ब्रिटेन में सरकार बनाने की मुश्किल बातचीत

कहा गया है कि ब्रिटेन में कंज़रवेटिव पार्टी और लिबरल डेमोक्रेटों के बीच सरकार बनाने की बातचीत में माहौल अच्छा है, लेकिन आपसी सहमति के लिए अभी काफ़ी पापड़ बेले जाने हैं.

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

ब्रिटेन में पहले दो पार्टियां हुआ करती थीं, टोरी और ह्विग. टोरी आजकी कंज़रवेटिव पार्टी है, जबकि लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ह्विग पार्टी से बनी है. लेबर पार्टी का जन्म बीसवी सदी के पहले दशकों में हुआ. एक लंबे समय तक प्रधान मंत्री या तो टोरी, या ह्विग पार्टी के हुआ करते थे. पिछले सत्तर-अस्सी सालों से कंज़रवेटिव और लेबर पार्टी के नेता इस पद पर आते रहे हैं.

लिबरल या ह्विग पार्टी की भूमिका गौण बनी रही, लेबर पार्टी के एक टूटे हिस्से द्वारा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के निर्माण, व उसके बाद लिबरल पार्टी के साथ उसके विलय से लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी बनने के बाद भी. इसका एक कारण है ब्रिटेन की निर्वाचन प्रणाली, जिसमें हर निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज़्यादा मत पाने वाला उम्मीदवार चुना जाता है, और ये उम्मीदवार अधिकतर दो बड़ी पार्टियों - यानी कंज़रवेटिव और लेबर पार्टी के हुआ करते हैं. इस बार हुए चुनाव में भी लिबरल पार्टी को 23 प्रतिशत मत मिले हैं, लेकिन सिर्फ़ 9 प्रतिशत सीट.

इसलिए लिबरल पार्टी के नेता निक क्लेग चुनाव प्रणाली में सुधार के सवाल को काफ़ी महत्व दे रहे हैं. स्थानीय समय के अनुसार 11 बजे से दोनों पार्टियों के बीच बातचीत चल रही है. शिक्षा नीति के सवाल पर कंज़रवेटिव पार्टी के प्रवक्ता माइकेल गोव की राय में बातचीत का माहौल काफ़ी अच्छा है. उन्होंने कहा कि कई विकल्प हैं. दोनों पार्टियों की एक साझा सरकार बन सकती है, या फिर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में कंज़रवेटिव पार्टी लिबरल डेमोक्रेटों के समर्थन से सरकार बना सकती है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि वित्तीय संकट ब्रिटेन की सबसे बड़ी समस्या है. अगले साल सरकारी घाटा सकल राष्ट्रीय उत्पादन के 12 प्रतिशत के बराबर होने जा रहा है, यानी ग्रीस के वर्तमान घाटे से भी अधिक. लेकिन वित्तीय नीति पर सभी सरकारें राष्ट्रीय सहमति तैयार करने की कोशिश कर रही हैं. ऐसी स्थिति में चुनाव प्रणाली में सुधार का मसला महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है.

कंज़रवेटिव पार्टी चुनाव प्रणाली में सुधार के ख़िलाफ़ है. लेबर नेता व वर्तमान प्रधान मंत्री गॉर्डन ब्राउन ने इस प्रस्ताव पर जनमत संग्रह का प्रस्ताव दिया है. एक मत सर्वेक्षण से पता चला है कि ब्रिटेन के लगभग 60 प्रतिशत मतदाता वर्तमान प्रणाली के बदले जर्मनी की तरह सानुपातिक चुनाव प्रणाली के पक्ष में हैं, जिसमें हर पार्टी को उसे मिले कुल मतों के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलता है. लिबरल डेमोक्रेट नेता क्लेग के लिए यह एक अच्छा तर्क बन सकता है.

रिपोर्ट: उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

इसमें कोई दो राय नहीं कि वित्तीय संकट ब्रिटेन की सबसे बड़ी समस्या है. अगले साल सरकारी घाटा सकल राष्ट्रीय उत्पादन के 12 प्रतिशत के बराबर होने जा रहा है, यानी ग्रीस के वर्तमान घाटे से भी अधिक. लेकिन वित्तीय नीति पर सभी सरकारें राष्ट्रीय सहमति तैयार करने की कोशिश कर रही हैं. ऐसी स्थिति में चुनाव प्रणाली में सुधार का मसला महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है.

कंज़रवेटिव पार्टी चुनाव प्रणाली में सुधार के ख़िलाफ़ है. लेबर नेता व वर्तमान प्रधान मंत्री गॉर्डन ब्राउन ने इस प्रस्ताव पर जनमत संग्रह का प्रस्ताव दिया है. एक मत सर्वेक्षण से पता चला है कि ब्रिटेन के लगभग 60 प्रतिशत मतदाता वर्तमान प्रणाली के बदले जर्मनी की तरह सानुपातिक चुनाव प्रणाली के पक्ष में हैं, जिसमें हर पार्टी को उसे मिले कुल मतों के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलता है. लिबरल डेमोक्रेट नेता क्लेग के लिए यह एक अच्छा तर्क बन सकता है.

रिपोर्ट: उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

ब्रिटेन में पहले दो पार्टियां हुआ करती थीं, टोरी और ह्विग. टोरी आजकी कंज़रवेटिव पार्टी है, जबकि लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ह्विग पार्टी से बनी है. लेबर पार्टी का जन्म बीसवी सदी के पहले दशकों में हुआ. एक लंबे समय तक प्रधान मंत्री या तो टोरी, या ह्विग पार्टी के हुआ करते थे. पिछले सत्तर-अस्सी सालों से कंज़रवेटिव और लेबर पार्टी के नेता इस पद पर आते रहे हैं.

लिबरल या ह्विग पार्टी की भूमिका गौण बनी रही, लेबर पार्टी के एक टूटे हिस्से द्वारा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के निर्माण, व उसके बाद लिबरल पार्टी के साथ उसके विलय से लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी बनने के बाद भी. इसका एक कारण है ब्रिटेन की निर्वाचन प्रणाली, जिसमें हर निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज़्यादा मत पाने वाला उम्मीदवार चुना जाता है, और ये उम्मीदवार अधिकतर दो बड़ी पार्टियों - यानी कंज़रवेटिव और लेबर पार्टी के हुआ करते हैं. इस बार हुए चुनाव में भी लिबरल पार्टी को 23 प्रतिशत मत मिले हैं, लेकिन सिर्फ़ 9 प्रतिशत सीट.

इसलिए लिबरल पार्टी के नेता निक क्लेग चुनाव प्रणाली में सुधार के सवाल को काफ़ी महत्व दे रहे हैं. स्थानीय समय के अनुसार 11 बजे से दोनों पार्टियों के बीच बातचीत चल रही है. शिक्षा नीति के सवाल पर कंज़रवेटिव पार्टी के प्रवक्ता माइकेल गोव की राय में बातचीत का माहौल काफ़ी अच्छा है. उन्होंने कहा कि कई विकल्प हैं. दोनों पार्टियों की एक साझा सरकार बन सकती है, या फिर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में कंज़रवेटिव पार्टी लिबरल डेमोक्रेटों के समर्थन से सरकार बना सकती है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि वित्तीय संकट ब्रिटेन की सबसे बड़ी समस्या है. अगले साल सरकारी घाटा सकल राष्ट्रीय उत्पादन के 12 प्रतिशत के बराबर होने जा रहा है, यानी ग्रीस के वर्तमान घाटे से भी अधिक. लेकिन वित्तीय नीति पर सभी सरकारें राष्ट्रीय सहमति तैयार करने की कोशिश कर रही हैं. ऐसी स्थिति में चुनाव प्रणाली में सुधार का मसला महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है.

कंज़रवेटिव पार्टी चुनाव प्रणाली में सुधार के ख़िलाफ़ है. लेबर नेता व वर्तमान प्रधान मंत्री गॉर्डन ब्राउन ने इस प्रस्ताव पर जनमत संग्रह का प्रस्ताव दिया है. एक मत सर्वेक्षण से पता चला है कि ब्रिटेन के लगभग 60 प्रतिशत मतदाता वर्तमान प्रणाली के बदले जर्मनी की तरह सानुपातिक चुनाव प्रणाली के पक्ष में हैं, जिसमें हर पार्टी को उसे मिले कुल मतों के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलता है. लिबरल डेमोक्रेट नेता क्लेग के लिए यह एक अच्छा तर्क बन सकता है.

रिपोर्ट: उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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