दावोस में दांव उभरते देशों पर

दुनिया भर के बड़े बड़े व्यापारी अब विकासशील देशों की ओर उम्मीद की निगाह से देख रहे हैं. दावोस में बुधवार से शुरू हुई सालाना विश्व आर्थिक फोरम की बैठक में बात बस तेजी से बढ़ती इन अर्थव्यस्थाओं की ही हो रही है.

ऐसा नहीं है कि उभरते बाजारों वाले देश बस अच्छी वजहों से ही चर्चा में हैं. व्यापारी इन देशों से उम्मीदें तो लगाए बैठे हैं लेकिन वहां की राजनीतिक उथल पुथल और महंगाई से वे चिंतित भी हैं.

विश्व आर्थिक फोरम में एग्जिक्यूटिव और राजनेताओं ने कहा कि इन देशों में खाने पीने की चीजों के बढ़ते दाम सामाजिक अशांति को जन्म दे सकते हैं. कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव और ईरान के परमाणु कार्यक्रम भी चिंता का विषय हैं. ट्यूनिशिया के बाद मिस्र में हो रहे विरोध प्रदर्शन भी दावोस में पहले दिन की चर्चा का मुद्दा बने.

Uribe, Switzerland World Economic Forum

स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति मिशेलिने काल्मी-रे ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि अमीर और गरीब के बीच की खाई तेजी से बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि गरीब देशों को वैश्विकरण से फायदा नहीं पहुंच रहा है.

उथल पुथल ने बदली दुनिया

पिछले दो साल में दुनिया के आर्थिक मंच पर जबर्दस्त उथल पुथल हुई है. इस उथल पुथल ने आर्थिक तरक्की के बड़े बड़े फॉर्मूले देने वाले अमीर व्यापारियों की हेकड़ी निकाल दी है और दावोस में वे काफी दुखी और पश्चाताप की मुद्रा में नजर आए. अब भी उनकी चिंताएं खत्म नहीं हुई हैं और उन्हें डर है कि खत्म हो रही मंदी वापस आ सकती है. जीई एनर्जी के चेयरमैन जॉन क्रेनिकी ने कहा, "ब्याज दरें जीरो पर पहुंच गई हैं और अब वे बस ऊपर ही जा सकती हैं. लेकिन इसकी वजह से वित्तीय खर्चे भी बढ़ेंगे. इससे ऊर्जा ही नहीं, सामान्य चीजों के दाम भी बढ़ेंगे."

स्विट्जरलैंड की खूबसूरत वादियों में चार दिन तक चलने वाली इस बैठक में 35 राष्ट्रीय नेता और 1400 बिजनेस लीडर हिस्सा ले रहे हैं. इनमें रूस और फ्रांस के राष्ट्रपति भी शामिल हैं. भारत और चीन से इतने प्रतिनिधि आए हैं जितने पहले कभी नहीं आए. उन सभी की चिंताएं एक सी हैं और उनका हल तलाशने की कोशिश हो रही है. विश्व आर्थिक फोरम के संस्थापक और अध्यक्ष क्लाउस श्वाज ने उद्घाटन सत्र में कहा कि अब वैश्विक नेताओं को नए विचारों पर काम करना होगा.

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः एन रंजन

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