ट्रैवल बैन से फिर याद आया वो 1944 का मुकदमा

ट्रंप के ट्रैवल बैन पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी. लेकिन इससे 1944 के उस फैसले की यादें ताजा हो गईं जब एक झटके में सवा लाख जापानी अमेरिकियों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया था.

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कई मुस्लिम देशों के नागरिकों के अमेरिका में आने पर प्रतिबंध को जायज ठहराया है. एक ओर ट्रंप प्रशासन इसे बड़ी जीत मान रहा है, तो दूसरी तरफ आलोचक इसकी निंदा कर रहे हैं. पहले निचली अदालतों ने ट्रंप प्रशासन के फैसले को असंवैधानिक करार दिया था. लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को पलटते हुए ट्रैवल बैन को सही ठहराया. ट्रैवल बैन के तहत ईरान, लीबिया, सोमालिया, सीरिया और यमन के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगाई गई है.

आलोचक अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की तुलना दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1944 के एक फैसले से कर रहे हैं, जिसे अमेरिकी न्यायपालिका के इतिहास में सबसे बुरे फैसलों में से एक माना जाता है. पर्ल हार्बर पर हमले के जबाव में लाए गए उस अध्यादेश को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उचित ठहराया था जिसके तहत करीब 1.20 लाख जापानी मूल के अमेरिकियों को कैद कर लिया गया था. 

यूं लगाया अमेरिका ने ट्रैवल बैन

पूरा किया वादा

चुनाव प्रचार के दौरान डॉनल्ड ट्रंप ने कई वायदे किए थे जो नस्लवाद को बढ़ावा देते दिखते थे. राष्ट्रपति पद संभालने के बाद उन्होंने एक एक कर अपने वायदों को पूरा करना शुरू किया. ट्रंप ने सबसे पहले जो काम किए, ट्रैवल बैन उन्हीं में से एक है. 27 जनवरी 2017 को उन्होंने कार्यकारी आदेश 13769 पर दस्तखत किए.

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मुस्लिम बैन

इस ट्रैवल बैन के अनुसार इराक, ईरान, लीबिया, सोमालिया, सूडान और यमन से आने वाले वाले लोगों पर 90 दिन के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके अलावा सीरिया से आने वाले शरणार्थियों पर पूरी तरह रोक लगी और दुनिया भर में कहीं से भी आने वाले शरणार्थियों को 120 दिन के लिए रोक दिया गया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे "मुस्लिम बैन" के रूप में देखा गया.

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कड़ा विरोध

हजारों लोग ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन करने सड़कों पर उतरे. न्यूयॉर्क के जेएफके एयरपोर्ट और लॉस एंजेलेस के एलएएक्स हवाई अड्डे पर भी खूब प्रदर्शन देखे गए. कई अमेरिकी नेताओं समेत नोबेल पुरस्कार विजेता, संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी, कैथोलिक चर्च के पादरियों और यहूदी संस्थाओं ने भी ट्रंप के फैसले की आलोचना की. सबने माना कि यह मुसलमानों के साथ भेदभाव है.

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दर्जनों मुकदमे

ट्रंप के आदेश के खिलाफ अमेरिका की अदालतों में करीब 50 मुकदमे दायर किए गए. पहले न्यूयॉर्क के एक जज ने फैसले पर अस्थाई रूप से रोक लगाई और फिर 9 फरवरी 2017 को वॉशिंगटन राज्य के जज ने भी देश भर में इस आदेश के पालन पर अस्थाई रोक लगा दी. सरकार ने इसके खिलाफ अपील की लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया.

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नया आदेश

अदालती मुकदमों को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने आदेश में कुछ फेरबदल किए. इस बार कानून को ध्यान में रखा गया. अमेरिका में रहने वाले विदेशियों को अपने परिवारों से मिलने के लिए देश से बाहर जाने और वहां से लौटने की अनुमति मिली. इसके अलावा जिन लोगों को पहले से अमेरिका आने के लिए वीजा मिल चुका था, उसे भी रद्द नहीं किया गया.

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कानूनी दांवपेच

अलग अलग अदालतों में मुकदमे चलते रहे. 15 मार्च 2017 को हवाई के एक जज ने नए आदेश पर अस्थाई रोक लगाई. वहीं मैरीलैंड में भी ऐसा ही हुआ. जून की शुरुआत में सरकार ने अदालत के फैसले के खिलाफ अपील की और 26 जून 2017 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने आंशिक रूप से खत्म करने का फैसला सुनाया. पूरे मामले पर आगे भी पेशियां होती रही.

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फिर हुए बदलाव

सितंबर 2017 में ट्रंप प्रशासन ने एक बार फिर बदलाव किए. इस बार इराक और सूडान को प्रतिबंधित देशों की सूची से अलग किया गया और वेनेजुएला और उत्तर कोरिया जैसे गैर मुस्लिम देशों को इसमें जोड़ा गया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे ट्रंप का सोचा समझा कदम माना गया ताकि प्रतिबंध को "मुस्लिम बैन" के रूप में ना देखा जाए.

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अंतिम फैसला

26 जून 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने बैन को कायम रखने के पक्ष में फैसला सुनाया. चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बात के पुख्ता सबूत दिए हैं कि बैन राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में लागू किया गया है. दुनिया भर में अमेरिकी अदालत के इस फैसले की कड़ी आलोचना हो रही है.

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जहरीला सांप

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की आप्रवासियों के बारे में क्या सोच है, इस पर कभी कोई संदेह नहीं रहा. वे खुल कर आप्रवासन के खिलाफ बोलते रहे हैं. एक समारोह में उन्होंने जहरीले सांप के बारे में कविता सुनाई और साफ तौर पर आप्रवासन से उसकी तुलना की. हालांकि यह भी सच है कि ट्रंप के दादा किसी जमाने में आप्रवासी बन कर ही जर्मनी से अमेरिका आए थे.

ट्रैवल बैन के मुद्दे पर 'ट्रंप बनाम हवाई' मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट की ज्यूरी के 9 में से 5 जजों ने फैसला दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए कांग्रेस ने मौजूदा आप्रवासी कानून के तहत राष्ट्रपति को अमेरिका में आने वाले लोगों की संख्या सीमित करने का व्यापक अधिकार दिया है. इस पर दूसरे पक्ष की तरफ से दलील दी गई कि ट्रंप प्रशासन का ट्रैवल बैन अध्यादेश धर्म और नागरिकता के आधार पर भेदभाव करता है जो असंवैधानिक है. 

अब लाइव
01:26 मिनट
दुनिया | 12.05.2016

ट्रंप के भारतीय समर्थक

फैसले का विरोध

जस्टिस सोनिया सोटोमेयर ने ज्यूरी के फैसले से असहमति जताते हुए कोर्ट में दूसरे विश्व युद्ध के समय के एक मुकदमे का जिक्र किया, जब राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट के एक विवादित अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था. इसके तहत उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना अमेरिका में रहने वाले जापानी मूल के लोगों को कैद कर लिया गया था जबकि उनमें से ज्यादातर अमेरिकी नागरिक थे. ट्रंप की तरह ही रूज़वेल्ट ने भी अपने अध्यादेश की वजह राष्ट्रीय सुरक्षा को बताया था.

कोरेमात्सु बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका नामक के इस मुकदमे को अमेरिकी सिविल लिबर्टीज यूनियन (एसीएलयू) ने जापानी अमेरिकी नागरिकों की तरफ से 1942 में दायर किया था और सरकार के इस अध्यादेश की संवैधानिकता पर सवाल उठाया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ज्यूरी में तीन के मुकाबले छह जजों ने यह कह कर अध्यादेश को मंजूरी दे दी कि इन लोगों को नस्ल के आधार पर नहीं बल्कि "सैन्य जरूरत" के मद्देनजर कैद किया जा रहा है.ट्रंप के फैसले से ऐसे निपटेगी हार्ली डेविडसन

दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अप्रवासी संगठनों में भारी रोष है. एसीएलयू में आप्रवासी अधिकारों से जुड़े प्रोजेक्ट के निदेशक ओमार जदावत का कहना है कि चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स का फैसला इतिहास में सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक माना जाएगा. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कोरेमात्सु बनाम अमेरिका फैसले की गलती को दोहरा रहा है. 

सूडान से अमेरिका आए और प्रदर्शन कर रहे मोहम्मद अबुकार कहते हैं कि कोर्ट का फैसला पूरी तरह नस्लवादी है. वहीं कोरेमात्सु का जिक्र करते हुए एक अन्य 33 वर्षीय प्रदर्शनकारी होदा हवा का कहना है कि "कोर्ट तब भी गलत थी और आज भी गलत है."

अपने लोग ही ट्रंप से हो रहे खफा

कितने सही ट्रंप

सीएनएन के एक सर्वेक्षण मुताबिक, अमेरिका के सिर्फ 35 प्रतिशत लोगों ने ही ट्रंप को सही ठहराया है. सर्वेक्षण के मुताबिक मार्च में कार्यभार संभालने के तुरंत बाद 45 प्रतिशत लोगों ने ट्रंप को पसंद किया था, लेकिन अब उनकी लोकप्रियता में भारी कमी आई है.

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पसंद नहीं तरीका

सर्वे में शामिल 59 फीसदी लोगों ने कहा कि राष्ट्रपति के तौर पर वे ट्रंप के कार्य करने के तरीके को पसंद नहीं करते. ये अब तक के किसी भी राष्ट्रपति को मिली सबसे कम रेटिंग है.

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इन्हें किया खूब पंसद

पहला साल आमतौर पर सभी अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए अब तक मोटा-मोटी बेहतर ही माना जाता रहा. पहले वर्ष में जॉर्ज डब्ल्यू बुश सीनियर को 86 प्रतिशत, जॉन एफ कैनेडी को 77 प्रतिशत, जॉर्ज डब्ल्यू बुश को 71 प्रतिशत और ड्वाइट आइजनहावर को 69 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया था.

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ट्रंप से रहे बेहतर

रिचर्ड निक्सन, जिमी कार्टर, बिल क्लिंटन और बराक ओबामा समेत अन्य पूर्व राष्ट्रपतियों को उनके कार्यकाल के पहले वर्ष में 50 फीसदी से ज्यादा लोगों ने सराहा था.

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घर में धाक

ट्रंप अपनी पार्टी में तो 85 फीसदी सहयोग जुटाने में कामयाब रहे लेकिन विरोधी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करते. महज 4 फीसदी डेमोक्रैट्स और 33 फीसदी ही निर्दलीय समर्थन उन्हें समर्थन देते नजर आते हैं.

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कितने लोग थे शामिल

14-17 दिसंबर के बीच हुए इस सर्वे में एक हजार से भी अधिक लोगों को शामिल किया गया. इन लोगों की फोन, मोबाइल या इंटरव्यू के जरिए राय ली गई.

वीसी/एके (डीपीए)

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