नक्सलियों के डर से आधी तनख्वाह

भारत के नक्सल प्रभावित इलाकों की नए किस्म की आउटसोर्सिंग हो रही है. वहां नक्सलियों के डर से टीचर स्कूल नहीं जा रहे हैं. उन्होंने बच्चों को पढ़ाने का काम अपने आधे वेतन पर बेरोजगार युवकों को सौंप दिया है.

आउटसोर्सिंग शब्द का जिक्र आमतौर पर सूचना तकनीक के क्षेत्र में किया जाता है. लेकिन देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में एक अलग किस्म की आउटसोर्सिंग चल रही है. इन इलाकों में जान के डर से लंबे समय तक स्कूलों में नहीं जाने वाले शिक्षक अब सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे की तर्ज पर इस अनूठी आउटसोर्सिंग का सहारा ले रहे हैं. ये लोग स्थानीय युवकों को अपनी जगह स्कूलों में पढ़ाने के लिए भेज रहे हैं. इसके बदले वे हर महीने अपना आधा वेतन ऐसे युवकों को दे देते हैं. स्कूलों पर होने वाले नक्सली हमलों और शिक्षकों के अपहरण और हत्या की बढ़ती घटनाओं ने ही इस चलन को बढ़ावा दिया है.

तो फिर क्या करें

उड़ीसा के क्योंझर जिले के धीरेन कुमार साहू ऐसे ही युवकों में हैं. बीए पास करने के बाद पांच साल से बेरोजगार बैठे धीरेन को जब एक शिक्षक ने अपनी जगह स्कूल में पढ़ाने का प्रस्ताव दिया तो उन्होंने तुरंत हामी भर दी. वह बताते हैं, "नक्सली हम से आकर अपने संगठन में शामिल होने के लिए दबाव डालते थे. हम कई साल से पढ़ लिख कर बेरोजगार बैठे थे. हमारे पास खेती लायक जमीन भी

सुरक्षा बलों और माओवादियों के टकराव से आम लोगों को कई मुश्किलें झेलनी होती हैं

नहीं थी. इसलिए हम यह काम कर रहे हैं. अब भी नक्सली आकर हमें धमकाते हैं."

बंगाल के मेदिनीपुर इलाके में एक स्कूल के पूर्व प्रिंसीपल देवाशीष घोष कहते हैं, "शिक्षक नक्सल प्रभावित इलाकों में कैसे पढ़ाने जाएंगे. नक्सली उनका अपहरण कर लेते हैं. कई शिक्षकों की हत्या हो चुकी है. माओवादी अकसर स्कूलों पर धावा बोलते हैं. सरकार भी उनको सुरक्षा देने में नाकाम है. वे लोग जान के डर से स्कूलों में नहीं जा रहे हैं."

इसी महीने लालगढ़ इलाके में माओवादियों ने एक स्कूल शिक्षक वीरेन दुले की दिन दहाड़े हत्या कर दी. वीरेन के भाई रंजीत कहते हैं, "वैसा आतंक तो नहीं था. लेकिन इलाके में माओवादियों ने तृणमूल कांग्रेस और पुलिस अत्याचार विरोधी समिति के साथ मिल कर जो साजिश रची है यह हत्या उसी का नतीजा है."

इन शिक्षकों के बदले स्कूलों में पढ़ाने वाले युवक तो डर के मारे अपना नाम तक नहीं बताना चाहते. रमेश त्रिपाठी हैं तो महज दसवीं पास, लेकिन वह भी उड़ीसा के एक स्कूल में विज्ञान पढ़ाते हैं. वह कहते हैं, "क्या करें. बेरोजगारी से तो यह अच्छा ही है. नक्सली अक्सर आकर मारपीट करते हैं. लेकिन स्थानीय होने की वजह से हमारी जान को कोई खतरा नहीं है."

छात्रों का क्या होगा

शिक्षकों को तो घर बैठे ही आधा वेतन मिल जाता है. दूसरी ओर, कम पढ़े लिखे युवक स्कूलों में पढ़ाते हैं और उनको भी वेतन का आधा हिस्सा मिलता है. लेकिन इससे छात्रों की पढ़ाई का स्तर प्रभावित हो रहा है. नक्सल

बच्चों का भविष्य लग रहा है दांव पर

प्रभावित पश्चिम बंगाल के अलावा उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में यह आउटसोर्सिंग काफी लोकप्रिय हो रही है. छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सात जिलों में स्कूल शिक्षकों के लगभग ढाई हजार पद स्वीकृत हैं. लेकिन वहां महज 526 शिक्षक नियुक्त हैं. झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षकों के लगभग डेढ़ हजार पद खाली हैं. इसी तरह उड़ीसा में लगभग ढाई हजार शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं.

उड़ीसा के एक पुलिस अधिकारी बी.एस.नायक बताते हैं, "माओवादी नहीं चाहते कि इलाके में स्कूल चलें. वे लोग सोचते हैं कि स्कूलों में रह कर सुरक्षा बल के जवान अभियान चलाते हैं. इसलिए वे स्कूलों को निशाना बना रहे हैं. इससे सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों का हो रहा है. कई स्कूल तो घरों में चल रहे हैं."

खासकर दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में तो पूरी शिक्षा व्यवस्था ही ऐसे युवकों के सहारे चल रही है. नक्सलियों के डर से स्कूल इंस्पेक्टर भी उन इलाकों में कभी दौरे पर नहीं जाते. इसलिए किसी को पकड़े जाने का कोई डर नहीं है. इसके बारे में जानते तो सब हैं लेकिन कोई खुल कर बोलना नहीं चाहता.

अधिकारी भी लाचार

पश्चिम मेदिनीपुर के लालगढ़ इलाके में बीते दिनों कई शिक्षकों के अपहरण और उनकी हत्या के बाद ज्यादातर शिक्षकों ने स्कूल जाना ही बंद कर दिया है. नक्सलियों ने बीते कुछ महीनों के दौरान झारखंड, बंगाल और उड़ीसा के कई स्कूलों को भी विस्फोट से उड़ा दिया है. दूरदराज के इलाकों में तैनात ज्यादातर शिक्षकों ने तबादले की अर्जी भेज रखी है तो कोई बीमारी के बहाने लंबे समय से स्कूल नहीं जा रहा है.

बंगाल के नक्सल प्रभावित इलाकों में भी तस्वीर ऐसी ही है. सरकारी अधिकारी इस बारे में जानते तो हैं, लेकिन

कोई इस पर बोलने के लिए तैयार नहीं है. एक सरकारी अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, "यह स्थिति चिंताजनक है. बेरोजगार युवकों के पढ़ाने से उन स्कूलों में शिक्षा के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता है. उम्मीद है कि सुरक्षा बलों का इलाके पर नियंत्रण होने के बाद हालत सुधरेगी."

शिक्षा के अलावा स्वास्थ्य के क्षेत्र में यही स्थिति है. डॉक्टर डर के मारे नक्सल प्रभावित इलाकों में जाना ही नहीं चाहते. नतीजतन कई ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ कंपाउंडरों के बूते ही चल रहे हैं. बंगाल के नक्सल प्रभावित तीन जिलों में तो शिक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है. सरकार की ओर से सुरक्षा का भरोसा मिलने के बावजूद कोई नया शिक्षक या डॉक्टर उन इलाकों में जाने को तैयार नहीं है. मौजूदा हालात में इन इलाकों में चल रही अनूठी आउटसोर्सिंग की यह प्रक्रिया और तेज होने का अंदेशा है.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः ए कुमार

आउटसोर्सिंग शब्द का जिक्र आमतौर पर सूचना तकनीक के क्षेत्र में किया जाता है. लेकिन देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में एक अलग किस्म की आउटसोर्सिंग चल रही है. इन इलाकों में जान के डर से लंबे समय तक स्कूलों में नहीं जाने वाले शिक्षक अब सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे की तर्ज पर इस अनूठी आउटसोर्सिंग का सहारा ले रहे हैं. ये लोग स्थानीय युवकों को अपनी जगह स्कूलों में पढ़ाने के लिए भेज रहे हैं. इसके बदले वे हर महीने अपना आधा वेतन ऐसे युवकों को दे देते हैं. स्कूलों पर होने वाले नक्सली हमलों और शिक्षकों के अपहरण और हत्या की बढ़ती घटनाओं ने ही इस चलन को बढ़ावा दिया है.

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