जर्मनी में पैदा हुए सीरियाई डॉक्टर की उलझन

एकीकरण से पहले पूर्वी जर्मनी में पैदा हुए, सीरिया में बतौर डॉक्टर काम करते रहे, लेकिन देश में पांच साल से जारी संकट ने उन्हें तुर्की आने को मजबूर कर दिया. अब तुर्की में उन्हें अपने और परिवार के भविष्य का डर सता रहा है.

सीरिया में जारी संघर्ष ने मुकदाद के लिए परेशानियां खड़ी कर दीं. भविष्य की अनिश्चितता के चलते वह तुर्की तक तो आ गए लेकिन सामने बेहतर जीवन का कोई रास्ता नजर नहीं आया. अब वह कोशिश कर रहे हैं अपनी पत्नी को लेकर शरणार्थियों की नाव में सवार हो ग्रीस पहुंच जाएं. इससे पहले कि शरणार्थियों पर यूरोप का रुख सख्त हो और यूरोप के दरवाजे उनपर बंद हो जाएं.

मुकदाद और उनकी पत्नी को दो साल पहले सीरिया से भागना पड़ा. मुकदाद अरबी शिया हैं और उनकी पत्नी बेरीवान सुन्नी कुर्द. सीरिया में उन दोनों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं में अंतर के कारण खुद को खतरे के साये में पाया. फिलहाल उन्हें एक ही रास्ता नजर आता है, किसी तस्कर से संपर्क किया जाए जो उन्हें ग्रीस जाने वाली नाव पर सवार कर दे. मुकदाद बताते हैं, "तस्कर के मुताबिक यहां से निकलना मुमकिन है. मुझे नहीं लगता तुर्की कभी भी शरणार्थियों को नागरिकता देगा."

वह मानते हैं कि जरूरी कागजों के बिना जीवन में विकल्प भी बहुत सीमित हो सकते हैं. जैसे कि, तुर्की में उन्हें बतौर डॉक्टर काम करने की छूट नहीं है. डॉक्टरी की डिग्री उन्होंने दमिश्क से ली थी. वह पूछते हैं, "अगर हमारी संतान हुई तो उसकी नागरिकता क्या होगी? क्या उसे यहां का कानूनी दर्जा मिलेगा? क्या वह यहां काम कर सकेगा?" उन्होंने कहा उनके जैसे लोगों के लिए यह सिर्फ पैसों का सवाल नहीं है, यह सुरक्षा का मुद्दा है.

एक सेल्फी ने कैसे बदली जिंदगी

मैर्केल से मुलाकात

बर्लिन श्पांडाऊ के रिफ्यूजी कैंप में रहते हुए अनास मोदामनी ने सुना कि जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल वहां एक दौरे पर आने वाली हैं और वे कुछ शरणार्थियों से बात भी करेंगी. सोशल मीडिया के शौकीन इस 19 साल के सीरियाई युवा ने इसी मौके पर चांसलर के साथ एक सेल्फी ले ली.

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यूरोप तक का सफर

सीरियाई राजधानी दमिश्क में अपने घर के बमबारी में धवस्त हो जाने के कारण उसे अपने माता-पिता और भाई बहनों के साथ एक दूसरे शहर गारिया भागना पड़ा. वहीं से मोदामनी यूरोप के लिए निकला और सोचा कि बाद में अपने परिवार को भी यूरोप लाएगा. लेबनान के रास्ते तुर्की से होते हुए वह ग्रीस पहुंचा.

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खतरनाक यात्रा

अपने इस लंबे सफर में कई बार अनास मरते मरते बचा. तुर्की से ग्रीस पहुंचने के लिए वह भी हजारों लोगों की तरह रबर की बनी छोटी नावों में सवार हुआ. नाव जरूरत से ज्यादा भरी हुई थी और रास्ते में ही डूब भी गई. वह किसी तरह जिंदा बचा.

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पांच हफ्ते पैदल

ग्रीस से मेसेडोनिया तक का सफर अनास ने पैदल ही तय किया. वहां से होते हुए हंगरी और ऑस्ट्रिया तक पहुंचा. सितंबर 2015 में वह अपने सफर के अंतिम पड़ाव जर्मनी पहुंचने में सफल रहा. म्यूनिख छोड़कर वो बर्लिन गया और तबसे वहीं रह रहा है.

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शरण मिलने का इंतजार

बर्लिन में अनास ने एक रिफ्यूजी सेंटर के बाहर कई दिन बिताए. अनास बताता है कि वह काफी मुश्किल वक्त था और ठंड भी खूब पड़ रही थी. आखिरकार उसे बर्लिन के श्पांडाउ में एक शरणार्थी गृह भेजा गया. वहां अपने सफर की दुश्वारियों को बयान करने के लिए चांसलर मैर्केल के साथ ली गई सेल्फी ने उसे बेहतरीन मौका दिया.

एक सेल्फी ने कैसे बदली जिंदगी

मिला दत्तक परिवार

अनास कहता है कि चांसलर मैर्केल के साथ ली सेल्फी ने उसकी जिंदगी बदल दी. मीडिया में उसके फोटो छपे तो वहीं से उस जर्मन परिवार को उसके बारे में पता लगा जिनके साथ वो पिछले कुछ महीने से रह रहा है. वे उसे अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में रखते हैं.

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घर की यादें

मीऊ परिवार के साथ रहने वाले अनास का जीवन पहले से काफी बेहतर है. वो जर्मन भाषा सीख रहा है और कई नए दोस्त बने हैं. सीरिया में हाई स्कूल तक पढ़ने के बाद अब वह आगे की पढ़ाई करना चाहता है. लेकिन उसे अभी सबसे ज्यादा आधिकारिक रूप से शरण मिलने का इंतजार है. तभी परिवार को भी जर्मनी लाना संभव हो सकेगा.

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शरणार्थियों के बारे में गलत धारणा

अनास को उम्मीद है कि वह जर्मनी में एक अच्छा और सुरक्षित जीवन जी सकेगा. लेकिन शरणार्थियों के खिलाफ बढ़ती भावनाओं को लेकर काफी चिंतित भी है. उसे डर है कि कहीं इसी वजह से उसे शरण ही ना मिले और फिर अपने परिवार को जर्मनी बुलाने का सपना ही ना टूट जाए.

हालांकि कई अन्य शरणार्थियों की तरह वह तुर्की के इस बात के लिए एहसानमंद हैं कि जब वह सीरिया से भागे तो तुर्की ने उन्हें अपने यहां पनाह दी. लेकिन वह तुर्की को रहने के लिए उपयुक्त जगह नहीं मानते. मुकदाद ने कनाडा में भी शरण पाने की कोशिश की, लेकिन उनकी अर्जी रद्द हो गई क्योंकि वह जर्मन शहर लाइपजिग में पैदा हुए थे. हालांकि कानूनी तौर पर वह जर्मन नागरिकता के हकदार नहीं हैं.

उन्होंने बताया, "मेरे पिता जर्मनी में पीएचडी कर रहे थे जब 1985 में मेरा जन्म हुआ. मेरे माता पिता 1988 में बर्लिन की दीवार गिरने से पहले वापस सीरिया चले गए." उनकी पत्नी बेरीवान ने अमेरिका में शरण की अर्जी दी है. उनकी अर्जी अभी विचाराधीन है. लेकिन वॉशिंगटन में सीरियाई नागरिकों की ऐसी हजारों अर्जियां हैं, यह प्रक्रिया लंबी और जटिल है. मुकदाद कहते हैं अगर उनकी पत्नी की अर्जी मान भी ली गई तो उन्हें अपनी पत्नी के पास पहुंचने के लिए कम से कम तीन साल लग जाएंगे, जो कि एक दूसरे के बगैर रहने के लिए लंबा समय है.

तुर्की और यूरोपीय संघ के बीच शरणार्थी मुद्दे पर चल रही बातचीत के बीच उनका मामला और पेचीदा होता दिखाई दे रहा है. अगर दोनों के बीच सहमति बनती है तो ग्रीस शरणार्थियों को वापस तुर्की भेज सकता है. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टों में तुर्की को शरणार्थियों के लिए असुरक्षित जगह बताया गया है. ऐसे में मानवाधिकार संगठन और संयुक्त राष्ट्र तुर्की और यूरोपीय संघ के बीच ऐसे समझौते की निंदा कर रहे हैं.

एसएफ/एमजे(डीपीए)

खूबसूरत द्वीप पर शरणार्थियों की लहर

आश्रय

एक बड़ा जहाज "इलेफ्थेरियोस वेनिजेलोस" अब एक आपातकालीन बसेरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. एथेंस सरकार ने इस जहाज को चार्टर किया है जिसमें 2,500 लोगों को रखा जा सकता है. इसके अलावा यहां शरणार्थियों का रजिस्ट्रेशन केंद्र भी बनाया गया है. ग्रीक मेनलैंड में जाने की आज्ञा मिलने के लिए पहले रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है.

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खुलते रास्ते

यहां जहाज पर ही शरणार्थियों को कुछ दिनों तक रखने का इंतजाम है. बाहर से आने वाले लोग जब रजिस्ट्रेशन करा लेते हैं और उनके पास सही कागजात हों, तो उसके बाद शरणार्थियों को ग्रीस मेनलैंड में आश्रय दिया जा सकता है. लेकिन कई लोगों के लिए ग्रीस केवल एक ट्रांजिट है. वे ग्रीस के रास्ते पश्चिमी यूरोप के दूसरे देशों में जाना चाहते हैं.

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केवल सीरियाई

जहाज के बाहर रात रात भर खड़े रह कर शरण लेने के इच्छुक लोग इंतजार करते हैं. सुरक्षा कारणों से ग्रीक प्रशासन ने केवल सीरिया से आए शरणार्थियों को ही जहाज पर रखने का फैसला किया है. इसका मकसद अलग अलग देशों से आए लोगों के बीच विवाद भड़कने से रोकना है.

खूबसूरत द्वीप पर शरणार्थियों की लहर

संकटग्रस्त इलाकों से

ग्रीस के कॉस द्वीप पर दुनिया के कई देशों से लोग पहुंच रहे हैं. आधे से अधिक लोग यहां सीरिया से पहुंचे हैं. इसके अलावा अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इराक और ईरान से भी कई लोग वहां आते हैं. माली, एरिट्रिया और सोमालिया जैसे अफ्रीकी देशों से भी कई शरणार्थी यहां पहुंचे हैं.

खूबसूरत द्वीप पर शरणार्थियों की लहर

आसान यूरोप यात्रा

ग्रीस के कॉस द्वीप से तुर्की का तट (तस्वीर में पीछे) केवल 4 किलोमीटर दूर है. सीरिया और दूसरे देशों के लोग पहले तुर्की पहुंचते हैं. इस्तांबुल के तट से वे छोटी छोटी नावों पर सवार होकर यूरोप पहुंचने की कोशिश करते हैं.

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अंतत: ईयू में

यह आदमी (तस्वीर में) ईरान से निकलकर तमाम परेशानियां झेलता हुआ ईयू पहुंचा. ग्रीस के कॉस द्वीप पर अपनी पत्नी और बच्चे के साथ सकुशल पहुंचने पर उसके खुशी के आंसू निकल पड़े. लेकिन उसे पता नहीं कि यह खुशी जल्दी ही शरण की कई मुश्किलों में उलझ कर खो जाने वाली है.

खूबसूरत द्वीप पर शरणार्थियों की लहर

बेघर

हर दिन कॉस द्वीप पर 600 से 800 लोग पहुंच रहे हैं. पिछले हफ्ते तक ही कुल 30 हजार निवासियों वाले इस छोटे से द्वीप पर करीब 7,000 रिफ्यूजी पहुंच चुके थे. कई रिफ्यूजियों को कहीं भी सिर छुपाने की जगह नहीं मिली. कहीं छोटे टेंट लगाए गए तो कई लोग खुले आसमान के नीचे ही रह रहे हैं.

खूबसूरत द्वीप पर शरणार्थियों की लहर

कई सारे परिवार

काफी समय से कॉस में सीरियाई युवाओं का आना लगा था. लेकिन हाल के कुछ महीनों में लड़कियां, महिलाएं, छोटे बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी कॉस पहुंची हैं. यहां का दुश्वारियों भरा जीवन इन परिवारों के लिए और भी मुश्किल है.

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