पटाखों पर रोक के नतीजे तुरंत नहीं मिलेंगे

पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पर्यावरणविदों ने स्वागयोग्य बताया है, लेकिन उनका कहना है कि इसका वायु प्रदूषण पर प्रभाव सामने आने में अभी से दो से तीन साल और लगेंगे. 

सर्वोच्च न्यायालय ने इस दिवाली रात आठ से 10 बजे के बीच पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने वाले पटाखों का प्रयोग करने की इजाजत दी है. पर्यावरणाविद् और पर्यावरण की देखरेख में जुटे संगठनों का कहना है कि अदालत का फैसला स्वागतयोग्य है.

निर्वाना बीइंग के संस्थापक और पर्यावरणविद् जयधर गुप्ता ने आईएएनएस को बताया, "अगर हम नियंत्रित पटाखों की तरफ जाएं, जिनसे उत्सर्जन नहीं है या फिर बहुत कम उत्सर्जन है तो वह बहुत ही अच्छा है, क्योंकि इससे पटाखे बनाने में लाखों लोगों का रोजगार भी बच जाता है और हम एक नई चीज की ओर भी बढ़ रहे हैं. पहले अनियंत्रित पटाखों का प्रयोग किया जाता था, जिनमें जहरीले पदार्थ भरे होते थे. अब उस जहर को बाहर निकालकर पटाखे बनाए जाएंगे."

उन्होंने कहा, "जब आप लोगों पर दबाव डालेंगे तभी वह नई चीज बनाएंगे. अभी तक तो यह पटाखे जहर थे और अब हम इन्हें मजबूर कर रहे कि इस जहर को बाहर निकालें और उस पर अदालत का फैसला अच्छा परिणाम लाएगा."

Flash-Galerie Lichtfest Diwali in Indien (AP)

पटाखा उद्योग की दबी-छुपी बातें

चीन के बाद

दुनिया में चीन के बाद भारत सबसे बड़ा पटाखा उत्पादक देश है. हालांकि भारत में चीन से आने वाला सारा माल गैर कानूनी चैनलों से आता है.

पटाखा उद्योग की दबी-छुपी बातें

पहले कोलकाता

सिवाकासी पटाखे कारोबार का हब है, लेकिन इसकी शुरुआत कोलकाता से हुई थी. लेकिन बुनियादी सेवाओं के अभाव में इसे सिवाकासी में शुरू किया गया.

पटाखा उद्योग की दबी-छुपी बातें

अनुसंधान केंद्र

आतिशबाजी अनुसंधान एवं विकास केंद्र की सिवाकासी में स्थापना की गयी है. सिवाकाशी, देश की आतिशबाजी मांग का 90 फीसदी हिस्सा पूरा करता है.

पटाखा उद्योग की दबी-छुपी बातें

निर्यात दर

भारत दुनिया में आतिशबाजी निर्माण का बड़ा केंद्र हैं लेकिन भारत इसका निर्यातक नहीं है, क्योंकि आयातक देशों के सुरक्षा मानकों पर भारत खरा नहीं बैठता.

पटाखा उद्योग की दबी-छुपी बातें

आयात की दर

आतिशबाजी को वाणिज्य मंत्रालय ने प्रतिबंधित वस्तुओं की सूची में रखा है, पेट्रोलियम और एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन की ओर से पटाखों को आयात करने की अनुमति नहीं है.

जयधर गुप्ता ने कहा, "इसमें सिर्फ दिक्कत यह है कि इसका सकरात्मक प्रभाव सामने आने में दो से तीन साल लग जाएंगे क्योंकि अभी जो भी पटाखों की फैक्ट्रियां हैं और जो भी विक्रेता हैं उनके पास इतने पटाखों का भंडार होगा कि वह चाहे उन्हें वैध तरीके से बेचें या अवैध तरीके से उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है और जिसको जलाने हैं, वह जलाएगा. इसलिए इसका प्रभाव सामने आने में दो से तीन साल लगेंगे लेकिन अच्छी बात है कि कम से कम वायु प्रदूषण को लेकर लोगों में जागरूकता तो होगी." 

वहीं ग्रीनपीस इंडिया में जलवायु एवं ऊर्जा के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया ने आईएएनएस को बताया, "जैव-ईंधन जलने के मुद्दे की तरह, पटाखे भी प्रदूषण को बढ़ाने में योगदान देते हैं और हवा को प्रदूषित करते हैं. दिल्ली के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा हाल ही में उत्सर्जन सूची रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि प्रदूषण में परिवहन, बिजली संयंत्र, उद्योग और धूल महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, जिनका हल निकाला जाना चाहिए ताकि वायु प्रदूषण को स्थायी रूप से कम किया जा सके." 

उन्होंने कहा, "हम एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के बीच में जी रहे हैं और वायु प्रदूषण के कई स्रोतों से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की आवश्यकता है. सरकारों को राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) को अधिसूचित करना है, जिसमें लगातार देरी हो रही है."

ग्रीन दिवाली और बाजार

खास है धनतेरस

धनतेरस को धन और समृद्धि का दिन माना जाता है. ऐसी मान्यताएं हैं कि इस दिन जो लोग बर्तन, सोना, गाड़ी, घर या कोई और संपत्ति खरीदते हैं वह शुभ होता है. धनतेरस पर नया बही खाता खुलता है.

ग्रीन दिवाली और बाजार

सोना या चांदी

महिलाएं धनतेरस के दिन सोने के गहने या चांदी, सोने के सिक्के खरीदती हैं. पिछले दिनों सोने की कीमत में नरमी थी जिस वजह से इस साल लोगों ने सोने की जमकर खरीदारी की.

ग्रीन दिवाली और बाजार

सबके साथ मनाएं

दिवाली के कुछ दिन पहले ही बाजारों में रौनक आ जाती है. मिठाई की दुकानों में पहले से ही ऑर्डर बुक किए जाते हैं. इस मौके पर तरह तरह की मिठाई बनती हैं. वक्त के साथ चॉकलेट, कुकीज को भी उपहार में देने का चलन हो गया है.

ग्रीन दिवाली और बाजार

रंग बिरंगी रंगोली

दिवाली के बहुत दिन पहले ही बच्चे दिवाली घर बनाते हैं और उसपर रंग रोगन करते हैं. महिलाएं घर के आंगन या फिर मुख्य दरवाजे के बाहर फूल, रंग और दिए से रंगोली बनाती हैं. घर को खूबसूरत रंग बिरंगी बत्तियों से भी सजाया जाता है.

ग्रीन दिवाली और बाजार

उपहार भी

दिवाली के मौके पर कंपनियां अपने कर्मचारियों को तोहफा या फिर नकद देती हैं, तो लोग अपने रिश्तेदारों को तोहफे में मिठाई के डिब्बे या अन्य उपहार भेंट करते हैं. ऐसी मान्यता है कि दिवाली के दिन किसी के घर खाली हाथ नहीं जाते.

ग्रीन दिवाली और बाजार

ऑनलाइन शॉपिंग

दिवाली पर पारंपरिक शॉपिंग तो आम बात है लेकिन अब ऑनलाइन शॉपिंग का भी चलन तेजी से बढ़ा है. ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट दिवाली के मौके पर अनेक ऑफर्स पेश कर रही है. ग्राहकों को लुभाने के लिए तरह तरह के डिस्काउंट और लाभ दिए जा रहे हैं.

ग्रीन दिवाली और बाजार

प्रदूषण मुक्त दिवाली

हर साल दिवाली के दूसरे दिन अखबारों में सुर्खियां होती हैं कि पटाखों के कारण ध्वनि और वायु प्रदूषण का रिकॉर्ड टूटा. लेकिन इस बार अनेक संस्थाएं, सामाजिक कार्यकर्ता और सरकारों की भी कोशिश है कि दिवाली पर कम से कम प्रदूषण हो.

ग्रीन दिवाली और बाजार

पर्यावरण की सोचें

इस दिवाली आप भी ऐसा कुछ करें जिससे धरती पर बोझ कम हो सके. ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण को बढ़ाने के बदले आप भी स्वस्थ दिवाली का समर्थन करें.

ग्रीन दिवाली और बाजार

भाईचारे का संदेश

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में दिवाली के मौके पर शांति और भाईचारे का संदेश देती मुस्लिम छात्राएं.

अदालत के फैसले पर बंटे लोगों के सवाल पर जयधर गुप्ता ने कहा, "लोग अदालत के इस फैसले को धर्म का मुद्दा भी बना रहे हैं. मुझे समझ नहीं आता कि अपने बच्चों को वायु प्रदूषण से मारने में कौन सा धर्म रखा है. एक परंपरा बनी हुई है कि पटाखे बच्चों के साथ फोड़ने हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला इसलिए दिया है कि इसमें धार्मिक भावनाएं शामिल हो जाती हैं, इसलिए कोई नेता ऐसा फैसला नहीं लेना चाहता है."

उन्होंने कहा, "देखिए सरकार की भूमिका है स्वास्थ्य और जिंदगी की रक्षा करना लेकिन धर्म के मामले में नेता भी पीछे हट जाते हैं और यह एक धार्मिक मुद्दा बन जाता है. लोग धर्म की बात छोड़कर इस फैसले का स्वागत करें क्योंकि हमारी हवा पहले ही जहर हो चुकी है और हमें अपने हालात को बेहतर करना है, जहर में जहर मिलाने पर कौन सी अक्लमंदी है." 

वहीं सुनील ने कहा, "नीतियों और अदालत के आदेशों को लागू करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति को उजागर करना दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है. इस सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निपटने में हम पिछले कई वर्षो से नीति निर्माण और कार्यान्वयन में केंद्रीय और राज्य सरकारों में गंभीरता की कमी को देख रहे हैं. हमें इंतजार करना है और देखना है कि यह आदेश कैसे लागू किया जा रहा है."

आईएएनएस/एके

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