पेरिस समझौता, पर्यावरण की जीत

पेरिस में आखिरकार धरती के तापमान को दो डिग्री से ज्यादा नहीं बढ़ने देने पर आम सहमति बन गयी. दुनिया भर की सरकारों ने इस समझौते का स्वागत किया है.

जलवायु परिवर्तन पर आम सहमति पर पहुंचना दुनिया भर के देशों के लिए एक बड़ी जीत बताया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर के माध्यम से इस पर टिप्पणी की और कहा, "पेरिस समझौते में ना कोई विजेता है और ना ही किसी की हार हुई है, पर्यावरण को ले कर न्याय की जीत हुई है और हम सब एक हरे भरे भविष्य पर काम कर रहे हैं."

मोदी ने लिखा है कि जलवायु परिवर्तन अभी भी सब के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है लेकिन पेरिस समझौते ने दिखा दिया कि किस तरह दुनिया के हर देश ने मिल कर इस चुनौती से निपटने और इसका समाधान निकालने पर काम किया, "कॉप21 में हुआ मंथन और पेरिस समझौता विश्व नेताओं के साझा विवेक को दर्शाता है."

पेरिस में हुई बैठक के दौरान विकसित और विकासशील देशों के बीच रस्साकशी चलती रही और मीडिया में दोनों ओर से एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालने की कोशिशें दिखीं. न्यूयॉर्क टाइम्स के एक कार्टून पर भी काफी बवाल हुआ जिसमें भारत को रास्ते का रोड़ा बताया गया.

अब समझौता हो जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसके लिए बधाई दी. उन्होंने देशवासियों के नाम संदेश देते हुए कहा, "मुझे यकीन है कि पूरी दुनिया के लिए यह क्षण एक अहम मोड़ साबित होगा." ओबामा ने कहा कि यह समझौता आश्वासन देता है कि आने वाले समय में धरती बेहतर स्थिति में होगी.

जलवायु सम्मेलन की मेजबानी कर रहे फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसोआ ओलांद ने इसे "धरती के लिए एक महान दिन" का नाम दिया. उन्होंने कहा, "पिछली कई शताब्दियों में पेरिस ने कई क्रांतियां देखी हैं. आज सबसे खूबसूरत और सबसे शांतिपूर्ण क्रांति हुई." वहीं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा कि यह समझौता "धरती के भविष्य को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है." संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा कि यह कदम ना केवल धरती के पर्यावरण को बचाएगा, बल्कि गरीबी का अंत करेगा और विकास को बढ़ावा देगा.

सम्मेलन के अंतिम दिनों में हुई सौदेबाजी में अहम भूमिका निभाने वाले भारत में पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इसे एक ऐतिहासिक दिन बताते हुए कहा, "आज हमने जिसे अपनाया है, वह एक समझौता ही नहीं है, सात अरब लोगों के जीवन में एक नया अध्याय है." महात्मा गांधी को याद करते हुए उन्होंने कहा, "वे कहा करते थे कि हमें यह धरती अपने पुरखों से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों ने इसे हमें कर्ज पर दिया है."

हालांकि नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने समझौते को "कमजोर और बिना महत्वाकांक्षाओं वाला" बताया है. सीएसई का कहना है कि समझौते में कोई भी "महत्वपूर्ण लक्ष्य" नहीं हैं और इसमें विकसित देशों की पुरानी गलतियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है. सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, "विकासशील देशों से वायदे कराए गए हैं, जबकि विकसित देशों ने अतीत में जिस तरह से जलवायु परिवर्तन किया, उन पर से वह जिम्मेदारी पूरी तरह से हटा दी गयी है."

दुनिया भर के 195 देशों ने इस पर्यावरण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. इस पर ग्रीनपीस इंटरनेशनल का कहना है, "कभी कभी ऐसा लगता है कि संयुक्त राष्ट्र के देश किसी भी मुद्दे पर एकमत नहीं हो सकते लेकिन यहां करीब दो सौ देश एक साथ आ कर एक समझौते पर राजी हुए हैं." ग्रीनपीस ने इसे "विज्ञान की जीत" बताया है, तो चीन ने "अंतरराष्ट्रीय सहयोग में एक नई शुरुआत".

आईबी/एमजे (पीटीआई)

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग

ग्रीनहाउस प्रभाव एक प्राकृतिक क्रिया है जो धरती को इतना गर्म कर रही है कि इंसान का आराम से रहना मुश्किल होता जा रहा है. नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाय ऑक्साइड और दूसरी गैसों की अदृश्य चादर धरती को घेर रखा है और वह सूरज की गर्मी को सोख कर रखता है.

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग

मानव गतिविधियों की वजह से लगातार कार्बन डाय ऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है. पेडों का कटना हो, कोयला जलाना या तेल और पेट्रोल से गाड़ी चलाना, यह सब कार्बन डाय ऑक्साइड के उत्सर्जन में योगदान देता है. अतिरिक्त कार्बन वायुमंडल में अतिरिक्त चादर तैयार करती है.

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग

इंसान इस समय पहले से कहीं ज्यादा ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2014 में 53 अरब टन के बराबर ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन हुआ. सन 1970 से 2000 के बीच के 1.3 प्रतिशत के मुकाबले 2000 के बाद के वर्षों में सालाना वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत रही है.

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग

हर साल निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा हिस्सा यानि 35 प्रतिशत बिजली के उत्पादन की प्रक्रिया में पैदा होता है. 24 प्रतिशत के साथ कृषि और जंगलों का कटना दूसरे नंबर पर है. भारी उद्योग 21 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों के लिए जिम्मेदार है तो परिवहन 14 प्रतिशत के लिए.

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग

जलवायु सम्मेलनों के जरिये धरती के गर्म होने को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस पर रोकने की कोशिश हो रही है. इसके लिए वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के संकेंद्रण को 450 पार्टिकल पर मिलियन के स्तर पर रोकना होगा. सन 2011 में औसत संकेंद्रण 430 पीपीएम था.

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग

धरती का तापमान 1880 से 2015 के बीच 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. लेकिन यह हर कहीं बराबर नहीं है. समुद्र की तुलना में जमीन पर तापमान में ज्यादा वृद्धि देखी गई है. उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर भी तापमान में अधिक वृद्धि हुई है. साल 2015 के अब तक के सबसे ज्यादा गर्म होने का अनुमान है.

क्या है ग्लोबल वॉर्मिंग

संयुक्त राष्ट्र की विज्ञान संस्था का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं की गई तो 2100 तक वैश्विक तापमान 3.7 से 4.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा में रहने के लिए 2030 तक पर्यावरण तकनीक में सैकड़ों अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी.

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