"तुम भी जर्मनी हो, अली"

पेरिस पर हुआ हमला जर्मन समाज के लिए भी एक कसौटी जैसा है. देश की मुस्लिम आबादी को भी इस पर खरा उतरना होगा. डॉयचे वेले के फोल्कर वाग्नर का कहना है कि उन्हें खुलकर जर्मनी से जुड़ना होगा.

पेरिस पर हुआ हमला जर्मन समाज के लिए भी एक कसौटी जैसा है. देश की मुस्लिम आबादी को भी इस पर खरा उतरना होगा. डॉयचे वेले के फोल्कर वाग्नर का कहना है कि उन्हें खुलकर जर्मनी से जुड़ना होगा.

पेरिस का बर्बर हमला बहुत ही गलत समय पर जर्मनी पहुंचा है. ड्रेसडेन से इस्लाम के खिलाफ एक धुंधला सा डर फैलने लगा है, जो दुर्भाग्यवश एक जातिवादी माहौल बना रहा है. सबसे बढ़कर पेगीडा आंदोलन में हिस्सा लेने वाले सीधे सादे लोगों को अब इस्लाम के खिलाफ अपनी तर्कहीन समीक्षा उचित लगने लगी है. बेशक इसका असर हम पर भी पड़ेगा. नेता, नगरपालिका, शिक्षक, पत्रकार, सरकारी अधिकारी या वे लोग जो समाज को देखते हुए शिरकत करना चाहते हैं, उन सब पर असर होगा.

हां यह सच है कि जर्मन राष्ट्र और समाज कुल मिला कर पड़ोसी देश फ्रांस से ज्यादा मजबूत स्थिति में है. फ्रांस की तरह हमारा किसी मुस्लिम देश में उपनिवेश वाला अतीत नहीं है, हमारी अर्थव्यवस्था स्थिर है, बेरोजगारी दर कम है और पेरिस और मारसे के शहरों के विपरीत बर्लिन, फ्रैंकफर्ट और म्यूनिख में समानांतर समाज दिखता है. और जहां फ्रांस पिछले कई सालों से अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा है, वहीं जर्मनी में हमने उसी दौरान अपनी एक अलग, सकारात्मक छवि बनाई है. कुल मिलाकर फ्रांस सर से पैर तक एक रोग का शिकार है, जबकि जर्मनी को हल्की सी कमजोरी है, जिसका नाम है पेगीडा.

पेगीडा पर लगाम

फ्रांस के नेशनल फ्रंट (एफएन) की अगर पेगीडा से तुलना करें तो सब साफ हो जाता है. विदेशी विरोधी एफएन फ्रांस की 25 फीसदी वोट पाने वाली उग्रदक्षिणपंथी पार्टी है, जिसकी तुलना जर्मनी की पुरानी एसपीडी पार्टी से की जा सकती है, जिसे इतना वोट मिलता है. यह अपने आप में काफी बुरा है. इसके विपरीत सैक्सनी के देशभक्त यूरोपीय बस मौजूदा वक्त की उपज हैं. भगवान का शुक्र है कि वे कोई पार्टी नहीं हैं, यानि समाज में उनकी कोई जगह नहीं है.

फ्रांस, ब्रिटेन या फिर इटली में उग्रदक्षिणपंथी पार्टियां भारी मत ले कर संसद में पहुंच जाती हैं, तब भी वहां के लोग उतना हल्ला नहीं करते, जितना कि जर्मनी में महज एक विदेशी विरोधी संगठन के बन जाने से हो जाता है. वरना इस बात का क्या मतलब है कि पेरिस और लंदन में मीडिया पिछले हफ्तों से छोटे से पेगीदा में इतनी रुचि दिखा रहा है.

जर्मन मुस्लिम और देशभक्ति

लेकिन जर्मनी के 490 लाख मुसलमानों पर भी देश में सांस्कृतिक सहिष्णुता की जिम्मेदारी है. हालांकि बैर्टेल्समन के ताजा सर्वे के अनुसार जर्मन नागरिकता वाले 90 फीसदी मुसलमान लोकतंत्र को सरकार चलाने की अच्छी व्यवस्था मानते हैं, लेकिन जिस देश में वे रहते हैं, काम करते हैं, अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं, उसके लिए दूसरी देशभक्ति रोजमर्रे में कम ही दिखती है.

यह सच है कि जर्मनों का विदशियों को स्वीकार करने और समाज में घुलने मिलने देने की तैयारी उस स्तर की नहीं है जैसी उत्तर अमेरिका में आप्रवासन वाले देश के रूप में है. लेकिन दबे हुए इस्लाम विरोध या परायों को अस्वीकार करने की ओर लगातार इशारा भी जर्मनी के मुसलमानों के लिए लंबे समय में मददगार नहीं है.

अपने देश के लिए

पेरिस के हमले पर मुस्लिम संगठनों का सड़कों पर उतरने का आह्वान भरोसा दिलाने वाला संकेत है. पेगीडा की रैलियों के जवाब में एक रैली और एकजुटता का संकेत. जर्मनी और उसकी कानूनी संरचना के साथ जुड़ाव का प्रदर्शन. और यह जॉन एफ कैनेडी की भावनाओं के अनुरूप है जिन्होंने 1961 में राष्ट्रपति का पद संभालते हुए मांग की थी, अमेरिकियों को यह नहीं पूछना चाहिए कि देश उनके लिए क्या कर सकता है, बल्कि यह कि वे देश के लिए क्या कर सकते हैं.


पेगीडा: जर्मन समाज की उथल पुथल

5 जनवरी 2015 यानि नए साल के पहले ही सोमवार की शुरुआत जर्मनी के कई शहरों में विरोध प्रदर्शनों के साथ हुई. जर्मनी के कई राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे इस्लाम विरोधी प्रदर्शन दिखाते है कि बड़ी संख्या में आप्रवासियों के मुद्दे पर देश बंटा हुआ है. आप्रवासन का समर्थन करने वाले लोग अनेकता में एकता की भावना को बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग के गठन की मांग कर रहे हैं.

पेगीडा: जर्मन समाज की उथल पुथल

जर्मनी के पूर्व में स्थित ड्रेसडेन शहर में हर हफ्ते रैलियां निकाली जा रही हैं. 22 दिसंबर 2014 की रैली में तो 17 हजार से भी ज्यादा लोग शामिल हुए. पेगीडा रैलियों का विरोध करने वाले कई गुट हैं. दिसंबर में पेगीडा ने अपना घोषणापत्र जारी कर "आपराधिक किस्म के शरणार्थियों और आप्रवासियों को बिल्कुल बर्दाश्त ना किए जाने" की मांग की.

पेगीडा: जर्मन समाज की उथल पुथल

जर्मनी के पूर्व में स्थित ड्रेसडेन शहर में हर हफ्ते रैलियां निकाली जा रही हैं. 22 दिसंबर 2014 की रैली में तो 17 हजार से भी ज्यादा लोग शामिल हुए. पेगीडा रैलियों का विरोध करने वाले कई गुट हैं. दिसंबर में पेगीडा ने अपना घोषणापत्र जारी कर "आपराधिक किस्म के शरणार्थियों और आप्रवासियों को बिल्कुल बर्दाश्त ना किए जाने" की मांग की.

पेगीडा: जर्मन समाज की उथल पुथल

'पश्चिम के इस्लामीकरण के खिलाफ यूरोप के राष्ट्रवादी' यानि पेगीडा के समर्थकों का मानना है कि इस्लामीकरण से ईसाई धर्म की संस्कृति और परंपराओं को खतरा है. वहीं हाल ही में उभरा यूरोप विरोधी दल 'अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' (एएफडी) खुद को जर्मन समाज के सच्चे प्रतिनिधियों के तौर पर पेश कर रहा है.

पेगीडा: जर्मन समाज की उथल पुथल

जर्मनी में आम लोगों के बीच इस मत को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है कि रिफ्यूजी आबादी की मदद करने में खर्च होने वाले धन के कारण जर्मन नागरिकों की पेंशन कम हो जाएगी और गरीबी फैलेगी.

पेगीडा: जर्मन समाज की उथल पुथल

हुम्बोल्ट यूनिवर्सिटी की सोशल साइंटिस्ट नाइका फोरुटान ने हाल ही के एक सर्वे का हवाला देते हुए बताया कि आधे से ज्यादा जर्मन अपने पड़ोस में मस्जिद बनाए जाने के खिलाफ हैं. वहीं 40 फीसदी का मानना है कि केवल जर्मन माता-पिता के बच्चों को ही जर्मन माना जाना चाहिए. वे बताती हैं कि जो लोग विदेशियों और प्रवासियों के बिल्कुल संपर्क में नहीं हैं वे उनका ज्यादा विरोध करते हैं.

पेगीडा: जर्मन समाज की उथल पुथल

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने नए साल के अपने संदेश में देश के नागरिकों से शरणार्थियों की मदद का आह्वान किया. उन्होंने जनता से शरणार्थियों और इस्लामीकरण का विरोध करने वाली पेगीडा रैलियों का विरोध करने की अपील की. केवल 2014 में ही जर्मनी में दो लाख से ज्यादा शरणार्थी अर्जियां आईं.

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