनः ए जमाल

हमें फॉलो करें