"नास्तिक होना, कपटी कैथोलिक से ज्यादा बेहतर"

कहीं मिशनरियों के जरिये बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन कराया तो कहीं बच्चों का यौन शोषण हुआ. कैथोलिक चर्च अक्सर आलोचना का केंद्र रहा है. पोप फ्रांसिस के मुताबिक इसके लिए चरित्र का दोहरापन जिम्मेदार है.

कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप फ्रांसिस ने एक बार फिर तीखा तंज कसते हुए लोगों को सलाह दी कि कपट से भरा दोहरा जीवन जीने के बजाए नास्तिक होना बेहतर है. अपने ही चर्च के कुछ सदस्यों की उन्होंने एक बार फिर आलोचना की. सुबह की सामूहिक उपासना के बाद वेटिकन में अपने आवास में पोप फ्रांसिस ने कहा, "कहा कुछ और किया कुछ और, यह स्कैंडल है. यह दोहरा जीवन है."

वेटिकन रेडियो के मुताबिक पोप ने यह भी कहा कि, "कुछ ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं कि मैं बहुत पक्का कैथोलिक हूं, मैं हमेशा मास (सामूहिक उपासना) में जाता हूं, मैं इस या उस एसोसिएशन से जुड़ा हूं." लेकिन इनमें से कुछ लोगों को यह भी कहना चाहिए कि "मेरा जीवन एक ईसाई का नहीं है. मैं अपने कर्मचारियों को सही तनख्वाह नहीं देता हूं, मैं लोगों का शोषण करता हूं, मैं गंदा व्यापार करता हूं. मैं पैसे की हेराफेरी करता हूं और एक दोहरा जीवन जीता हूं. ऐसे बहुत सारे कैथोलिक हैं जो ऐसा ही करते हैं और स्कैंडल करते हैं."

कुछ देशों में कैथोलिक चर्च पर यौन दुर्व्यवहार के आरोप

2013 में अर्जेंटीना के कार्डिनल से कैथोलिक पोप बनने वाले पोप फ्रांसिस के मुताबिक, "हमने कितनी बार लोगों को यह कहते हुए सुना है कि अगर ये शख्स कैथोलिक है तो इससे बेहतर है नास्तिक होना."

पोप फ्रांसिस ऐसे वक्त में वैटिकन की गद्दी संभाल रहे हैं जब कैथोलिक चर्च भारी मुश्किल में है. जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में चर्च पर बच्चों के यौन शोषण के आरोप लगे हैं. कई मामलों में आरोप सही साबित हुए और चर्च को हर्जाना भी देना पड़ा. वहीं यूरोप के कई देशों में नई पीढ़ी चर्च से दूर भाग रही है. स्विट्जरलैंड समेत दुनिया के कई कैथोलिक बहुल देशों में ज्यादातर जनता नास्तिक हो रही है.

(दुनिया की एक तिहाई आबादी किसी ईश्वर पर विश्वास नहीं रखती. कौन कौन से हैं ये देश)

नास्तिकों का देश

चीन (90 फीसदी)

चीनी मान्यता में इंसान और भगवान के बीच श्रद्धा का कोई सिद्धांत नहीं है. यहां अपने महान पूर्वजों की शिक्षा का अनुसरण करने वालों के नाम पर ही ताओइज्म या कन्फूशियनिज्म की परंपरा है. गैलप सर्वे में करीब 61 फीसदी चीनियों ने किसी ईश्वर के अस्तित्व को नकारा. वहीं 29 फीसदी ने खुद को अधार्मिक बताया.

नास्तिकों का देश

स्वीडेन (76 फीसदी)

इस स्कैंडिनेवियन देश में हाल के सालों में सेकुलरिज्म तेजी से बढ़ा है. स्वीडेन के सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल 8 फीसदी स्वीडिश नागरिक किसी भी धार्मिक संस्था से नियमित रूप से जुड़े हैं. शायद इसीलिए 31 अक्टूबर 2016 को प्रोटेस्टेंट रिफॉर्मेशन की 500वीं वर्षगांठ मनाने के लिए पोप फ्रांसिस ने स्वीडेन को चुना है.

नास्तिकों का देश

चेक गणराज्य (75 फीसदी)

करीब 30 प्रतिशत चेक नागरिक खुद को नास्तिक बताते हैं. वहीं इसी देश के सबसे अधिक लोगों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के बारे में कोई भी उत्तर देने से मना किया. कुल आबादी का केवल 12 फीसदी ही कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट चर्च से जुड़ा है.

नास्तिकों का देश

ब्रिटेन (66 फीसदी)

करीब 53 प्रतिशत ब्रिटिश लोगों ने खुद को अधार्मिक बताया और करीब 13 फीसदी ऐसे थे जो अपने आपको नास्तिक मानते हैं. पश्चिमी यूरोप में यूके के बाद नीदरलैंड्स नास्तिकता में सबसे आगे हैं. अप्रैल 2015 में इन नतीजों पर पहुंचने के लिए गैलप ने 65 देशों में कुल 64 हजार इंटरव्यू किए.

नास्तिकों का देश

हांगकांग (62 फीसदी)

पूर्व ब्रिटिश कालोनी और फिर चीन को वापस किए गए हांगकांग की ज्यादातर आबादी पर चीनी परंपराओं का असर दिखता है. बाकी कई लोग ईसाई, प्रोटेस्टेंट, ताओइज्म या बौद्ध धर्म के मानने वाले हैं. गैलप सर्वे में करीब 43 फीसदी हांगकांग वासियों ने माना कि वे किसी भी ईश्वर को नहीं मानते.

नास्तिकों का देश

जापान (62 फीसदी)

चीन की ही तरह जापान की लगभग सारी आबादी किसी ईश्वर की बजाए जापान के स्थानीय शिंतो धर्म का अनुसरण करते हैं. शिंतोइज्म के मानने वाले ईश्वर जैसे किसी दिव्य सिद्धांत में विश्वास नहीं रखते. गैलप के आंकड़ों के मुताबिक करीब 31 फीसदी जापानी खुद को नास्तिक बताते हैं.

नास्तिकों का देश

जर्मनी (59 फीसदी)

मुख्य रूप से ईसाई धर्म के मानने वाले जर्मन समाज में इस्लाम समेत कई धर्म प्रचलित है लेकिन 59 फीसदी किसी ईश्वर को नहीं मानते. स्पेन, ऑस्ट्रिया में भी किसी ईश्वर को ना मानने वालों की बड़ी संख्या है. पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता का गढ़ माने जाने वाले फ्रांस की करीब आधी आबादी ने खुद को अधार्मिक बताया.

ओएसजे/एमजे (रॉयटर्स)


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