नई ऊंचाइयां तय करेंगे भारत नेपाल

नेपाल के नेता प्रचंड चार वर्ष बाद भारत आए हैं. यहां आने से ठीक पहले वे 14 से 20 अप्रैल तक चीन की यात्रा पर थे. प्रचंड ने डीडब्ल्यू के कुलदीप कुमार से भेंट की. प्रस्तुत हैं उनके साथ बातचीत के कुछ अंश.

डीडब्ल्यूः आपकी नई दिल्ली यात्रा यूं तो अपने आप में ही महत्वपूर्ण है, लेकिन क्योंकि आप एक सप्ताह पूर्व ही बीजिंग से लौटे हैं इसलिए इस यात्रा को और भी अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है. आपने बीजिंग में नेपाल-भारत-चीन त्रिपक्षीय सहयोग की बात की थी. इसके बारे में कुछ और बताइये.

प्रचंडः देखिए, यह अभी केवल मेरे विजन के स्तर पर ही है. चीन और भारत हमारे दो बड़े पड़ोसी देश हैं. हम तीनों देश मिलकर आपस में सहयोग करें तो बहुत तरक्की कर सकते हैं. मैंने नेपाल के समग्र राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर भविष्य की ऐसी कल्पना की है. नेपाल की जो जिओ-पोलिटिकल यानि भू-राजनीतिक स्थिति है, उसे और उसके सम्पूर्ण हितों के मद्देनजर मैंने यह प्रस्ताव रखा है. नेपाल और भारत के जो संबंध हैं, नेपाल और चीन के जो संबंध हैं और चीन और भारत के बीच जिस तरह से व्यापार और आर्थिक संबंध बढ़ रहे हैं और अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है, उन्हें दृष्टि में रखकर मुझे यह लगता है कि यदि हम तीनों देश मिलकर त्रिपक्षीय सहयोग की कोशिश करें, तो सभी को लाभ होगा. मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि हम एकदम से यह कर सकते हैं, लेकिन यह संभव है और होना चाहिए. इसके साथ-साथ द्विपक्षीय सम्बंधों और सहयोग को और अधिक बढ़ाने की कोशिश भी जारी रहनी चाहिए.

आपने कहा कि अभी यह विचार विजन के स्तर पर है. क्या आप सोचते हैं कि जिस तरह ब्रिक्स (ब्राजील, भारत, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका का सहयोग संगठन) की एक संस्थागत संरचना निर्मित हुई है, नेपाल-भारत-चीन के इस त्रिपक्षीय सहयोग को भी भविष्य में कभी संस्थागत रूप दिया जा सकेगा?

पहली बात तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि हम इस प्रकार का कोई भी त्रिपक्षीय सहयोग नेपाल-भारत सम्बंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जाये बिना नहीं कर सकते. पहले राजशाही थी. उसका प्रयास रहता था कि भारत और चीन को एक दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करे. इसका कुछ असर हमारे क्रांतिकारी आन्दोलन पर भी था. लेकिन अब हमने नई दृष्टि अपनाई है. नेपाल की आर्थिक समृद्धि के लिए दोनों बड़े पड़ोसियों के साथ सम्बंधों को और प्रगाढ़ बनाना जरूरी है. मुझे पूरा विश्वास है कि अंततः इस त्रिपक्षीय सहयोग को ब्रिक्स जैसा संस्थागत रूप दिया जा सकेगा, और दिया जाएगा. लेकिन तुरंत यह संभव नहीं है.

मैं आपको बता दूं कि कल नई दिल्ली पहुंचने के बाद मेरी भारतीय सुरक्षा सलाहकार से बात हुई. मैंने उन्हें भारत के साथ सम्बंधों को और अधिक मजबूत बनाने की अपनी और अपनी पार्टी की समझ के बारे में जानकारी दी. नेपाल की आर्थिक समृद्धि भारत के साथ सहयोग संबंध को और अधिक मजबूत बनाए बिना नहीं हो सकती. हमने पहली बार फरवरी में हुए अपने पार्टी महाधिवेशन में इस बारे में विस्तार से विचार किया और तय किया कि हमें एक-दूसरे के आर्थिक सरोकारों, सुरक्षा सरोकारों और राजनीतिक सरोकारों को समझ कर और ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना है. इस बारे में मैंने बहुत बोल्ड स्टेंड ले लिया है. हमें चीन और भारत का कार्ड एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करने की राजाओं की नीति पर नहीं चलना है.

भारत और चीन के बीच इस समय सीमा-विवाद के कारण कुछ तनाव पैदा हो गया है. आप इसे कैसे देखते हैं? आपकी भूमिका क्या हो सकती है?

मुझे खुशी है कि अब स्थिति सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रही है और तनाव में कमी आ रही है. दोनों देश खुद इस स्थिति से निपटने में सक्षम हैं.

आपकी पार्टी की राजनीतिक लाइन में भी क्या कोई बदलाव आया है?

देखिये, मैंने अभी पार्टी के महाधिवेशन की चर्चा की थी. उसमें हमने शांतिपूर्ण तरीके से नेपाल को लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर आगे ले जाने का निर्णय लिया है. शांतिपूर्ण तरीके अपनाकर ही आर्थिक समृद्धि हासिल की जा सकती है. हमारे ऊपर जनता का भी दबाव था और खुद हमने अपने अनुभव से भी यह सीखा है.

फोटो कोड 923

संविधान सभा का कार्यकाल समाप्त होते ही आपकी पार्टी टूट गई और मोहन वैद्य और उनके साथी अलग हो गए. अब क्या स्थिति है?

आपको एक दिलचस्प बात बताता हूं. कल जब मैं एयरपोर्ट से बाहर आया तो देखा कि कुछ लोग मेरा स्वागत काले झंडों से करने के लिए खड़े थे. वे सभी मेरे ही पुराने कार्यकर्ता थे जो अब मोहन वैद्य के साथ हैं. लेकिन फिर शाम को नेपाली दूतावास में एक कार्यक्रम था जिसमें उन्हीं के चार-पांच साथी भी शिरकत करने आए थे. वे वहां बोले कि हमारे प्रचंड के साथ कुछ मतभेद हैं, लेकिन हम यह भी जानते हैं कि नेपाल को यही आगे लेकर जाएंगे और यही हमारा नेतृत्व करेंगे. तो, ऐसी भावना भी है.

अब आपका क्या कार्यक्रम है?

30 अप्रैल को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से मिलना है और दोपहर बाद काठमाण्डू लौट जाना है. मैं उनके साथ भी नेपाल-भारत आर्थिक सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाने के मुद्दे पर विशेष रूप से चर्चा करूंगा. मुझे पूरा यकीन है कि हमारे सम्बन्धों को एक नई ऊंचाई मिलेगी.

यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल प्रचंड' ने एक दशक से अधिक समय तक अपने देश में सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया और राजशाही की समाप्ति में निर्णायक भूमिका निभाई. 2008 में गणतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष नेपाल के वे पहले प्रधानमंत्री बने और आज भी उनकी गिनती नेपाल के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शख्सियत में होती है.

इंटरव्यूः कुलदीप कुमार

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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