थाईलैंड में चुनाव से पहले सोशल मीडिया पर नए कानून की मार

थाईलैंड में "वॉर रूम" अधिकारी चुनाव प्रचार कानून के हनन की खोज में सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों के हजारों पोस्ट को खंगाल रहे हैं. कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कानून दुनिया के सबसे कठोर कानूनों में एक है.

वॉर रूम मॉनीटर सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट को खोज रहे हैं जो उनके अनुसार "झूठ फैलाते हैं, उम्मीदवारों को बदनाम करते हैं या अभद्र शब्दों का इस्तेामल करते हैं." चुनाव आयोग के उप महासचिव सावांग बूनमी का कहना है कि ये सब नए चुनाव कानून में प्रतिबंधित हैं.

चुनाव आयोग के वॉर रूम को रॉयटर्स को दिखाने के बाद अधिकारी ने बताया कि जब उन्हें मसलन फेसबुक पर कोई कानून का हनन करने वाला पोस्ट मिलता है, तो वे उसका प्रिंट निकाल कर उस पर तारीख स्टांप कर चुनाव आयोग और फेसबुक को देने के लिए रख लेते हैं ताकि फेसबुक से उसे हटाने को कहा जा सके.

सावांग का कहना है कि 24 मार्च को होने वाले चुनाव के लिए बनाए गए सख्त सोशल मीडिया कानून हाल के सालों में दूसरे देशों में हुए चुनाव में जालसाजी को रोकने का आवश्यक जरिया है. सावांग ने कहा, "जब हम किसी कंटेट को हटाने का आदेश देते हैं तो हम सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म से संपर्क करते हैं और वे खुशी से हमारे साथ सहयोग करते हैं और आदेशों का कुशलता से पालन करते हैं." सावांग का कहना है कि थाईलैंड सोशल मीडिया को रेगुलेट करने के मामले में अगुआ है ताकि व्यवस्थित चुनाव प्रचार की गारंटी हो सके और उम्मीदवारों को सुरक्षा दी जा सके.

प्रधानमंत्री प्रयुथ

फेसबुक के एक प्रतिनिधि का कहना है कि वह सरकार के आग्रह की केस दर केस आधार पर जांच करता है, "हमारे यहां सरकार के आग्रह पर कार्रवाई की एक प्रक्रिया है जो थाईलैंड में दुनिया के दूसरे देशों से अलग नहीं है." ट्विटर ने रॉयटर्स के सवाल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सैनिक सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध राजनीतिक दलों के प्रचार में बाधा डाल रहे हैं.

नए कानून में उम्मीदवारों और पार्टियों को अपना सोशल मीडिया हैंडल रजिस्टर कराना होता है और चुनाव आयोग को ये सूचना भी देनी होती है कि वे किस प्लैटफॉर्म पर कितनी देर के लिए दिखेंगे. पार्टियों को सिर्फ अपनी नीतियों पर बात करने की अनुमति है. यदि पोस्ट को मतदाताओं को बरगलाने वाला या दूसरों को नकारात्मक रोशनी में दिखाने वाला समझा जाता है, तो पार्टियों को डिसक्वालिफाई किया जा सकता है और उम्मीदवारों को दस साल कैद की सजा या 20 साल के लिए राजनीति से प्रतिबंधित किया जा सकता है.

ट्रांसजेंडर उम्मीदवार पाउलीने

बैंकाक स्थित एशिया नेटवर्क फॉर फ्री एंड फेयर इलेक्शन के संयोजक पोंगसाक सान ऑन का कहना है कि ये नियम फेक न्यूज को रोकने से ज्यादा दूर तक जाते हैं और ये सवाल खड़ा करते हैं कि चुनाव कितने स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे. उन्होंने रॉयटर्स को बताया, "ये नियम हाल में कहीं भी हुए चुनावों से ज्यादा सख्त हैं. वे इतने विस्तार में हैं कि पार्टियों को बाधा पहुंच रही है."

थाईलैंड के इन चुनावों में मुकाबला सेना समर्थित प्रधानमंत्री प्रयुथ चान ओचा और उन पार्टियों के बीच है जो सेना को राजनीति से बाहर करना चाहती हैं. लेकिन कड़े सोशल मीडिया कानून ने सेना विरोधी पार्टियों के सामने ये सवाल खड़ा कर दिया है कि वे सोशल मीडिया पर प्रचार कैसे करें. उन्हें इस बात का डर है कि कहीं वे किसी कानून का उल्लंघन न कर दें जिसकी वजह से उसें डिसक्वालिफाई कर दिया जाए. हालांकि अब तक किसी को डिसक्वालिफाई नहीं किया गया है लेकिन इसके डर ने राजनीतिक दलों को पस्त कर रखा है और सेल्फ सेंसरशिप को बढ़ावा दिया है.

सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा शहरियों के बीच लोकप्रिय न्यू फ्यूचर फॉर्वर्ड पार्टी की पनिका वानिच नए कानून के बारे में कहती हैं, "वे पार्टियों के लिए जटिलताएं पैदा करती हैं." वानिच के अनुसार उनकी पार्टी सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले लीगल टीम से सलाह ले रही है. कुछ उम्मीदवारों ने तो अपने फेसबुक पेज को डिएक्टिवेट कर दिया है तो कुछ अन्य ने उन पोस्टों को डिलीट कर दिया है जो मुश्किलें पैदा कर सकते हैं.

एमजे/आईबी (रॉयटर्स)

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