जर्मन संसद बुंडेसटाग के लिए आज मतदान

जर्मनी के चुनावी समर में अंतिम फैसले की घड़ी आ गयी है. जर्मनी के छह करोड़ से ज्यादा लोग 42 पार्टियों के 4828 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करने के लिए 88,000 बूथों पर वोट डाल रहे हैं.

जर्मनी के समय के अनुसार सुबह 8 बजे से शुरू हुआ मतदान शाम छह बजे तक चलेगा और उसके थोड़ी देर बाद ही नतीजों के रुझान आने शुरू हो जायेंगे. चुनाव की प्रक्रिया आसानी से पूरी करने के लिए सरकारी कर्मचारियों के साथ ही 6 लाख से ज्यादा स्वयंसेवी भी लगे हैं जो लोगों को बैलट पेपर देने से लेकर मतपत्रों को गिनने तक के काम में अधिकारियों की मदद करेंगे.

जर्मनी में चुनाव की सरगर्मी सड़कों पर ज्यादा नजर नहीं आती, लैंप पोस्ट जरूर नेताओं के पोस्टर से भरे पड़े हैं और जगह जगह बड़े कटआउट भी नजर आते हैं, लेकिन नारेबाजी, बड़ी बड़ी रैलियों जैसा बहुत कुछ नजर नहीं आता.

चुनाव से ठीक एक दिन पहले राजधानी बर्लिन के लोग सर्द हवाओं और हल्की बूंदाबांदी के बीच मैराथन की मस्तियों में डूबे नजर आ रहे थे. मैराथन की वजह से जगह जगह सड़कें बंद थी और ऐतिहासिक ब्रांडेनबुर्ग गेट और जर्मन संसद राइष्टाग के पास लोगों का भारी जमावड़ा लगा था, मैराथन के प्रतिभागियों का हौसला बढ़ाने के लिए. अंतिम मुकाबला रविवार को ही है और जर्मनी के बाहर के लोगों को यह भी थोड़ा अटपटा लग सकता है कि ऐन चुनाव के दिन भी राजधानी बर्लिन मैराथन में डूबा है.

जर्मन लोगों की चुनाव में दिलचस्पी बाहर से भले ही नजर ना आए लेकिन अंदर ही अंदर काफी हलचल है. तुर्की, सीरिया, उत्तर कोरिया और अमेरिका से लेकर शरणार्थी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और दूसरे तमाम मुद्दे हैं जिन के आधार पर वोटरों को लुभाने की कोशिश हो रही है.

जर्मन लोगों के लिए इस बार के चुनाव में प्रमुख मुद्दा क्या है? दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ यूरोपीयन स्टडीज की प्रोफेसर और जर्मन मामलों की विशेषज्ञ उम्मु सलमा बावा कहती हैं, "सबसे बड़ी बात है कि तीन कार्यकाल पूरा करने के बाद भी चांसलर अंगेला मैर्केल के सामने नेतृत्व की कोई बड़ी चुनौती नहीं दिख रही है. एसपीडी के मार्टिन शुल्त्स शुरुआत में जरूर थोड़े आक्रामक लगे थे लेकिन अब उनकी स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं दिख रही. और चुनाव के लिए दूसरा मुद्दा है शरणार्थी. इस बार के चुनाव में आसार है मतदाता इन्हीं दो मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करेंगे.” इन दिनों प्रोफेसर सलमा बावा जर्मनी के दौरे पर ही हैं.

मैर्केल अपने चुनावक्षेत्र में

जर्मनी में कई दशकों से रह रहे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक आरिफ नकवी का कहना है, "चांसलर मैर्केल ने शरणार्थियों के लिए जर्मनी का दरवाजा खोलने के साथ ही उनके लिए बहुत से काम किये हैं लेकिन इसी बात ने पारंपरिक जर्मन लोगों को नाराज भी किया है, बहुत से जर्मन लोग शरणार्थियों को एक समस्या और अपने संसाधनों का अवांछित साझीदार भी मान रहे हैं, लोगों की नाराजगी जर्मन चुनाव में सत्ताधारी दलों की बड़ी चिंता होगी.”

चुनाव में भले ही 40 से ज्यादा पार्टियां हिस्सा ले रही हैं लेकिन मुख्य मुकाबले में सात पार्टियों का ही दबदबा है. सत्ताधारी सीडीयू और उसकी बवेरियाई सहयोगी पार्टी सीएसयू, समाजवादी एसपीडी, उदारवादी एफडीपी, धुर दक्षिणपंथी एएफडी, लेफ्ट पार्टी डी लिंके और पर्यावरणवादियों की ग्रीन पार्टी.

चुनावी सर्वेक्षणों में सत्ताधारी सीडीयू और सीएसयू 34 फीसदी वोटों के साथ सबसे आगे बतायी जा रही है जबकि मौजूदा सत्तादारी गठबंधन में शामिल एसपीडी के 21 फीसदी मतों के साथ दूसरे नंबर पर रहने की उम्मीद जतायी गयी है.

इस वक्त सबकी निगाहें तीसरे नंबर पर आने वाली पार्टी पर टिकी हैं. 2013 से अस्तित्व में आयी अल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड को 13 फीसदी मतों के साथ तीसरे नंबर पर रहने की बात सर्वेक्षणों में कही जा रही है. अगर सर्वेक्षण सच साबित हुए तो यह पार्टी राष्ट्रीय संसद में प्रवेश कर जाएगी और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यह पहला मौका होगा जब कोई धुर दक्षिणपंथी पार्टी संसद में पहुंचेगी.

आखेन में एसपीडी की चुनाव सभा

जर्मनी में मुख्यधारा की पार्टियों की चिंता सिर्फ इतनी ही नहीं है, हाल में हुए प्रांतीय चुनावों में एएफडी ने चुनावी सर्वेक्षणों को पीछे छोड़ कई राज्य असेंबलियों में अपनी जगह बनायी है और वहां उलट फेर किया है. इनमें चांसलर मैर्केल का गृहराज्य भी शामिल है.

एएफडी ने सीडीयू के साथ ही एसपीडी के वोटों में भी सेंध लगायी है और इस वजह से चिंता दोनों खेमों में है. शनिवार को चांसलर अंगेला मैर्केल अपने गृह प्रांत मैक्लेनबुर्ग में रहीं तो उनके प्रतिद्वंद्वी मार्टिन शुल्त्स अपने घर वुरसेलेन के पास आखेन में थे. दोनों ने लोगों से एएफडी को वोट नहीं देने की अपील की है. 

पिछली बार के चुनाव में करीब 29 फीसदी लोगों ने वोट नहीं दिया था. इस बार यह आंकड़ा 34 फीसदी रहने की आशंका जतायी जा रही है और विश्लेषकों का मानना है कि अगर ऐसा हुआ तो चांसलर मैर्केल की पार्टी सीडीयू को सीधा नुकसान हो सकता है. 

विश्लेषकों का मानना है कि एएफडी के समर्थक गुस्से और जोश में हैं और वे वोट देने जरूर आयेंगे. दूसरी तरफ सीडीयू और एसपीडी के पारंपरिक वोटर तो उनके साथ हैं लेकिन जो वोटर अभी तक अपना मन नहीं बना पाये हैं वे वोट नहीं देने का फैसला भी कर सकते हैं.

उदारवादी एफडीपी को इस बार के चुनाव में पांच फीसदी से ज्यादा वोट मिलने के आसार हैं हालांकि पार्टी एएफडी से पीछे ही रहेगी, ऐसा चुनावी सर्वे बता रहे हैं. पिछली बार के चुनाव में पार्टी पांच फीसदी वोटों की सीमा को नहीं लांघ पायी थी. इस वजह से इसे संसद में जगह नहीं मिल सकी.

वॉलंटियर्स के बिना नहीं हो सकते जर्मनी में चुनाव

वॉलंटियर्स का इम्तिहान

24 सितंबर का दिन न केवल राजनीतिज्ञों की परीक्षा का दिन है बल्कि उस दिन वॉलंटियर्स का भी इम्तिहान है. चुनाव के दिन मतदान केंद्र आम जनता के लिए भले ही सुबह 8 बजे से खुलेंगे लेकिन वॉलंटियर व्यवस्था बनाने के लिए समय से पहले पहुंचेंगे और शाम 6 बजे के बाद तक भी इन्हें काम करना होगा.

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वालंटियर का चुनाव

जो भी व्यक्ति जर्मनी में मतदान की योग्यता रखता है, वह चुनावों में वॉलंटियर बन सकता है. इन्हें नगर प्रशासन सीधे तौर पर चुन सकता है. लेकिन अगर चुना गया व्यक्ति वॉलंटियर नहीं बनना चाहता तो उसे अपनी मनाही का ठोस कारण देना होता है. इसके अतिरिक्त वॉलंटियर बनने के इच्छुक लोग राज्य चुनाव आयोग या इससे जुड़े स्थानीय दफ्तर में भी जाकर अपना नाम दे सकते हैं.

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ट्रेनिंग और जिम्मेदारी

चुनाव से कुछ दिन पहले, इन वॉलंटियर्स की ट्रेनिंग होती है और उन्हें चुनाव से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं समेत एक वॉलंटियर के रूप में उनकी जिम्मेदारी से अवगत कराया जाता है. ये वॉलंटियर किसी राजनीतिक दल के सदस्य भी हो सकते हैं लेकिन चुनाव प्रक्रिया के दौरान इन्हें निष्पक्षता दिखानी होती है.

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मतदान केंद्र पर वॉलंटियर

इस बार के आम चुनावों में तकरीबन 6.50 लाख वॉलंटियर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन वॉलंटियर्स को देश के 88 हजार मतदान केंद्रों पर नियुक्त किया गया है. इनमें से 73,500 मतदान केंद्र सामान्य केंद्र हैं जो जनता के लिए खुले होंगे, वहीं 14,500 ऐसे मतदान केंद्र हैं जिन्हें पोस्टल बैलट से किये गये मतों का ब्यौरा रखेने के बनाया गया है.

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मेहनताने की दर

करीब पांच से नौ वॉलंटियर एक मतदान केंद्र पर रहेंगे. इन्हें अपने खर्चों के लिए लगभग 35 यूरो का भुगतान किया जाएगा, हालांकि यह भुगतान इससे अधिक भी हो सकता है. भुगतान दर का निर्णय मतदान केंद्रों पर निर्भर करती है.

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मतदान के दौरान

मतदान प्रक्रिया शुरू होने से पहले वॉलंटियर दल यह सुनिश्चित करता है कि सारी व्यवस्था ठीक है या नहीं, सारे मतदान पत्र खाली है या नहीं. जैसे ही मतदान शुरू होता है वॉलंटियर की जिम्मेदारी होती है कि वह हर एक मतदाता को मतपत्र समेत लिफाफा दे. जर्मनी में मतदान आज भी पेपर-पेन से होता है. मतदान के पहले मतदाताओं की पहचान भी सुनिश्चित की जाती है.

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मतदान पूरा होने के बाद

शाम छह बजे जब मतदान प्रक्रिया समाप्त हो जाती है. इसके बाद वॉलंटियर्स मतदान पेटियों को खोलते हैं और लिफाफों से मतपत्र निकाले जाते हैं. पूर्व निर्धारित प्रक्रिया अनुसार इन मतों को क्रम मे लगाया जाता है जिसके बाद तय होता है कि कोई मत वैध है या अवैध है. यहां से मतों की गिनती शुरू होती है.

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अंतिम चरण

आखिरी चरण में मतपत्रों की संख्या की तुलना उन लोगों की संख्या के साथ की जाती है जिन्होंने उस विशेष मतदान केंद्र पर अपना मत डाला था. हर नागरिक के पास मतगणना प्रक्रिया को देखने और इसपर नजर रखने की अनुमति होती है. असल में ये वॉलंटियर्स भी एक दूसरे की निगरानी ही करते हैं.

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नतीजों की घोषणा

मतदान के नतीजों को मतदान केंद्र, स्थानीय चुनाव कार्यालय को फोन या मैसेज के जरिये भेजते हैं. जिन्हें इसके बाद आगे भेजा जाता है और अंत में संघीय कार्यालय के पास पूरा ब्यौरा आता है. उसके बाद ही विजेता की घोषणा होती है.

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