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समाज

पाकिस्तान: परंपराओं के नाम पर लड़कियों का शोषण

एस खान, इस्लामाबाद
२६ मार्च २०२१

अधिकार कार्यकर्ताओं और चिकित्सा विशेषज्ञों ने सरकार से आग्रह किया है कि कम उम्र में होने वाली शादियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं. कार्यकर्ताओं का कहना है कि पाकिस्तान में बाल विवाह की सबसे बड़ी वजह गरीबी है.

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Nigeria Proteste gegen Kinderehe
तस्वीर: picture alliance/AP Photo

पाकिस्तान के दक्षिणी प्रांत सिंध में शादी की उम्र 18 साल है. देश के अन्य हिस्सों में यह 16 है. हालांकि अब पूरे देश में शादी की उम्र को 16 से बढ़ाकर 18 साल करने की मांग की जा रही है. देश के कई कार्यकर्ताओं ने ऐसा करने की मांग की है. पाकिस्तान ने 1990 में बाल अधिकारों पर कन्वेंशन (सीआरसी) को मंजूरी दी थी. इसमें बच्चों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ बाल विवाह को खत्म करने की प्रतिबद्धता जताई गई थी. हालांकि 30 साल बीत जाने के बाद भी पाकिस्तान के कई इलाकों में बाल विवाह की समस्या जारी है.

पेशावर के रहने वाले कमर नसीम अधिकार कार्यकर्ता हैं. वे पाकिस्तान जनसांख्यिकी और स्वास्थ्य सर्वेक्षण (पीडीएचएस) के 2017-18 के डाटा का हवाला देते हुए कहते हैं, "3.3 प्रतिशत लड़कियों की शादी 15 साल से कम और 18.3 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है. वहीं, 4.7 प्रतिशत लड़कों की शादी भी 18 साल से कम उम्र में हो जाती है." नसीम कहते हैं कि पाकिस्तान में हाल में शामिल किए गए जनजातीय इलाकों में बाल विवाह की समस्या काफी ज्यादा है. देश में होने वाले बाल विवाह के कुल मामलों में से 35 प्रतिशत इन्हीं इलाकों होते हैं.

महिला अधिकार कार्यकर्ता मुख्तारन माई का कहना है कि पंजाब प्रांत के ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर लड़कियों की शादी स्थानीय रीति-रिवाजों और परंपराओं के कारण कम उम्र में कर दी जाती है. वे कहती हैं, "यहां वट्टा-सट्टा शादी आम बात है. किसी की हत्या होने पर पैसे चुकाना, जनजातीय विवाद और संपत्ति के झगड़े को निपटाने के लिए भी युवा लड़कियों की शादी कर दी जाती है. उन्हें जानवरों की तरह बेच दिया जाता है." वट्टा-सट्टा के तहत दो परिवारों के लड़के और लड़कियों की शादी एक-दूसरे परिवार में की जाती है.

पाकिस्तान में एक विधायक और एक कम उम्र की लड़की के बीच हाल ही में हुई शादी ने पूरे देश में खलबली मचा दी. इसके बाद, अधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार से बाल विवाह के खिलाफ ठोस कदम उठाने की मांग की. स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जमीयत-उलेमा-इस्लाम फजल (जेयूआई-एफ) के 64 वर्षीय विधायक मौलाना सलाउद्दीन अयूबी ने फरवरी महीने में 14 वर्षीय लड़की से शादी की थी. इस खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी इसकी काफी चर्चा और आलोचना हुई.

पाकिस्तान में नाबालिग लड़कियों का जबरन धर्मांतरण

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए देश के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री फवाद चौधरी ने कथित शादी को "बेतुका" और "बहुत परेशान करने वाली खबर" कहा था. उन्होंने मांग की थी कि जेयूआई-एफ इस पूरे मामले पर सफाई दे और अपने विधायक का इस्तीफा ले. देश भर के विभिन्न सिविल सोसायटी से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इस शादी की तीखी आलोचना की. उन्होंने कहा कि यह न सिर्फ किसी बच्चे के मौलिक अधिकार का हनन है, बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर खतरा भी है.

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के रहने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता कैसर खान का मानना है कि पाकिस्तान में बाल विवाह की सबसे बड़ी वजह गरीबी है. वे कहते हैं, "हाल में शामिल किए गए जनजातीय जिलों और मलाकुंड जिले में लोग 5 लाख से 20 लाख रुपये देकर कम उम्र की लड़कियों से शादी करते हैं. इनमें से ज्यादातर अमीर पुरुष होते हैं और वे पहले से शादीशुदा होते हैं. धार्मिक नेता, आदिवासियों के मुखिया और राज्य प्रशासन सभी इसमें शामिल हैं. अगर उन्हें धार्मिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए शादी करनी है, तो फिर दुल्हन के रूप में बालिग लड़की क्यों नहीं हो सकती है?”

इस्लामाबाद स्थित बाल अधिकार कार्यकर्ता हबीबा सलमान का कहना है कि चित्राल शहर में नाबालिगों से शादी करना आम है. उन्होंने डॉयचे वेले से बात करते हुए कहा कि यहां 25 लाख पाकिस्तानी रुपयों में युवा लड़कियां बेची और खरीदी जा सकती हैं.

क्वेटा शहर के एक अन्य कार्यकर्ता ने डॉयचे वेले को बताया कि बलूचिस्तान प्रांत में अमीर लोगों को पश्तून जातीय समूह से कम उम्र की अफगान लड़कियों या स्थानीय लड़कियों को "शादी के नाम पर" खरीदने के लिए जाना जाता है. कार्यकर्ता के अनुसार किला अब्दुल्ला, पिशिन, जोब और क्वेटा में पुरुष आम तौर पर कम उम्र की लड़कियों से शादी करने के लिए 10 लाख से 40 लाख पाकिस्तानी रुपये देते हैं.

सलमान बाल विवाह के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करने के लिए पाकिस्तानी सरकार को दोषी ठहराती हैं. वह कहती हैं कि पुलिस, बाल संरक्षण ब्यूरो और अन्य संबंधित विभाग कम उम्र के विवाह के मामलों पर न तो किसी तरह की प्रतिक्रिया देते हैं और न ही कोई ठोस कदम उठाते हैं.

धार्मिक नेताओं की भूमिका

लाहौर की रहने वाली महिला अधिकार कार्यकर्ता शाजिया खान का कहना है कि पाकिस्तान के मौलवी धार्मिक विवाह में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं. शाजिया धार्मिक नेताओं के किए गए पिछले विरोध का हवाला देते हुए धार्मिक पार्टी के सदस्यों के कम उम्र की लड़कियों के साथ शादी करने पर रोक लगाने की मांग करती हैं.

जब कुछ साल पहले सिंध प्रांत में इस तरह का कानून लागू किया गया था, तो धार्मिक नेताओं ने इसका जमकर विरोध किया था. 2014 में कम उम्र की लड़कियों के साथ विवाह के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने की मांग करने वाले एक संघीय विधेयक पर भी मौलवियों ने रोक लगा दी थी.

शाजिया कहती हैं, "उन्होंने हमेशा कम उम्र में होने वाले विवाह पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाले बिलों का विरोध किया है. पूरा वैज्ञानिक समुदाय इस बात की पुष्टि करता है कि यह महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है लेकिन वे इस्लाम की गलत व्याख्या करते हैं. धार्मिक आधार पर कम उम्र की लड़कियों के विवाह को जायज ठहराते हैं."

पाकिस्तानी राजनेता और मानवाधिकारों पर सीनेट समिति की पूर्व अध्यक्ष नासरीन जलील का कहना है कि बाल विवाह के लिए देश के सामंती रीति-रिवाजों और पितृसत्ता को दोषी ठहराया जाना चाहिए. वे कहती हैं, "मेरा मानना है कि देश भर में शादी की उम्र 18 होनी चाहिए और इसका उल्लंघन करने वालों से कठोर तरीके से निपटा जाना चाहिए."

पाकिस्तान के डॉक्टर टीपू सुल्तान ऐसे मामलों में स्वास्थ्य संबंधी उन समस्याओं के बारे में चेतावनी देते हैं जो शादी के तुरंत बाद या प्रेगनेंसी के दौरान हो सकती है. वे कहते हैं कि एनीमिया, हार्मोनल विकार और वजाइनल फिस्टुला ऐसी कुछ समस्याएं हैं जिसका खतरा कम उम्र में शादी होने वाली लड़कियों को हो सकता है, "यह कुपोषण का कारण भी बनता है क्योंकि जब लड़कियां गर्भवती होती हैं, तो उनके शिशुओं को पोषण की आवश्यकता होती है. यह पोषण उन्हें मां के शरीर से मिलता है. लेकिन इस दौरान मां का ही विकास हो रहा होता है, तो वे अपने बच्चों को पोषण कैसे दे सकती हैं और एक ही समय में खुद को स्वस्थ कैसे रख सकती हैं?"