डूबते द्वीप में तैरते खेतों का सहारा

डूबते द्वीप में तैरते खेतों का सहारा

खतरे में ठिकाना

बंगाल की खाड़ी में जहां गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियां मिलती हैं, वहां एक बड़ा उपजाऊ डेल्टा क्षेत्र बनता है. लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्रस्तर ऊपर उठ रहा है, ज्यादा तूफान आने लगे हैं और इस इलाके के निवासियों का जीवन दिन पर दिन मुश्किल होता जा रहा है.

डूबते द्वीप में तैरते खेतों का सहारा

खेती छोड़ने को मजबूर

जब समुद्र का खारा पानी खेतों में घुस जाता है तो जमीन उपजाऊ नहीं रहती. इसी कारण यहां के किसान खेती छोड़ जीविका चलाने के किसी और तरीके की तलाश में हैं. कुछ छोटा मोटा काम करने शहरों का रुख करते हैं और वहां की फैक्ट्रियों में सस्ते श्रमिक बन जाते हैं. कुछ यूरोपीय बाजारों के लिए झींगा उगा रहे हैं, जिसके कारण तटीय डेल्टा क्षेत्र को और ज्यादा नुकसान पहुंचता है.

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पारंपरिक तकनीक की वापसी

कुछ किसान परिवार एक पारंपरिक शैली की खेती की ओर लौट रहे हैं. वे पानी पर तैरने वाले पौधों और तिनकों को बुनकर एक तैरने वाला प्लेटफॉर्म बनाते हैं. फिर पानी पर तैरती हुई इस सतह का इस्तेमाल फसलों को उगाने के लिए करते हैं. सैकड़ों सालों से अस्तित्व में रही यह शैली इस समय किसी नवीनतम तकनीक की तरह वापस लौटी है.

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पूरे परिवार का काम

महिलाओं समेत परिवार के सब सदस्य इन तैरते प्लेटफॉर्म को बनाने का काम करते हैं. पिरोजपुर नामकी जगह की यह महिला किसान दिखा रही है कि उसने तैरते खेतों में बोने के लिए कैसे नन्हें पौधे तैयार किए हैं.

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ऑर्गेनिक और दोबारा काम आने वाले

पत्तेदार सब्जियां, भिंडी, लौकी, बैंगन, कद्दू और प्याज जैसे पौधे इन तैरते खेतों में बहुत अच्छी तरह उगते हैं. पानी पर उगाने में कीटनाशकों का भी कम इस्तेमाल करना पड़ता है. ऐसे तैरते प्लेटफॉर्म करीब तीन महीने तक काम करते हैं फिर इन्हें खींच कर किनारे पर लाकर तोड़ा जाता है और उर्वरक की तरह इस्तेमाल किया जाता है.

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कल के बेकार आज बने वरदान

पानी पर तैरने वाले प्लेटफॉर्म बनाने में जो पौधे सबसे ज्यादा काम आ रहे हैं, उनमें प्रमुख है जलकुम्भी. मूल रूप से अमेजन के जंगलों से आई जलकुम्भी बहुत तेजी से फैलती है और दुनिया में कई जगहों पर लोगों के लिए परेशानी बनी हुई है. लेकिन खारे पानी में भी टिकने वाला और सतह पर ही तैरने वाला यह पौधा यहां तो किसी वरदान से कम नहीं.

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जीवित बेड़े

1988 की बाढ़ में हरी पोदो और उनका परिवार जलकुम्भी से बने बेड़े पर दो महीने तक रहा था. वे बताते हैं, "एक तरफ हम लोग रहते थे और दूसरी तरफ जानवर रखते थे." जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी बाढ़ के मामले आजकल काफी बढ़ गए हैं.

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इलाके वापस लेना

इस डेल्टा के आसपास बसे और समुदाय भी पानी में डूब गई अपनी जमीन की भरपाई पानी की सतहों पर कब्जे से कर रहे हैं. नाजिर बाजार नामका पूरा गांव ही दलदली जमीन पर मिट्टी भर कर उसके नीचे से पानी निकाल कर बसाया गया है. इस तरह वहां खेती और रहने लायक जमीन तैयार की गई.

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प्रकृति के करीब

नाजिर बाजार का एक निवासी आसमान की तरफ देख कर यह अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा है कि बारिश कब आ सकती है. उसकी नाव पर ऐसी ही नई जमीन पर उगाई गई केले की खेप रखी है. जो नहरें गांव की धरती से पानी को बाहर निकालती है, वही यातायात का आधारभूत नेटवर्क भी स्थापित करती है.

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ढलने की कला

नाजिर बाजार के किसान गियासुद्दीन सदर बताते हैं कि कैसे बीते सालों में उन्होंने अपने घर को बदलते देखा है. लेकिन फिर भी उन्होंने भविष्य को लेकर उम्मीद नहीं छोड़ी है, "जो भी हो हम बदलते माहौल के हिसाब से ढलना सीख ही लेते हैं." (याकोपो पासोती/आरपी)

जलवायु परिवर्तन के साये में जी रहे बांग्लादेशी किसान अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए खेती के प्राचीन तौर तरीकों की ओर लौट रहे हैं. देखिए बाढ़ में डूबे इलाकों में उभरी ये नई तस्वीरें.

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