टैनिंग सैलून से त्वचा कैंसर का खतरा

शरीर का रंग ब्राउन करने के लिए तरह- तरह की तकनीकों का सहारा दुनिया भर में लिया जाता है. यूरोप और अमेरिका में टैनिंग बेड सैलून काफी प्रचलित हैं.

ताजा अध्ययन में इस बात का पता चला है कि टैनिंग बेड या टैनिंग सैलून का अधिक इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में स्किन कैंसर का खतरा अधिक होता है. टैनिंग सैलून का इस्तेमाल यूरोपीय देशों में लोग करते हैं ताकि उनकी त्वचा का रंग सफेद से ब्राउन हो जाए.

हारवर्ड मेडिकल स्कूल की टीम ने 7 लाख 30 हजार के बारे में अमेरिकी नर्सो से से मिली जानकारी के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है. इसमें 20 वर्ष के दौरान टैनिंग बेड या सैलून का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं को शामिल किया गया है. इन महिलाओं में स्किन कैंसर सेल विकसित होने की संभावना अधिक पाई गई है.

इसके पहले हुए कई सारे अध्ययनों में इस बात के संकेत दिए गए थे कि टैनिंग बेड का स्किन कैंसर से संबंध है. इसमें भी सबसे अधिक बेसल सेल कार्सिनोमा की संभावना अधिक होती है.

शोध करने वाले जियानी हाल और उनके सहयोगियों ने कैंसर निदान की पत्रिका में लिखा है कि " अध्ययन में हमें पता चला है कि हाई स्कूल-कॉलेज के दिनों से 25 से 36 साल की उम्र तक लगातार टैनिंग बेड का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में (कैंसर के प्रकारों में) बेसल सेल कार्सिनोमा, स्कवैमस सेल कार्सिनोमा और मेलेनोमा की संभावना अधिक होती है."

उन्होंने लिखा है कि हमारा अध्ययन और जानकारी इस बात के सबूत देते हैं कि टैनिंग बेड से त्वचा के कैंसर का खतरा अधिक होता है.

वह महिलाएं जिन्होंने हाईस्कूल के समय से 35 वर्ष की उम्र तक साल में 4 बार टैनिंग बेड का इस्तेमाल किया है उनमें स्किन कैंसर के लिए जिम्मेदार बेसल सेल कार्सिनोमा 15 प्रतिशत पाया गया. बेसल सेल कार्सिनोमा धीरे बढ़ने वाले कैंसर का एक प्रकार है.

इसी तरह का जोखिम मलेनोमा और स्कवैमस सेल में भी पाया गया. लेकिन बेसल सेल की तुलना में इनकी संख्या अधिक सामने नहीं आई.

7 लाख 30 हजार महिलाओं में से 349 में ही मेलेनोमा के साथ स्किन कैंसर का इलाज किया गया. जबकि 5 हजार 500 महिलाओं में टैनिंग सेल कार्सिनोमा का प्रभाव पाया गया. शिकागो की नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जून राबिन्सन के अनुसार" यह बहुत ही बेहतर तरीके से किया गया अध्ययन है. इससे पूर्व में किए गए अध्ययनों के दावों को भी बल मिलता हैं कि टैनिंग सैलून स्किन कैंसर के लिए जिम्मेदार हैं. उन्होंने कहा कि कई लोग साल में दस, बीस या उससे भी अधिक बार टैनिंग सेलून का इस्तेमाल करते हैं. यह कैंसर जैसे बड़े खतरे का करण बनते हैं. ऐसी महिलाएं जिन्होंने वर्ष में कम से कम 7 बार या उससे अधिक टैनिंग बेड का इस्तेमाल किया था, उनमें बेसल सेल कार्सिनोमा की संभावना 73 प्रतिशत अधिक पाई गई.

हान और उनकी टीम ने इस रिपोर्ट के बाद टैनिंग सेलून पर प्रतिबंध और उनका उपयोग रोकने के लिए कानून बनाने की सलाह भी दी है.

उधर कई देशों ने 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों के टैनिंग बेड का उपयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया है. पिछले साल ही कैलिफोर्निया में भी इसी तरह के प्रतिबंध लागू कर दिए गए.

क्या है टैनिंग बेड....

यूरोप और यूएस में स्किन का कलर ब्राउन होना काफी अच्छा माना जाता है. अपनी त्वचा का रंग गहरा करने के लिए लोग तरह-तरह के जतन करते रहते हैं. लेकिन वे इसके लिए कुदरती तरीकों के बजाय दूसरे तरीकों का इस्तेमाल अधिक करते हैं. इसकी वजह एक है कि यूरोपीय देशों में सिर्फ तीन या चार महीने ही सूरज निकलता है इसलिए लोगों को धूप बहुत कम मिलती है. लोग टैनिंग करना इसलिए भी पसंद करते हैं कि इसे फिटनेस, खूबसूरती का प्रतीक माना जाता है. इसमें शरीर पर कृत्रिम तरीके से विशेष रोशनी डाली जाती है. इससे शरीर का रंग ब्राउन होने लगता हैं. युरोप और यूएस में बडे पैमाने पर इसके सैलून खुले हैं.

रिपोर्ट रायटर्स/ जितेन्द्र व्यास

संपादन: आभा एम

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