जर्मनी में अब शरण पाने के अधिकार पर बहस

जर्मनी में शरणार्थी संकट ने चांसलर अंगेला मैर्केल की कुर्सी को हिला कर रखा हुआ है. पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद इस पद के दावेदार फ्रीडरिष मैर्त्स ने तो शरण के संवैधानिक अधिकार पर ही सवाल उठाया है.

अकसर देखा गया है कि किसी देश में होने वाले बड़े बदलावों की शुरुआत किसी एक छोटी मोटी टिप्पणी से होती है. इसलिए जर्मनी में फ्रीडरिष मैर्त्स के बयान को गंभीरता से लेना जरूरी है. फ्रीडरिष मैर्त्स वही शख्स हैं जिन्हें मौजूदा चांसलर अंगेला मैर्केल के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है. बहुत मुमकिन है कि वे जर्मनी की सबसे बड़ी पार्टी सीडीयू के अध्यक्ष चुने जाएं. मैर्त्स ने बातों बातों में जर्मनी के संविधान में दिए गए शरणार्थी अधिकार पर ही सवाल खड़े कर दिए.

जर्मन संविधान हर व्यक्ति को शरण का अधिकार देता है. संविधान के अनुसार, "राजनीतिक तौर पर पीड़ित लोगों को शरण का अधिकार है." संविधान के ये वे शब्द हैं जो जिन्होंने कई तूफानों का सामना किया है. पहले 1993 में, जब पूर्वी यूरोप से आने वाले लोगों पर रोक लगाई गई थी. यह वही साल था जब जंग से बच कर पूर्वी यूरोप से लोग जर्मनी में शरण लेने आ रहे थे. इसी जंग ने पूर्व यूगोस्लाविया का अंत किया था.

उस वक्त भी आज ही की तरह विरोध हो रहे थे. कुछ लोगों में गुस्सा था, तो कई बार प्रदर्शन हिंसक रूप भी ले लेते थे. फिर 2015 में जब हजारों लाखों लोग जर्मनी आने लगे, तब एक बार फिर वैसी ही आवाजें उठने लगीं. इस बार सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और अफ्रीका से लोग आ रहे थे. लेकिन इस बार भी संविधान के शब्दों को कोई छू नहीं पाया. खास कर चांसलर अंगेला मैर्केल इसके बचाव में डट कर खड़ी रहीं.

यह सच है कि कई तरह की रोक लग जाने के बाद अब बहुत से लोगों से जर्मनी में शरण लेने का मौका छिन गया है. लेकिन यह भी सच है कि यूरोपीय संघ में केवल जर्मनी ही हर व्यक्ति को शरण का अधिकार देता है. और सही तो यह भी होता कि यूरोप भर में एक ही तरह के नियम होते. लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिखता.

येंस थुराऊ

इतिहास के अनुभव

मैर्त्स का सुझाव है कि जर्मनी के कानून में बदलाव लाने के लिए बहस शुरू की जाए. वही कानून, जिसकी जड़ें जर्मनी के इतिहास में दबी हुई हैं. हम जर्मनों ने 12 साल तक नाजी शासन के तहत दुनिया भर को काफी कष्ट पहुंचाया है. हमने लोगों को सताया है, हत्या की है. और ये सब सिर्फ इसलिए कि उनका धर्म, पृष्ठभूमि, उनकी राजनीतिक सोच हमसे अलग थी.

खास कर बड़ी संख्या में यहूदियों ने अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़ कर भागने की कोशिशें की लेकिन वे लोग कहीं जाने में इसलिए विफल रहे क्योंकि दूसरे देशों ने उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया था. नतीजतन यातना शिविरों में उनकी जान गई. इसलिए 1949 में जब जर्मनी ने अपना संविधान "बेसिक लॉ" बनाया, तो उसमें शरण के अधिकार को शामिल किया गया, ताकि दोबारा कभी ऐसा कुछ ना हो सके.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

पर्यावरण के लिए

हामबाखर जंगल को बचाने के लिए पर्यावरण संरक्षकों ने पेड़ों पर घर बनाकर रहने का रास्ता अपनाया है. वे छह साल से इस प्राचीन जंगल में पेड़ों को काटे जाने की योजना का विरोध कर रहे हैं. जंगल को काटकर यहां कोयले की खुदाई होनी है. यह इलाका बिजली कंपनी आरडब्ल्यूई की मिल्कियत है.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

खाली कराए गए पेड़ के घर

अब पुलिस हामबाखर जंगल को खाली करा रही है. एक एक एक्टिविस्ट को उठाकर बाहर निकाला जा रहा है. पेड़ पर बने करीब 60 घरों को हटा दिया गया है. इसके विपरीत ज्यादातर पर्यावरण संरक्षक धरना दे रहे हैं. महत्वपूर्ण लक्ष्य के लिए कानून को जानबूझकर तोड़ना सालों से विवादों में है.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

गैर संसदीय विरोध

युद्ध के बाद जर्मनी में पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन वामपंथी छात्रों ने किया था. 60 के दशक के मध्य में उन्होंने संसद से बाहर विपक्ष विपक्ष की स्थापना की. इस संगठन की मदद से उन्होंने सत्ता संरचना, वियतनाम युद्ध, परंपरागत यौन नैतिकता और नाजीकाल पर बहस न करने का विरोध किया.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

परमाणु बिजली का विरोध

नागरिक अवज्ञा का चरमोत्कर्ष 1970 के दशक में था. 1968 के छात्र आंदोलन के बाद जानबूझकर कानून तोड़ने की परिपाटी लोकप्रिय होने लगी. फरवरी 1975 में दक्षिण जर्मनी के वाइल शहर में प्रदर्शनकारियों ने परमाणु बिजलीघर के निर्माण की जगह पर कब्जा कर लिया. वाइल परमाणु बिजली के विरोध का प्रतीक बन गया.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

हवाई अड्डे के विस्तार का विरोध

फ्रैंकफर्ट जैसे बड़े हवाई अड्डों का विस्तार करने की योजना भी जर्मनी में विरोध की वजह बनी. 14 नवंबर 1981 को करीब 1,20,000 हजार लोगों ने फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे पर एक और रनवे बनाने का विरोध किया. लेकिन इसके बावजूद विवादास्पद रनवे ने 12 अप्रैल 1984 से काम करना शुरू कर दिया.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

नोबेल विजेता का विरोध

1 सितंबर 1983 को नोबेल पुरस्कार विजेता हाइनरिष बोएल भी नागरिक सवज्ञा आंदोलन का हिस्सा बने. परमाणु रॉकेटों को अपग्रेड करने के नाटो के फैसले के खिलाफ वे अपनी पत्नी और दूसरे कलाकारों के साथ मूटलांगेन में अमेरिकी सैनिक अड्डे पर प्रदर्शन करने गए. ये जर्मन शांति आंदोलन के बड़े कदमों में शामिल था.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

वाकर्सडॉर्फ में गृहयुद्ध सी स्थिति

वाइल में कामयाबी के बाद जर्मनी के परमाणु विरोधियों का आंदोलन फैलने लगा. 1985 में बवेरिया के वाकर्सडॉर्फ में परमाणु छड़ों को अपग्रेड करने का प्लांट बनाने की योजना पर अगला टकराव सामने आया. गृहयुद्ध जैसी झड़पों के बाद एक पुलिसकर्मी और कई प्रदर्शनकारी मारे गए. 1989 में निर्माण रोक दिया गया.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

पटरी पर लेट कर

सरकार की परमाणु नीति पर पश्चिम जर्मनी में पर्यावरण संरक्षक नाराज रहे. वे परमाणु कचरे के गोरलेबेन के गोदाम में ट्रांसपोर्ट के दौरान हर साल प्रदर्शन करते. रेल से होने वाले कास्टर ट्रांसपोर्ट को रोकने के लिए वे कई बार तो खुद को पटरियों में चेन से बांध लेते ताकि रेल वहां से न गुजरे.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

परमाणु खतरे के खिलाफ जोखिम

परमाणु कचरे के ट्रांसपोर्ट के खिलाफ विरोध के दौरान कुछ प्रदर्शनकारी तो भारी जोखिम उठाने को भी तैयार दिखे. पर्यावरण संगठन रॉबिन वुड का एक कार्यकर्ता तो जान की परवाह किए बिना ट्रांसपोर्ट वाले रास्ते पर ट्रेन को बिजली की सप्लाई करने वाले पोल पर चढ़ गया.

जर्मनी में नागरिक अवज्ञा आंदोलन

विरोधियों पर पानी की बौछार

फ्रैंकफर्ट के रनवे की तरह श्टुटगार्ट में भूमिगत स्टेशन का निर्माण भी विवादों में था. 2009 से शहर के समृद्ध नागरिक वामपंथी कार्यकर्ताओं के साथ इसका विरोध कर रहे थे. श्टुटगार्ट21 प्रोजेक्ट को रोकने के लिए प्रदर्शनकारियों ने 2010 में एक पार्किंग एरिया पर कब्जा कर लिया. पुलिस कार्रवाई में सैकड़ों घायल हो गए.

मौलिक अधिकार

ऐसा नहीं है कि इसके बाद जर्मनी नैतिक रूप से बेहतर लोगों का देश बन गया. ना ही देश का पूर्वी हिस्सा और ना ही पश्चिमी हिस्सा शरणार्थियों को समाज में समेकित कर पाया. पश्चिमी जर्मनी में उन्हें "गेस्ट वर्कर" कहा जाता था, जिसका साफ मतलब था कि एक ना एक दिन वे लोग अपने देश लौट जाएंगे, जो कि कभी हुआ नहीं. लेकिन संविधान में शरण का अधिकार बना रहा. इस पर सभी राजनीतिक पार्टियां एकमत भी रहीं. जर्मन लोगों के अनुभव इसकी बड़ी वजह रहे. और ये अनुभव 1945 में नाजी शासन के खात्मे के बाद भी जारी रहे.

ऐतिहासिक तजुर्बे और उनसे निकलने वाले सिद्धांत वक्त के साथ धुंधले पड़ जाते हैं और बदल भी सकते हैं, ये सामान्य सी बात है. लेकिन जर्मन संविधान में बेवजह शब्द नहीं लिखे गए हैं, इसलिए उन्हें बदला नहीं जा सकता, उनकी हमेशा हमेशा की गारंटी है. संविधान की बाकी की धाराओं को भी तभी बदला जा सकता है, जब संसद उसे दो तिहाई के बहुमत से पारित करे.

हाल के सालों में बड़ी संख्या में देश में शरणार्थियों के आने से और समाज के ध्रुवीकरण होने से देश बदल गया है. लोगों का बर्ताव रूखा और ठंडा हो गया है. शरण के संवैधानिक अधिकार को दांव पर लगाने से जर्मनी का इतिहास के एक अहम अध्याय से नाता टूट जाएगा. बेहतर होगा कि ऐसा न हो.