नेता और सोशल मीडिया

नेता और अभिनेता, दोनों को मंच चाहिए. पहले दोनों के लिए ही अपने श्रोताओं और दर्शकों तक पहुँचने के सीमित साधन थे. अब सोशल मीडिया है जिसका नेता जम कर इस्तेमाल कर रहे हैं.

पहले नेता अपनी बात अपने सहयोगियों, अनुयायियों और मतदाताओं तक केवल अखबार, रेडियो और जनसभाओं के जरिये ही पहुंचा सकते थे और अभिनेता की पहुंच उन्हीं दर्शकों तक थी जो उसका नाटक या फिल्म देखने ऑडिटोरियम या सिनेमाहॉल जाते थे. पहले टेलिविजन और फिर बाद में वीडियो कैसेट और डिस्क आने के बाद तो अभिनेता की पहुंच काफी बढ़ गई. नेता भी कभी-कभी टीवी पर दिखने लगे. सामाजिक मीडिया यानि ऑर्कुट, फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर के आने के बाद से स्थिति में बुनियादी बदलाव आ गया है. सामाजिक मीडिया ने जहां आम शिक्षित व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच प्रदान किया है, वहीं नेताओं और अभिनेताओं को भी अपने समर्थकों और प्रशंसकों से सीधे संवाद करने का साधन मुहैया कराया है.

आज भारत में शायद ही कोई ऐसा नेता या अभिनेता हो जिसका अपना ट्विटर खाता, ब्लॉग या फेसबुक खाता न हो. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस मामले में अपवाद हैं. मनमोहन सिंह तक का एक ट्विटर खाता है जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय चलाता है. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी नियमित रूप से ब्लॉग लिखते है और उनकी पार्टी के सुषमा स्वराज एवं नरेंद्र मोदी जैसे नेता ट्वीट करने में माहिर हैं. भारतीय नेताओं में नरेंद्र मोदी सफल ट्विटर हैं और ट्विटर पर उनके अनुयायियों की संख्या अठारह लाख से भी अधिक है.

जिस तरह कुछ लोगों के लिए फेसबुक एक नशा बन गया है, उसी तरह कुछ नेता ट्वीट किए बिना नहीं रह सकते. कई बार यह आदत उनके लिए परेशानी भी खड़ी कर देती है. केन्द्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर को इसके कारण 2010 में मंत्रिपद से इस्तीफा देना पड़ा था. उस समय वह विदेश राज्यमंत्री थे और कई बार ट्विटर पर अपनी टिप्पणियों के कारण विवादों में घिर चुके थे. मसलन, एक बार उन्होंने सरकार के खर्च घटाने के अभियान की ट्विटर पर यह लिखकर आलोचना कर दी थी कि इसके कारण उन्हें हवाईजहाज में मवेशी श्रेणी (सामान्य श्रेणी) में यात्रा करनी पड़ी. ऐसे ही एक बार उन्होंने सऊदी अरब के भारत-पाकिस्तान संबंधों में “मध्यस्थता” करने की संभावना के बारे में कुछ व्यंग्य के साथ टिप्पणी कर दी थी. अब वह केवल कांग्रेस सांसद ही नहीं, विदेश राज्यमंत्री भी थे, इसलिए उनके पार्टी सहयोगियों ने ही उनकी आलोचना की. इसके बाद जब वह क्रिकेट से जुड़े एक विवाद में फंसे, तो उनकी मंत्रिमंडल से छुट्टी ही हो गई. तीन वर्ष पहले उनके ट्विटर पर सात लाख अनुयायी थे, यानी वह जो कुछ भी लिखते थे वह तुरंत सात लाख लोगों तक पहुंच जाता था. ट्विटर का नशा ऐसा है कि मंत्रिपद से हाथ धोने के बाद और उसे दुबारा हासिल करने के बाद भी शशि थरूर का उस पर लगातार लिखना बदस्तूर जारी रहा और है.

कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद भी इन दिनों अपने ट्वीट-प्रेम के कारण विवाद में फंस गए हैं. 21 जुलाई को उन्होंने अपने ट्विटर खाते पर लिखा कि 2002 में गुजरात में हुए मुस्लिमविरोधी दंगों के कारण ही इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन पैदा हुए लेकिन अभी भी आरएसएस और भाजपा अपनी सांप्रदायिक राजनीति से बाज नहीं आ रहे हैं. स्वाभाविक था कि इस पर भारतीय जनता पार्टी की ओर से तीखी प्रतिक्रिया हुई क्योंकि 2002 में गुजरात में उन्हीं नरेंद्र मोदी की सरकार थी जिनकी अब है और जिन्हें भाजपा देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने में लगी है. क्योंकि शकील अहमद ने दंगों और आतंकवाद के बीच सीधे-सीधे ऐसा कार्य-कारण संबंध स्थापित कर दिया था जिसे सिद्ध करना आसान नहीं है, इसलिए स्वयं कांग्रेस के भीतर से उनकी आलोचना में स्वर उठने लगे और जब कांग्रेस नेताओं के एक शिविर में स्वयं राहुल गांधी ने यह कहा कि नेताओं को पार्टी लाइन से बाहर जाकर बयान नहीं देने चाहिए तो यही माना गया कि उनका इशारा शकील अहमद की तरफ है. हालांकि शकील अहमद पहले केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री रह चुके हैं, पर उनके बयान से गृह मंत्रालय ने भी बड़ी सफाई के साथ खुद को अलग कर लिया.

ट्विटर पर इस समय नरेंद्र मोदी 18 लाख से अधिक अनुयायियों के कारण सबसे आगे हैं. कुछ ही दिन पहले मुंबई में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक रेस्टोरेन्ट को इसलिए जबर्दस्ती बंद करा दिया क्योंकि उसके बिल पर केंद्र की यूपीए सरकार के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणी छपी थी. इस पर नरेंद्र मोदी ने तुरंत ट्वीट कर प्रतिक्रिया दी: “असहिष्णुता की पराकाष्ठा”, और उनके अनुयायियों ने आनन-फानन में इसे शेयर करके देश भर में फैला दिया. उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा के समय भी मोदी के ट्वीट मशहूर हुए थे. भाजपा नेता सुषमा स्वराज और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह भी ट्वीट करने में बहुत रुचि लेते हैं॰

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ट्वीट तो नहीं करते लेकिन वह बहुत सक्रिय ब्लॉगर हैं, और अपने ब्लॉग का वह जमकर राजनीतिक इस्तेमाल करते हैं. मोदी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किए जाने का अभियान छिड़ते ही उन्होंने अपनी ब्लॉग पर इससे असहमति जता दी. अक्सर वह समसामयिक मुद्दों पर अपने ब्लॉग में विचार व्यक्त करते रहते हैं और सुर्खियों में बने रहते हैं. सामाजिक मीडिया का जैसा व्यापक राजनीतिक इस्तेमाल भारत में हो रहा है, वह अपने आप में एक मार्के की परिघटना है॰

राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने फेसबुक, ब्लॉग और ट्वीट के अपने हितों के अनुसार प्रबंधन करने के लिए बाकायदा इंटरनेट के व्यवस्थित प्रयोग में कुशल प्रशिक्षित लोगों की टीम नियुक्त की है जो इन माध्यमों में चलने वाली बहसों में विधिवत हस्तक्षेप करते हैं और अपनी राजनीतिक लाइन को अधिक से अधिक स्वीकार्य बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं. यह रुझान आने वाले दिनों में और अधिक मजबूत होगा, इसमें कोई संदेह नहीं.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार, दिल्ली

संपादनः एन रंजन

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