नागरिकता संशोधन विधेयक के क्यों खिलाफ है असम

देश की आजादी के बाद से ही पहचान के संकट से जूझने वाले पूर्वोत्तर राज्य असम में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 ने इस संकट को और गंभीर कर दिया है.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 के लोकसभा में पारित होने के विरोध में असम बंद और बेमियादी आर्थिक नाकेबंदी से जूझ रहा है. इस मुद्दे पर असम गण परिषद (एजीपी) ने राज्य की बीजेपी सरकार से नाता तोड़ लिया है और सड़कों पर उतर आई है.

अखिल असम छात्र संघ समेत दर्जनों संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. कम से कम 70 संगठनों ने मंगलवार से राज्य में बेमियादी आर्थिक नाकेबंदी शुरू कर दी है. असम का सबसे बड़ा साहित्यिक संगठन असम साहित्य सभा भी अक्सर असमिया भाषा, पहचान और संस्कृति का सवाल उठाता रहा है. पहचान के संकट पर कथित खतरे ने ही राज्य में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) जैसे उग्रवादी संगठन को जन्म दिया था.

विवादक्यों

उक्त विधेयक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से यहां आने वाले गैर-मुसलमानों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है. भले उनके पास कोई वैध कागजात नहीं हो. इसके साथ ही नागरिकता के लिए अनिवार्य 12 साल की समयसीमा घटा कर छह साल कर दी गई है. यानी उक्त देशों के हिंदू, पारसी, सिख और ईसाई समुदाय का कोई भी व्यक्ति बिना किसी वैध कागजात के भी छह साल से भारत में रह रहा है तो वह नागरिकता का हकदार हो जाएगा. विरोध करने वाले संगठनों को इसी बात पर आपत्ति है.

असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में बुलाया गया था बंद.

एजीपी और अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने इस विधेयक को असम समझौते और भारतीय संविधान की भावना के खिलाफ बताया है. आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जवल भट्टाचार्य कहते हैं, "असम आजादी के बाद से ही शरणार्थियों और घुसपैठियों के बोझ से कराह रहा है. अब इस विधेयक के बाद तो राज्य में ऐसे लोगों की बाढ़ आ जाएगी. लेकिन हम 25 मार्च, 1971 के बाद बांग्लादेश से आने वाले किसी भी व्यक्ति को राज्य में नहीं रहने देंगे. वह चाहे हिंदू हो या मुसलमान.” भट्टाचार्य की दलील है कि इससे राज्य का जातीय संतुलन गड़बड़ा जाएगा और असमिया लोग अपने ही घर में बेगाने होकर रह जाएंगे.

एजीपी नेता व पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत कहते हैं, "विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी ने सत्ता में आने की स्थिति में राज्य से अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को खदेड़ने का वादा किया था. लेकिन विडंबना यह है कि अब वही पार्टी गैर-मुसलमान आप्रवासियों को नागरिकता देने जा रही है." वह कहते हैं कि यह ऐतिहासिक असम समझौते के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है.

ध्यान रहे कि छात्र नेता के तौर पर प्रफुल्ल महंत ने भी उक्त समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. उसके बाद ही असम में वर्ष 1985 में उनकी अगुवाई में असम गण परिषद की सरकार सत्ता में आई थी. महंत का कहना है कि एक ओर से घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) को अपडेट करने की प्रक्रिया जारी है और दूसरी ओर धार्मिक आधार पर नागरिकता मुहैया करने का कानून बना दिया गया है. यह दोनों बातें एक-दूसरे की विरोधाभासी हैं.

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

अमेरिका

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

कनाडा

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

पाकिस्तान

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

मेक्सिको

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

ब्राजील

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

अर्जेंटीना

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

क्यूबा

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

वेनेजुएला

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

चिली

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

एंटीगुआ और बारबुडा

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

बारबाडोस

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

बलीज

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

चाड

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

इक्वाडोर

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

डोमिनिका

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

फिजी

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

ग्वाटेमाला

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

होंडुरास

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

पेरू

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

जमैका

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

ग्रेनाडा

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

पनामा

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

गुयाना

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

उरुग्वे

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

पराग्वे

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

लेसोथो

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

एल साल्वाडोर

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

सेंट लुसिया

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

सेंट किट्स एंड नेविस

यहां पैदा होने पर मिल जाती है नागरिकता

सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडाइंस

दूसरी ओर, असम भाजपा के वरिष्ठ नेता व राज्य के वित्त मंत्री हिमंत विश्व शर्मा का दावा है कि अगर नागरिकता (संशोधन) विधेयक पारित नहीं होता तो अगले पांच साल में राज्य के हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे. उनका कहना है कि यह स्थिति उन लोगों के लिए मुफीद होगी जो असम को दूसरा कश्मीर बनाना चाहते हैं.

हिमंत का सवाल है, "आखिर अत्याचार के शिकार हिंदू कहां जाएंगे? उनके पास तो मुसलमानों और ईसाइयों की तरह पाकिस्तान या अमेरिका जाने का भी विकल्प नहीं है.” उनकी दलील है कि अगर पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और पंजाब को उक्त प्रावधानों पर कोई आपत्ति नहीं है तो असम पर शरणार्थियों का बोझ पड़ने की बात कह कर विवाद क्यों फैलाया जा रहा है?

नागरिकता विधेयक पर पैदा होने वाले विवाद पर मरहम लगाने के लिए केंद्र ने वर्ष 1985 के असम समझौते की धारा छह को लागू करने के मुद्दे पर एक नौ-सदस्यीय उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया है. हालांकि कई संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है. उक्त धारा में असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान और असमिया लोगों की विरासत की रक्षा का प्रावधान है.

इस समिति का विरोध करने वाले संगठनों की दलील है कि धारा छह और नागरिकता (संशोधन) विधेयक परस्पर विरोधाभासी हैं. अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने उक्त समिति में अपना प्रतिनिधि नहीं भेजने का फैसला किया है. दूसरी ओर, भाजपा नेता हिमंत दावा करते हैं, "असम समझौते की धारा छह और उक्त विधेयक एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधाभासी नहीं.”

पुरानीहैसमस्या

असम में पहचान के संकट की समस्या देश की आजादी जितनी पुरानी है. राज्य में पड़ोसी बांग्लादेश से घुसपैठ के खिलाफ समय-समय पर आवाजें उठती रही हैं. अस्सी के दशक की शुरुआत में इस मुद्दे पर राज्य में छह साल लंबा आंदोलन भी चल चुका है. उस असम आंदोलन के बाद ही प्रफुल्ल कुमार महंत की अगुवाई में असम गण परिषद सरकार सत्ता में आई थी.

राज्य का सबसे बड़ा साहित्यिक संगठन असम साहित्य सभा भी अक्सर पहचान और संस्कृति का सवाल उठाता रहा है. सभा ने बीते साल कहा था कि राज्य में काम करने के इच्छुक लोगों के लिए असमिया या किसी स्थानीय भाषा की जानकारी होनी जरूरी है. सभा के अध्यक्ष परमानंद राजबंशी कहते हैं, "अगर किसी को स्थानीय भाषा नहीं आती तो उसे निजी या सार्वजनिक क्षेत्र में काम नहीं करने दिया जाएगा. असम के स्थानीय लोग संकट के दौर से गुजर रहे हैं. उनकी पहचान और भाषा खतरे में है. असम साहित्य सभा स्थानीय भाषाओं को मरने नहीं देगी.”

नागरिकता विधेयक के विरोध में दर्जनों संगठनों ने सोमवार को जहां विधेयक की प्रतियां जलाईं वहीं मंगलवार को पूर्वोत्तर बंद रहा. दूसरी ओर, कृषक मुक्ति संग्राम समिति के नेतृत्व में कम से कम 70 संगठनों ने विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 के विरोध में मंगलवार से राज्य में बेमियादी आर्थिक नाकेबंदी शुरू की है. इन संगठनों ने चेताया है कि नाकेबंदी के दौरान वे असम में पैदा होने वाले तेल, पेट्रोलियम उत्पादों, कायला, वन उत्पादों और लाइमस्टोन को राज्य से बाहर नहीं जाने देंगे.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि उक्त विधेयक के खिलाफ असम में शुरू से ही आवाजें उठती रही हैं. लेकिन केंद्र व राज्य की बीजेपी सरकारों ने स्थानीय लोगों की भावनाओं की अनदेखी कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाया है. इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं.

असम समेत पूर्वोत्तर के विभिनिन राजनीतिक औऱ सामाजिक संगठनों के मूड को देखते हुए निकट भविष्य में इस मुद्दे पर आंदोलन तेज होने का अंदेशा है. पहचान का संकट स्थानीय लोगों के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा है. एक पर्यवेक्षक सुनील कुमार दास कहते हैं, "यह आंदोलन आने वाले दिनों में हिंसक हो सकता है. इससे राज्य में असम आंदोलन की पुनरावृत्ति के अंदेशे से भी इंकार नहीं किया जा सकता.”

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

बैंक या पोस्ट ऑफिस के खातों का ब्योरा

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

समुचित अधिकारियों की ओर से जारी जन्म प्रमाणपत्र

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

न्यायिक या राजस्व अदालतों में किसी मामले की कार्यवाही का ब्योरा

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

बोर्ड या विश्वविद्यालय की ओर से जारी शैक्षणिक प्रमाणपत्र

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

भारत सरकार द्वारा जारी किया गया पासपोर्ट

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

भारतीय जीवन बीमा निगम की पॉलिसी

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

किसी भी प्रकार का सरकारी लाइसेंस

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

केंद्र या राज्य सरकार के उपक्रमों में नौकरी का प्रमाणपत्र

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

जमीन या संपत्ति से संबंधित दस्तावेज

एनआरसी में शामिल होने के लिए चाहिए ये कागजात

राज्य द्वारा जारी स्थानीय आवास प्रमाणपत्र

हमें फॉलो करें